Hindi Story: “बला की खूबसूरत थी वो.. मेरे घर के सामने रहती थी। खिड़की के पास से उसे घंटों निहारा करता। घरवालों के नाम पर कोई न था। जबसे होश संभाला मामा-मामी ही माता -पिता के जगह मिले। उन्होंने ही बताया कि सड़क दुर्घटना में मेरे माता -पिता चल बसे थे और मैं कार सीटर में बंधा होने के कारण बच गया। ईश्वर की मुझ पर खासी कृपा थी। मामा जी के घर कोई लाल पैदा ही नही हुआ तो मैं ही सबका लाडला बना रहा बल्कि दोनो परिवारों की संपत्ति का इकलौता वारिस मैं ही था ऊपर से इतनी खूबसूरत पड़ोसन। मेरा दिल बल्लियों उछलता। कई बार उससे बात करने की कोशिश भी की पर वो नाक पर मक्खी तक न बैठने देती। खैर लड़कियां टीन-ऐज में ख़ामोश सी हो जाती हैं यही सोच कर मैंने खुद को समझा लिया था। इंटर की परीक्षा देकर आगे की पढ़ाई के लिए SAT के रिजल्ट का इंतजार कर रहा था कि उन्हीं दिनों उसके दसवीं की बोर्ड परीक्षा का प्रवेश पत्र आया। सेंटर मेरे स्कूल में पड़ा था। यह बात उसके पिता ने ही बताई और कहा कि मैं और आंटी जॉब के लिए जाते हैं। तुम ही ‘आएशा’ को सेंटर पर छोड़ आना। मैंने उस दिन उसका नाम जाना था। इतना प्यारा नाम,आएशा हां वही तो मेरा आशियाँ सजाने वाली थी।
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अब एक नया काम मेरे हिस्से आ गया। अपने नाम के साथ उसका नाम जोड़ कर नोटबुक में लिखता रहता। आएशा +शिवम,नाम से ही लगता मानो हम एक दूजे के लिए ही बने थे। उम्र का वह दौर भी तो वैसा ही होता है। पहले के लोग गलत नही थे जो आग और फूस की दूरी बना कर रखते थे। अब मैं अपनी बाइक से भी प्यार करने लगा था उसपर आएशा जो बैठने वाली थी। वो भी अजीब मिट्टी की बनी थी। चुपचाप आकर बैठ जाती और सीधी स्कूल गेट के अंदर चली जाती। वापसी में भी वही स्थिति थी। हाँ या ना के लिए भी सिर हिलाकर जवाब देती। मेरा बड़ा दिल करता कि एक बार उन हसीन लबों से अपना नाम ही सुन लूं। फिर खुद को समझा -बुझा कर रखा कि ज्यादा की लालच में जो मिला वो भी ना छूट जाए। इस तरह हाईस्कूल की परीक्षाएं खत्म हुईं और सैट का रिजल्ट आ गया तो मैं पढ़ने के लिए अमेरिका आ गया। अब पहली जॉब लग गयी है तो सोचता हूँ,मामा-मामी से मिल कर आएशा से रिश्ते की बात चला दूँ। आखिर उसके पिता ने मुझमे कुछ देखकर ही तो भरोसा किया था तो उम्रभर की जिम्मेदारी भी दे ही सकते हैं। ईश्वर ने साथ दिया तो साथ लेकर ही लौटूंगा।”
मैंने जब ये सारी पिछली बातें मायरा जो कि अमेरिकन मित्र है उसे बताया तो वह काफी रोमांचित हो गयी। हम सब जीवन मे एक न एक बार प्यार तो करते ही हैं। कुछ अपनी कहानियों को अंजाम दे पाते हैं तो कुछ की कहनियां अंतर्मन में ही दफन हो जाती हैं। तभी तो जब कोई सच्चा आशिक़ दिखता है तो उसकी कहानी जानने की उत्सुकता को रोक नही पाते। मारिया का कौतुहल भी चरम पर था।
“मैं बेसब्री से तुम दोनो का इंतजार करूंगी।”
उसके मुंह से अनायास ही निकला। उससे बातें खत्म करके मैंने दिल्ली की फ्लाइट ले ली। वहां से टैक्सी लेकर चंडीगढ़ पहुंचा।
“तुम आ गए बेटा!” आएशा के पिता घर के बाहर ही खड़े मिल गए। उन्होंने बढ़कर गले लगा लिया। जैसे पहले से ही राह देख रहे हों। शायद मामाजी ने बता दिया होगा। घर में घुसते ही मामी ने सारी राम कहानी कह सुनाई,
“दहेज के लालचियों के हाथ पड़ गई थी। पता नहीं कैसे उसके पड़ोसियों ने पिता को फ़ोन कर दिया और ऐन वक़्त पर न पहुंचे होते तो जाने क्या हो जाता। चलो! बेचारी की जान बच गई,तब से यहीं रहती है। कहते हैं ब्याह के नाम से ही नफ़रत हो गई है उसे।”
इतनी बड़ी बात हो गई और मुझसे छुपाया गया। शायद मेरी पढ़ाई में बाधा न पड़े यही सोचा होगा। भारी मन व धड़कते ह्रदय से आएशा के घर में प्रवेश किया। सामने ही उसे देख बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल पाया। खूबसूरत तो वह पहले ही थी,ऊपर से काली नागिन सी चोटी घुटनों तक आ गई थीं। चेहरे पर अब भी वही तटस्थता जैसे कोई नाराजगी हो।
“कैसी हो?”
“क्यों पूछ रहे हो ?”
“पुराने दोस्त हैं यार !”
” दोस्त ……? जब डोली उठ रही थी तब कहां थे ?”
सही तो पूछा था उसने। उससे बिना कुछ बोले विदेश चला गया। सोचा था कुछ बनकर लौटेगा। ना इजहार,ना इकरार, न ही कभी उसका हाल – चाल लेने की कोशिश की।
“अरे बेटा ! चाय पीकर जाना।”
कह कर आएशा की मां ने बिठा लिया। उनकी आवाज़ से तंद्रा टूटी तो आशु के हाथों की चाय पीने की ललक ने रुकने पर मजबूर कर दिया था। फिर अंकल ने बताया कि,
“दहेज के भूखे भेड़िए कैसे नकाब में घूमते हैं। पहचानने में भूल हो गई बेटा ! खुद कहा,एक जोड़ी कपड़े में बच्ची को भेजिए। हमें कुछ भी नहीं चाहिए पर बच्ची को सताते रहे । मैं तो मौत के मुंह से निकाल कर लाया हूं इसे। केस ही ऐसा था कि तुरंत तलाक मिल गया है।”
चाय के साथ आशु सामने थी। खूबसूरत मेहंदी लगे हाथ जो अक्सर ख्वाबों में आते और नींद से जगा कर चाय पिलाते थे। उसकी जगह एक जले हुए हाथ का प्याला जब मुझ तक पहुंचा तो चाय हलक से ना उतर पाया। रुंधे गले से बस इतना ही कहा कि “पंडित जी से विवाह की तिथि निकलवा लें। मै वीज़ा के लिए देखता हूं। आएशा के जले अंगो की प्लास्टिक सर्जरी अब अमेरिका में होगी ।”
विवाह की तैयारियां शुरू हो गई। जाने क्या था हम दोनों के बीच कि बगैर बोले ही मौन ने प्यार का संदेश पहुंचा दिया था। मेरे शब्दों की गंभीरता ने आएशा के पिता को यह भान करा दिया था कि जो दुख उन्होंने अपनी बेटी के नसीब में लिखा था उसे हरने उसका मसीहा आ चुका है।खिड़की फिर से गुलज़ार हो गई थी। अब एक मधुरता आएशा के लावण्य को और बढ़ा रही थी। मैं उसकी खूबसूरती में फिर से खो जाना चाहता था पर काम बहुत थे।
शादी,सर्टिफिकेट,वीज़ा वगैरह,सब निपटाकर मैने मारिया को फोन किया और यह सारा वृतांत जब कह सुनाया तो खुशी के मारे वह रो पड़ी। मेरे प्रेम कहानी के पूरी हो जाने की खुशी उसके आवाज से सात समन्दर पार तक आ रही थी। प्यार के पंछी जो मिल गए थे। हमारे घोंसले को संवारने की जिम्मेदारी उसने स्वयं ही ले ली और स्वागत की तैयारियों में जुट गई। आखिर एक कुंवारे घर को नवयुगल के सपनों का संसार जो बनाना था।
