भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
पन्द्रह दिन की छुट्टी के बाद कर्मवीर ड्यूटी पर लौटी किन्तु कहीं कोई परिवर्तन नहीं, कोई बदलाव नहीं। वही नीली, सफेद ट्रैफिक पुलिस की वर्दी, वही पुलिस का बूथ। एक तो गर्मी, उस पर वाहनों से निकलने वाला धुंआ, सारी सड़क किसी उबलती हुई पाइप लाईन-सी लगती है। इधर लालबत्ती हुई और उधर वाहनों को, मक्खियों की तरह भिनभिनाते भिखारियों ने घेरना शुरू कर दिया। आजकल लालबत्तियों पर भिखारियों का झुंड ऐसे ही एक साथ टूटता है। मानो ये लोग लालबत्ती को चुग्गा या दाने के रूप में इस्तेमाल करते हैं और शिकार के यूँ पसरते ही उनपर एक साथ झपट पड़ते हैं।
गाड़ियों की ची-पों में एक दृश्य सामने पड़ा तो कर्मवीर की नजर चौंक गई। पचास साल की उस भिखारन की गोद में बच्चा। अगर ये किसी और भिखारन का होता तो वो देर-सबेर इसे वापस तो लेती। कहीं ये बच्चा इसी का तो नहीं। पर पन्द्रह दिन पहले तो कुछ भी नहीं था, न पेट, न उभार और अब अचानक। अरे! किसी का होगा पर किसका? ये इसे कहीं से उठाकर तो नहीं ले आई। आजकल नवजात शिशुओं को उठाने और बेचने की वारदातें बहत बढ़ गई हैं। उसने बात की थाह लेने के लिए. साथ खडे एक अन्य पुलिस कर्मी से पूछा।
‘अरे सत्ते! ये उस औरत की गोद में बच्चा किसका है’?
‘इसी का होगा। दस-बारह दिनों से तो इसी के पास है। होगा जिसका होगा तुझे क्या?’
एक पुलिस वाले के मुँह से ऐसा जवाब सुनकर कर्मवीर बिदक गई और सत्ते को समझाते हुए बोली-
‘हम अपने काम की जिम्मेदारी कब समझेंगे? सरकार से तनख्वाह और जनता से रिश्वत लेने के अलावा भी पुलिस की कुछ ड्यूटी होती है। अपने आसपास हो रही छोटी-मोटी घटनाओं पर नजर रखना हमारा कर्त्तव्य है। कल को जब यही घटनाएँ बड़े हादसों और विस्फोट के रूप में सामने आती हैं तो टोपी और बैल्ट कसने का क्या फायदा। तमाचा लगने के बाद जगे तो क्या जगे। तू यहीं ठहर मैं जरा औरत से पूछकर आती हूँ’ -कहते हुए कर्मवीर औरत की ओर चल पडी। कुछ नजदीक पहुँचकर कर्मवीर ने अपने पुलिसया अंदाज में कहा-
‘अरी इधर आ’
पुलिस की वर्दी, पुलिस का रौब, भिखारन चाहकर भी कोई प्रतिवाद न कर सकी और भीख माँगना छोड़कर सीधा कर्मवीर के समक्ष आ खड़ी हुई। कर्मवीर ने पैनी निगाहों से देखा-मैल से अटी काया, चिथड़ों से ढके अंग। बास मारता शरीर उस पर गले में फंसी कपड़े की गुमठी और उसके बीचो-बीच लेटी ये बच्ची-गोरा रंग, पतले-पतले हाथ-पाँव, सुन्दर और बारीक नैन-नक्श दिखते ही आभास होता था ये बच्ची इसकी नहीं है।
‘ये बालक किसका है? कर्मवीर ने एकदम अटपटा-सा सवाल पूछा तो औरत सकपका गई।
‘का हाकिम’
‘सुनाई नी दी तुझे। मैं पूछ रही हूँ ये बालक किसका है?
- मेरा हाकिम…यू बालक तो मेरा सू हाकिम’ – कहते-कहते भिखारन भाग खड़ी हुई।
कर्मवीर पकड़ने की चेष्ठा भी करती तो ग्रीन सिग्नल हो गया। वाहनों ने जल्द ही “पैं-पैं” करके दौड़ लगानी शुरू कर दी। किन्तु भिखारिन के इस व्यवहार से एक बात तो सिद्ध हो गई थी कि बच्चा उसका नहीं था।
अगली सुबह तक भी प्रश्न यथावत बना हुआ था कि आखिर ये नवजात बच्ची आखिर भिखारन के हाथ कहाँ से लग गई? रह-रह कर ध्यान बच्चे पर पहुँच जाता था। किसी अस्पताल में बच्चा चुराने की वारदात तो नहीं हुई। लेकिन वहाँ जाकर रहस्य और गहरा गया जब ज्ञात हुआ कि पीछे पन्द्रह-बीस दिनों से तो ऐसी कोई घटना, किसी आस्पताल में ही नहीं हुई। यदि भिखारन से ही दोबारा पूछताछ की जाए तो वो भी उस घटना के समय से गायब थी। अब रातभर कर्मवीर को बेचैनी रही कि भिखारन कहीं बच्ची को बेच न दे। सुबह डयूटी पर आते ही उसकी निगाहें फिर उस भिखारन को खोजने लगी। मगर उसका कहीं कोई पता नहीं था। तभी सत्ते ने आकर बताया की उसने घर से आते हुए भिखारन को विजय नगर की रेड लाईट पर बच्ची के साथ देखा है। सुनकर कर्मवीर की जान में जान आ गई वह तत्काल ही मोटर साईकिल पर सवार हो रेड-लाईट की ओर रवाना हो ली। रेड-लाईट पर भिखारन भीख माँगने में मशगूल थी। फिर कहीं वो दोबारा न भाग जाए इसलिए कर्मवीर ने सीधा अपने हाथों से भिखारन की एक बाजू जकड़ ली और बुरी तरह झिंझोड़ते हुए बोली।
‘इसे अस्पताल से चुराकर लाई है और कहती है मेरी बच्ची है। इस बच्ची के माँ-बाप दस दिन से थाने के चक्कर काट रहे हैं और तू यहाँ इसे गोद में लिए घूम रही है। चल थाने तेरे ऊपर कई केस न बनवाए और दसियों साल की सजा न दिलवाई तो मेरा नाम भी कर्मवीर नहीं।’
- ‘हाकिम.. हाकिम! मैंने इसे अस्पताल से नहीं चुराया।’
‘तो कहां से चुराया है?’
‘इसे मैं कहीं से चुराकर नहीं लाई हाकिम।’
‘झूठ बोलती है, थाने में चार डंडे लगेंगे तो सब बता देगी। चल थाने।’
‘सच मानिए हाकिम आज से बारह-तेरह दिन पहले जब रात में सड़क पर सो रही थी, तो कार से एक मैम साहब उतरी और फटाक से बच्ची को फुटपाथ पर रखकर चली गई। इसके रोने की आवाज ने मेरे अन्दर की ममता को जगा दिया। मानों मेरी गुमसुम-सी गूंगी जिन्दगी को एक आवाज मिल गई। लगा भगवान ने इस भिखारन को जिन्दगी भर की खुशियाँ भीख में दे दी। उस दिन से आजतक ये बच्ची मेरे ही पास है। अगर इस चाँद-सी बच्ची को बेचना होता तो अबतक बेचकर निजात पा ली होती। रोज इसे भीख के पैसों में से दूध नहीं पिलाती। इसे पूरे दिन कंधों पे नहीं ढोती। मैं भिखारन हो सकती हूँ, पापन नहीं जो किसी के कोख का फूल पैसों में बेच दूँ’ -कहते-कहते चेहरे की दीनता का स्थान मातृत्व ने ले लिया। आँखों के किनारे खारे पानी से अट गए। मैल की परत से भी हृदय की कोमलता झाँक रही थी। चाहे महिला का बदन नंगा था किन्तु नीयत नंगी नहीं थी।
‘जानती भी हो जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसके साथ सैकड़ों जिम्मेदारियाँ अपने आप जन्म ले लेती हैं। बच्चे का वर्तमान, बच्चे का भविष्य आप पर निर्भर करता है तुम्हीं बताओ कल इस बच्ची को क्या दोगी, कलम पेंन्सिल की जगह कटोरा। कपड़ों के नाम पर चीथड़े। कुछ सीखने-सीखाने के नामपर भीख माँगने का तरीका सीखाओगी। सच पूछो तो जो अपराध इसकी माँ ने इसे जन्म देकर किया है वही अपराध तुम इसे पालकर करोगी। इससे अच्छा है तुम इसे किसी अनाथालय में दे दो। कम-से-कम वो इसे पढ़ा लिखाकर अच्छा बुरा-सोचने के लायक तो बना देंगे। वरना तुम्हारे साथ रहकर ये जन्म से ही भिखारी बन जाएगी-कर्मवीर ने समझाते हुए कहा।
थाने की पिटाई भी शायद भिखारन को इतना न तोड़ पाती जितना कर्मवीर की बातों ने तोड़ दिया। निसहाय-सी खड़ी वो काफी देर तक वाहनों को घूरती रही और फिर जलालत के नीचे दबी अपनी आत्मा में हल्की-सी साँस फूंक कर बुद-बुदाई – ‘मैं जन्म की भिखारन नहीं हूँ हाकिम। मैं सौ बीघे की जमींदारनी थी लेकिन कोख से मात खा गई। शादी के दसियों साल बाद भी जब मैं माँ न बन सकी तो मेरे साथ फेरे लेने वाला मेरी सौतन ले आया। अब खसम की भी करो और सौतन की भी करो। मैंने ऐसे नरक से भागना बेहतर समझा। इसलिए सब छोड़-छाड़ कर यहाँ शहर में आ गई। मेहनत-मजदूरी करके पेट पाला तो पहले से खोखले हुए शरीर ने जवाब दे दिया। लेकिन पेट की आग को तो रोज ईंधन चाहिए और इसी ईंधन ने इस धंधे में लगा दिया। पर मैं तुम्हीं से जानना चाहती हूँ हाकिम, क्या सोने की चम्मच से खाने वालों को ही औलाद पैदा करने का अधिकार है? किसी गरीब को नहीं। इस बंजर जमीन पर तो अब तक एक भी फूल नहीं खिला। और अब इत्तेफाक से एक फूल मिला तो उसे भी तोड़ने तुम आ गयी। हाकिम अगर मैं देवकी नहीं बन सकी तो क्या यशोदा भी नहीं बन सकती।’
भिखारन के शब्द गोलियों की तरह तड़-तड़ करते हुए हृदय पर बरस रहे थे। बात सुनकर कर्मवीर के हाथों के रूए खड़े हो गए। उसने जल्द ही मोटर-साईकिल र्टाट की और वापस रवाना हो गयी।
लेकिन आज की रात भी, बेवजह का गुबार कर्मवीर के हृदय में घूम रहा था। कर्मवीर अपने ही ऊपर खीज रहा था। बार-बार एक ही बात दिमाग में उठ रही थी कि भिखारन से बच्ची क्यूँ नहीं ली। क्या पता भिखारन झूठ बोल रही हो। एक मासूम जिन्दगी महज भावुक होकर किसी के हवाले छोड़ आई। वह झूठ बोल रही थी या सच? दरिद्रता और मैल से ढके ये अस्थिपंज। समाज का कोढ़ है या अंग। ये मजबूर है या निकम्मे। ये कर्महीन है या भाग्यहीन। हम इनकी मदद करके वास्तव में इनकी सहायता करते हैं या इनको बढ़ावा देते हैं। यह कल भी विवाद का विषय था और आज भी इसलिए दिमाग भौचक्का हुआ विवादों में घिरा खड़ा था।
रात के सरदर्द ने सुबह डयूटी के लिए देर करा दी। लाल बत्ती पर पहुँची तो सत्ते एक बच्चे को गोद में लिए खड़ा था। कर्मवीर कुछ पूछती, उससे पहले ही सत्ते बोल पड़ा – ‘अभी-अभी तेरी वो भिखारन आई थी। रोते हुए कह रही थी कि इसे कल वाली हाकिम को दे देना। वो भली मानुष हैं, इसकी जिन्दगी के साथ ठीक ही करेंगी। मैं इसे अपने से जुदा करके एक माँ का हक अदा कर रही हूँ। सोच लूँगी की अपनी बच्ची को अच्छी पढ़ाई के लिए अपने से दूर भेज दिया या समझ लूँगी के कन्यादान से पहले ही कन्या दान कर दी।’
कर्मवीर ने पास आकर बच्ची की आँखों में झाँका, वो दुनिया की उठापटक से परे पलकें झपकाने में व्यस्त थी। कर्मवीर ने बच्ची के सुनहरे बालों पर प्यार भरा हाथ फेरा और मोटर साईकिल लेकर भिखारन को ढूँढने निकल पडी। लेकिन अफसोस उस दिन के बाद वह भिखारन उसे कहीं दिखाई नहीं दी। लेकिन कर्मवीर की भावुक आँखें उसे आज भी खोजती हैं।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
