Aate-Jaate Yaayaavar by Mannu Bhandari
Aate-Jaate Yaayaavar by Mannu Bhandari


‘अच्छा, पत्र लिखना नहीं आता, तो ख़ाली काग़ज़ ही भेज दीजिए। मैं उसी से सब समझ लूँगा।’
जाते-जाते कैसे लटके बघार रहा है! फिल्मी डायलॉग! अब सचमुच मेरा धैर्य जवाब देने लगा था और मन हो रहा था, मैं सामने बैठे इस आदमी को फटकार दूँ।
तभी चपरासी ने आकर जैसे मेरा उद्धार कर दिया। मैंने बताया, ‘आठ बजे के बाद यहाँ पुरुष कमरे में नहीं रह सकते।’ ‘प्राध्यापिकाओं के लिए भी इतने बंधन!’ और वह हँसने लगा, तो मैं भीतर-ही-भीतर बुरी तरह कुढ़ गई।

‘हाँ, और नहीं तो क्या, यह अमेरिका नहीं है।’ मन-ही-मन कहा-‘अमेरिका की दुम कहीं कहा!’
मैं एक क्षण को भी यह नहीं बताना चाहती थी कि परसों ही उसके जाने की बात सुनकर में विचलित हो गई हूँ या कि उसे लेकर… बड़े सहज क़दमों में मैं उसके साथ नीचे फाटक तक गई।
‘यहाँ कोई खाली टैक्सी नहीं मिलेगी।’ मेरा इतना कह देने के बावजूद वह टैक्सी की प्रतीक्षा का बहाना लेकर खड़ा बातें करने लगा।
‘मान लीजिए, कभी एक दिन आपके दरवाज़े पर खट-खट हो! आप खोलें और देखें कि मैं खड़ा हूँ, तो कैसा लगेगा?’ खाक धूल लगेगा! क्यों अब भी नाटक किए जा रहे हो? क्या मतलब है इन सब बातों का? कहने को मैं भी कह दूँ-‘दरवाज़ा खुले और आप देखें कि कोई और चेहरा झांककर बता रहा है कि मिताली तो शादी करके चली गई, तो आपको कैसा लगेगा?’ फिर ख़याल आया, इसे लगना ही क्या है? उसी के साथ बैठ जाएगा और मेरा किस्सा ऐसी आत्मीयता के साथ बताएगा, जैसे वह कोई इसकी अंतरंग हो।पर मैंने कुछ भी नहीं कहा। बस, गुमसुम खड़ी रही।

‘लगता है, टैक्सी तो यहाँ मिलेगी नहीं, मुझे मेन रोड तक जाना होगा।’

उसने कंधे उचकाए। फिर बड़ी अदा के हाथ जोड़कर होंठों पर ढेर सारी मुस्कान और चेहरे पर आत्मीयता पोतकर कहा, ‘इस आते-जाते यायावर का नमस्कार!’
मैं चाहकर भी मुस्करा न पाई। बस, यंत्रवत् हाथ जोड़ दिए।वह मुड़ गया। जैसे सहज और सधे कदमों से वह चल रहा था, उससे लगा, न इन दो दिनों का सब-कुछ झाड़-पोंछकर वह इस फाटक पर ही छोड़ गया है और बेहद हलका होकर जा रहा है। हलका और निर्द्वंद्व। सच पूछे तो इन दो दिनों में आखिर हुआ ही क्या है! पर मैं हूँ कि इस न कुछ हुए को भी अब न जाने कितने दिनों तक गुनती-बुनती रहूँगी। फिर एकाएक रमला पर खीज आने लगी। पता नहीं किस-किससे मिला देती है। उसके घर कोई भी आए, मुझे ज़रूर बुलाएगी। बड़ी गार्जियन बनी फिरती है।निरंतर दूर होती हुई उसकी आकृति धुँधली हुई, थरथराई और फिर लुढ़क गई।