Hindi Love Story: “मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी।” उसने अपना ग़ुस्से से लाल हुआ चेहरा सड़क की ओर करते हुए कहा। एक्सीलेटर पर ज़रा भी ज़ोर आज़माईश नहीं थी और बहुत ही धीमी गति से कार लुढ़क रही थी।
“पर हुआ क्या?” मुझे याद नहीं आया कि इन दिनों मैंने ऐसा कोई गुनाह भी किया है।
“तुम्हें ना मुझसे प्यार है, ना मेरी कोई फ़िक्र।”
“पर हुआ क्या?”
“कल क्या था पता है?”
“क्या?” यादों के कुछ-कुछ आसार तो बन रहे थे, पर उसे नकारा जाना ही बेहतर था।
“अब ये भी ख़ुद ही बताना पड़ेगा। ओके फाइन…” एक मिनट के लिए वह रुकी और ख़ुद पर क़ाबू पाते हुए कहा- “मेरा बर्थडे…सुबह से रात तक इंतज़ार करती रही; सब ने विश किया एक तुम्हें छोड़कर। जिसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।”
“ओह माई गॉड! सॉरी मैं भूल गया। बिल्कुल दिमाग़ से ही निकल गया। एफ.बी. पर भी नहीं गया; वरना नोटिफिकेशन मिल ही जाता। रियली सॉरी…विश यू अ बिलेटेड हैप्पी बर्थडे…” मैंने आसानी से कहा कि, बातें ज़्यादा वज़नी ना हो जाएँ।
“थैंक यू” कहते हुए वह उसी तरह सड़क की ओर देखती रही। चेहरा उतना ही लाल और रुआंसा।
हालाँकि मुझे कभी समझ नहीं आया कि एक विश में ऐसा क्या रखा है। कुछ ज़रूरी काम में फंसा हुआ था, दिमाग़ की वह स्थिति ही नहीं थी कि कुछ सोच पाता। फिर भी उसका चेहरा देख कर कुछ बात करने की हिम्मत और इच्छा दोनों ही नहीं हो रही थी। दस मिनट की शांत ड्राइव के बाद मेरा धैर्य आख़िरकार जवाब दे गया।
“सुनो, मेरे पास बहुत ज़रूरी काम था, कोर्ट और वकीलों के चक्कर लगा-लगा कर शाम तक ऐसा हो गया था जैसे किसी ने ख़ून निचोड़ डाला हो। कितना ज़रूरी था केस, तुम्हें पता तो है। क्रिमिनल मैटर है ना। क्या एक बर्थडे विश इतने सालों के संबंधों से ज़्यादा मायने रखती है?”
अब भी उसकी चुप्पी ने मेरी तल्ख़ी और बढ़ा दी- “सुनो, तुमने किसी एक दिन पैदा होकर कोई पहाड़ नहीं तोड़ा है, हर साल आता है बर्थडे; और किसी की मुबारकबाद से आज तक तुम्हारा क्या भला हो गया है? बनावटी झूठी दुनिया में बैठी हो तुम, और झूठी तारीख़ को अहम समझने की ग़लती कर रही हो। कल से तुमने सोचा, इतने सालों से इस धरती पर कर क्या रही हो?” उसकी रुआंसी शक्ल देख भर लेने से ख़ुद को गुनहगार समझने की बेवकूफ़ाना समझ पर जीत तो अब तक दर्ज ना हो सकी है।
मैंने आगे कहा- “मेरा बर्थडे डराता है मुझे। मैं हर साल, एक साल और मर जाता हूँ। मेरे काम अधूरे पड़े हैं। तुम काटो केक और गाओ जिंगल किसी एक झूठी खौफ़नाक तारीख़ पर। मैं वह हूँ जो किसी भी दिन और समय यह कर सकता हूँ; ज़रूरत होती है तो मन की।” मैं थोड़ी देर के लिए रुका कि, शायद अब तो वह कुछ कहेगी। पर मुझे ही फिर से कहना पड़ा-“मैं किसी अदालत में खड़ा संदेह से लिपटा गुनहगार नहीं हूँ जो तारीख़ों पर हाज़री लगाता रहूँ और दलीलों से अपनी बेगुनाही साबित करता रहूँ। मुझे नाचने के लिए तारीख़ें नहीं, मन चाहिए।” मैंने कभी भी उससे नफ़रत ना कर सकने वाली पूरी आँखों से, उसकी ओर देखा।
मैंने देखा उसकी आँखें अब छलकने लगी हैं। लबलबायीं हुई आँखों पर दलीलों से फ़तह निहायत ही घिनौनी और बदचलनी से सराबोर लगने लगती है। आवाज़ में शहद मिलाते हुए मैं आख़िरकार आँसुओं का पक्षधर हुआ। “सुन ना प्यारु…सच में बहुत ख़राब माइंड सेट था कल मेरा। सारा दिन एकदम से चिड़चिड़ापन हावी था। घर में भी कुछ ऐसी बातें हो गई थीं। मैं जानता हूँ मैंने ग़लती की है, लेकिन जानबूझ कर तो नहीं की ना, बस परिस्थितियों के कारण हो गई। प्लीज़…सॉरी…”
“हाँ, मैं कहाँ कुछ कह रही हूँ।” उसने आँसू पोंछे नहीं, और ढुलकने दिए। मैंने अपने दाहिने हाथ से उसकी बायीं हथेली को थामा और अपनी ओर खींचते हुए क़िस्मत की लकीरों को कुरेद कर अपना नाम लिख देने की कोशिश की।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
