Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “जल्दी आओ।” उसकी आवाज़ मुरझाई हुई थी, जब उसने कॉल किया।

“पहुँच गया, तुम्हारे घर की पीछे वाली सड़क पर हूँ, तुम निकलो।”

वह आई और कार में बैठते ही कहा- “जल्दी चलो, स्टेडियम के पास। कितनी देर से वेट कर रही हूँ।”

“तुम्हें मना किया था, फिर क्या ज़रूरत थी परेशान होने की।” मैंने उसे मना किया था कि वह करवा चौथ का व्रत ना रखे। हम स्टेडियम के पीछे खड़े थे, उसने पूजा करने जैसा कुछ बुदबुदाया और अपनी बैग से पानी की बॉटल निकालते हुए कहा- “पिला दो प्लीज़”

मैंने उसे पानी पिलाया और एक चॉकलेट खिलाई।

“हाँ, अब कुछ ठीक लगा, होंठ सूख गए थे बिल्कुल।”

“तुम ये सब हरकतें करती क्यों हो? घर पर किसी को शक नहीं हुआ?”

“अरे, घर से तो खाना लेकर फेंक दिया मैंने, उन्हें थोड़ी ना पता है।” मैं उसके चेहरे की ओर देखता रहा कि अब वापस जाएँ; ज़्यादा देर घर के पास रहना महफूज़ नहीं।

उसने फिर कहा- “भईया ने भी फ़ास्ट रखा है, भाभी के लिए। तुमको मेरे लिए तो रखना नहीं है, ऊपर से डाँटना और है।”

सच में डाँट देने का ही मन हुआ- “अबे चुप। मैं नहीं रह सकता फास्ट-वास्ट और ना रहना चाहता। मेरे और तुम्हारे मूर्ख भाई में कोई तुलना नहीं। भगवान के दिए हुए शरीर को सताना मुझे पसंद नहीं। मैंने तुम्हें भी तो मना किया था, बेकार की कहानियाँ हैं ये सब। व्रत रखने से पति नहीं मरते तो दुनिया में कोई हिन्दू औरत विधवा नहीं होती और बाकी धर्मों की विधवाओं से जहान भरा होता।”

“अरे यह तो अपनी-अपनी फीलिंग्स हैं।” उसने बचाव करते हुए कहा।

“तो मुझे वह मन नहीं चाहिए, जो दूसरों की देखा-देखी बनता है। मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, पर तुम्हारी बेवज़ह की मूर्खताएँ मुझे मंज़ूर नहीं हैं, और हाँ…मैं कारण भी नहीं बनना चाहता तुम्हारे भूखे-प्यासे रहने का। इंसान हूँ, ज़ल्लाद नहीं। प्लीज़ ख़ुद को टॉर्चर मत किया करो और ना ही मुझे।” हम कार में वापस आ चुके थे।

उसने कहा- “तुम्हें क्यों लोड लेना है, वह तो मैं बता रही थी ना बस। यह थोड़ी कहा कि तुम भी करो। मत करो…लेकिन मुझे तो करने दो।”

“करती रहो। एक ही दिन क्यूँ, आमरण अनशन कर लो। आत्मप्रवंचना की शिकार तुम्हारी चौथ माता की दयालुता का क्या कहना, धोखे से भी व्रत टूट जाने पर तुम्हें बिन ब्याही विधवा बना देगी, लेकिन मक्खन पॉलिस करने से तुम्हारा पति जी जाएगा। किन कथाओं में उलझी हो तुम? थोड़ी तो लाज रख लो अपनी अक्ल की। और ना…हा…हा…हा…सोचता हूँ कभी कि, जो लड़की बिन ब्याहे करवाचौथ कर ले, वो रिस्की तो फुल होगी; क्या पता मरे बिना ही मेरा श्राद्ध निपटा दे… हा…हा…हा..”

“तुम्हें नहीं लगता कि बहुत ज़्यादा बोलते हो तुम?”

“ज़्यादा बोलना तो तुम्हें चल जाता, सच नहीं चलता।”

“चुप रहो और मुझे किस्सी दो, घर आने वाला है।”

मैंने उसके होठों को नज़रों से चूमते हुए अपने होठों को भी उसकी ओर बढ़ जाने दिया; आख़िरकार पैदा भी तो जीने की क़सम खाकर ही हुआ हूँ।

सरवत हुसैन यूँ ही लहलहा आए-

मिट्टी पे नमूदार हैं पानी के ज़ख़ीरे

इनमें कोई औरत से ज़ियादा नहीं गहरा।