भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
उस दिन की वह सुबह… आज से करीब तीन-चार शतक पूर्व की बात है। गाँव माधुपुर- उसके दरबारगढ़ की छत के झरोखे में समरथ दादा माची (नीची बैठकवाली कुर्सी) पर बैठे थे। सामने थोड़ी-सी दूरी पर स्थित बावड़ी को वे आँख-भर कर देख रहे थे। बावड़ी पर पानी भरने आ रही गाँव की बहुओं के सिर पर रखे, सूर्य की किरणों से झिलमिल हो रहे घड़ों को वे नजरों में भर ले रहे थे। एक के ऊपर एक रखी गागर के बोझ से थिरक-थिरक हो रही उनकी लहराती चाल को देखकर उनके दिल को सुकून का अहसास हो रहा था। बावड़ी के हिलडुल रहे पानी पर गिरते, गिरकर बिखरते, सूरज के सिंदूरी ओज को वे देखते ही रहे। इस दृश्य को देखने की उनकी, कितने ही सालों से असफल रही मनोकामना आज परिपूर्ण हो पाई थी। गाँव से पाँच कोस की दूरी पर स्थित झरने के तालाबनुमा कुंड पर से गाँव के लोगों को पानी लाना पड़ता था। नजदीक में पानी का कोई स्त्रोत ही नहीं था। इस तकलीफ के चलते दरबारगढ़ के सामने ही ‘सातस्तरी’ (सात मंजिली, महलनुमा बावड़ी) बनवाई थी। पर…गाँव के भाग तो देखो! बारह साल बीत चले… बावड़ी के तले में पानी की एक बूंद भी नहीं झलकी थी। बावड़ी का साँय-साँय करता सूखा तल गाँव के ठाकुर समरथ दादा के दिल को बेचौनी से भर देता था। उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था कि इतनी दूर उत्तरी कुंड से पानी लाने की रैयत की तकलीफ से उठते निःश्वास से ही मानो दरबारगढ़ की दीवारों पर दरारें पड़ने लगी थीं! उसकी खातिर ही तो अभेसंग और बहु का दिया गया यह बलिदान…समरथ दादा मन ही मन भी यह वाक्य पूरा नहीं कर पाए। कल सुबह से ही पूरा का पूरा गाँव बावड़ी के चारों ओर जमा हो गया था। शना ढोली और उसका साथी कमर से पूरा झुककर नगाड़े बजा रहे थे। उनका प्रपौत्र और उसकी बहु-विवाहित जोडे के साज-सिंगार में सजे, हवा को भी तनिक धक्का न लगे ऐसी धीर वीर गति से चलते हुए माधबावड़ी की सीढ़ियाँ उतर रहे थे… और बावड़ी के सख्त पाषाण जैसे तले में दरार फूटी और पानी की चमकीली लकीर नजर आई। पोता-बहु पानी में जिन्दा समा जाएँ ऐसी अकाट्य बेला देखने की नियति से उन्हें गुजरना ही था- अन्य कोई चारा नहीं था। कल शाम की बेला में वे इसी झरोखे में अकेले बैठे थे। उसी वक्त गाँव का चारण आया, समरथ दादा के पाँव छूकर जमीन पर बैठ गया।
“बापू, आज यह हुक्का क्यों बेजान सा सूना पड़ा है?”
“चारण, आज मेरे लिये सब कुछ अग्राह्य है,” गहरी गुफा से आ रही हो ऐसी आवाज में वे बोले।
“बापू, आपकी बात सही है। जो घटा है वह दिल हिलाकर रख दे वैसा ही तो है! उसी के बारे में मुझे अंदर से एक कवित आ रहा है। दिल करता है, आपको सुना दूँ।
“हाँ, बोलिये जरूर, पर इस बात का खयाल रखियेगा कि हमारे दोनों के कान से उसकी आवाज दूर न जा पाए”। समरथ दादा की आवाज एकदम थकी-थकी और बोझिल थी। चारण ने हामी भर दी और हलके सर में कविता बोलना शुरु किया-
बारह-बारह साल बीत चले माधवाव खुदवाए, तल में बूंद पानी की न दिख पाए जी!
प्रथम पंक्ति सुनते ही दादा ने माची में सीना ताना और धीमी आवाज में बोले, “सुनाइये आगे चारण”। जाने-माने राज ज्योतिषी को बुलावा भेजकर आमंत्रित किया गया था… उंगलियों पर गिनती करके उन्होंने जो कहा था, वह उनकी स्मृति में आया। चारण बोल रहे थे-
“गिनानी जोशी कह रहे जी, बहु-बेटे को दियो बावड़ी के नाम!
घुड़सवार अभेसंग, वीर अभेसंग। बुलावा है जी दादाजी का…”
चारण की काव्यधारा बह रही थी। समरथ दादा एकदम ताजे अतीत में गोता खाते, ऊपर आते सुन रहे थे उसे-
“ये कोई भारी बात ही नहीं है जी ददु…”
अंत में चारण ने समापन किया- “यह अभागा पानी कौन पियेगा जी रे…”
“बापू, कविता को अभी सँवारना बाकी है, ये तो मुझसे रहा नहीं गया…” समरथ दादा की आँखों से आँसु की मानो धारा बह रही थी। वे जबरन बोले
“बारोट, बावड़ी के पानी की ओर देखता हूँ तो मुझे भी अभेसंग और बहु ही नजर आते हैं। पर वह पानी कातिल नहीं है। गाँव की प्रजा की पानी की जो तकलीफ थी उसी के कारण तो बावड़ी खुदवाई थी। पर हमारे राज के भाग तो देखो! बारह-बारह साल तक पानी की बूंद भी नहीं निकली! कितनी बहुओं की जिन्दगानी तकलीफ में बीती! कईयों ने तो अपनी बेटियों को गौने के बाद यहाँ ससुराल के गाँव भेजा ही नहीं। उनके जीवन में अमृतधारा बहे इसी वास्ते तो अभेसंग और… दादा ने बात बीच में ही छोड़ दी।
“जी बापू, आप सही कह रहे हैं।”
“चारण आप इस कवित्त को अपने पास संभालकर रखिये। हमारी रैयत के कलेजे में बावड़ी के पानी को जमने दो, वरना अभेसंग से बढ़कर और कौन अमरत्व के काबिल हो सकता है भाई! पर इस वक्त अपने अंदर के कवि को बांधे रखना ही उचित होगा”।
“आपके कहने भर की देर थी, मेरी मति को सही क्या है यह समझने में। यह सही वक्त नहीं है। ये जो पानी भर रही बहुएँ हैं, वे जब अपने पाँव लम्बे कर आराम से बैठेंगी, और उनकी बहुएँ पानी भरने लगेंगी तब यह कवित्त गाँव के लोगों के बीच सुनाऊँगा। तब तक मेरे सीने में उसे सहेजकर रखंगा।” अंदर की आवाज सुनकर बोल रहे हो इस तरह चारण ने कहा।
चारण ने उठकर विदा ली। माधबावड़ी के पानी को अपने सर आँखों पर लगाने के बाद अन्नजल के बगैर रहे समरथ दादा की वह रात यहाँ से वहाँ करवटें बदलने में ही बीती। पर सुबह होते ही पानी भर रही गाँव की बस्ती को देख उनके मन में संतोष छा गया। बावड़ी की ओर भरे मन से देख रहे दादा की आँख में बावड़ी की विपरीत दिशा से तेज कटार के झटके समान कुछ गिरा हो ऐसा उन्हें महसूस हुआ। उन्होंने उसी दिशा की तरफ चहेरा घुमाया। कोई औरत पानी की गागर लिये आ रही थी। उसकी पीतल की गागर से टकराकर सूरज की किरणें ही उनकी आँखों में लगी थीं। ये सामने वाली माधबावड़ी को छोड़, पाँच कोस दूर के कुंड से पानी भरने ये कौन चला है? उसे ऐसा क्यों करना पडा? कई प्रश्न उठे उनके मन के भीतर। सूरज के जगमग गोले को अपनी गागर पर घुमा रही वह औरत दरबारगढ़ की ओर ही मुड़ी- अरे यह तो देवलबहु की चाकरबाई सोमी है!… उस औरत के नजदीक आने पर उन्होंने उसे पहचाना। सीढ़ी उतरकर वे दरबारगढ़ के आँगन में पहुंचे। उन्होंने पूछा, “सोमी, तुम किस ओर से पानी ला रही हो?”
“वो उत्तरी कुंड से, बापुसा”, सोमी थोड़ी एक तरफ घूमकर खड़ी रह गई। मर्यादा जताने के लिये उसने अपनी चुनरी का चूंघट थोड़ा ज्यादा आगे की ओर खींच लिया।
“सोमी, वह कुंड तो कितनी दूर है! गाँव के लोगों के वहाँ तक पानी भरने के लिये जाने के झंझट से बाज आकर ही तो हमने यह बावड़ी बनवाई है…” चारण ने बीती रात जो कही थी वह पंक्ति मन में उभर आने पर उनका गला थोड रुंध गया।
“बापुसा, बात आपकी सही है…” इससे ज्यादा सोमी से बोला नहीं गया। गाँववालों की तकलीफ से आहत ठाकुर ने बावड़ी में पानी भर आए इसके लिये क्या-क्या नहीं किया था! कौन नहीं जानता था वह हकीकत!
“तो फिर बोल सोमी, इतनी दूर तक क्यूँ जाना पड़ा तुझे?”
“देवलबा कहती है…” आगे बोलने से सोमी अचकचा गई, किस मुंह से बोले वह सही वजह! पर गाँव के ठाकुर पूछ रहे हों और वह जवाब न दे तो मर्यादा भंग हो सकता है। उसने कहा, “देवलबा कह रही है…कि… वह उत्तरी कुंड का पानी ही मुंह में डालेगी और स्नान भी उसी पानी से… “वाक्य पूरा करना उसके बस में नहीं था।
“ऐसा वह क्यूँ कह रही है?”
“हम तो चाकर मानुष ठहरे! वह जो बोलेंगी उसी के मुताबिक…”
“सही है तुम्हारी बात! तुम ज्यादा क्या बोल पाओगी! ठीक है, तुम जाओ रनिवास में और देवलबहु को बोलो कि दादा ने बुलावा भेजा है, यहाँ आँगन में ही आए।”
सोमी गढ़ के अंदर चली गई। थोड़ी देर के बाद लंबा चूँघट निकाले देवलबहु हल्के पाँव आँगन में आई। जमीन पर ही पाँव पीछे की ओर मोड़कर, अपनी पहनी हुई चुनरी के पल्लु को फर्श पर फैलाकर, अपना सिर दादा के चरणों में झुकाकर, वह पुतले की तरह बैठ गई। दादा बेचैन हो गए।
“देवलबहु, हिवड़े में धीरज रखो और बहुमा, इस तरह मत बैठो। आपको इस तरह बैठा देखकर मेरा मन भर आया है”।
लम्बे बिछाए पल्लु को सहेजकर देवल ने सिर को जमीन से ऊपर उठाया। पर धूंघट को वैसा ही हाथभर लम्बा रख, जमीन पर ही बिना हिले-डुले निःशब्द बैठी रही।
“बोलो बा, बोलो तुम! क्या बात है?” समरथ दादा ने उत्कंठा से पूछा।
“मुझे आज्ञा दीजिये, मैं उत्तरी कुंड पर छप्पर डालकर वहीं बास करना चाहुँ”, आखिरकार देवलबहु ने कहा।
“क्या?” समरथदादा बेहद चौंक गए। “क्या कहती हो बहु? तुमने सोमी के पास से उत्तरी कुंड से पानी मँगवाया। वहाँ तक जाने की हम सब की तकलीफ के चलते तो सामने वाली बावड़ी बनवाई थी। बारह साल तक कितने प्रयत्न किये फिर भी एक बूंद…” वे थोड़ा सा रुके, फिर बोले, “तभी तो राज जोशी को बुलाना पड़ा…” आगे कैसे कुछ बोल पाते दादा! गला साफ करते हुए वे फिर बोले, “वह पानी तो हमरे अभेसंग और उसकी बहु की हम सब पर बरसी कृपा है, बहुमा…!”
एकदम सही कह रहे हैं, बापुसा”, देवल ने कहा। समरथ दादा को डर था कि देवलबहु के गले से रुदन फूट पड़ा तो! पर, ना… उसकी आँखों से आँसु नहीं निकले। उसकी आवाज एकदम रूखी सूखी थी, बिना घी की रोटी जैसी। बेटे-बहु को बावड़ी को अर्पित करने की बात राजजोशी ने कही। समरथ दादा ने सुना था… कि… देवलकुंवर के बेटे अभेसंग को बुलावा भेजा गया था तब से लेकर, बेटे-बहु जिन्दा ही बावड़ी में समा गए… तब तक पूरे गाँव के लोगों की आँखों का पानी थम नहीं रहा था। पर एक देवलबहु थी जिसने अपनी आँख से पानी की एक बूंद भी नहीं बहाई थी। वरना राजजोशी के जोश के बाद उन्हें देवलबहु के बारे में ही सबसे ज्यादा फिकर थी। समरथ दादा के खुद के चार बेटों में से दो युद्ध में काम आ गए थे। उन्हीं में से एक देवल का पति था। एक को बेटी ही थी। दो बेटों को एक-एक बेटा था। पर उसमें से एक को शीतलामाता के कोप से दाग-धब्बे थे, और दूसरे को बचपन में ही कुछ घाव हो गया था। वैसे भी अभेसंग सबसे बड़ा था। उसकी बहु का गौना हो गया था और वह एक दूध पीते बच्चे की माँ भी बन गई थी। राज जोशी ने जोर देकर बोला था- बावड़ी को सुपुर्द करना है तो बत्तीस सुलक्षणवाला ही चाहिये। बावड़ी के पास इकट्ठी हुई हजारों की भीड़ में से उठ रहे जय-जयकार के बीच देवलबहु के बेटे-बहु ने सबसे पहली सीढ़ी पर जैसे ही पाँव रखा कि सातमंजिल बावड़ी के तले में पानी की लकीर फूट आई। वरना अब तक लोहे की छड़ से तले की भूमि को जी-जान से लगातार खोदते कारीगर भी थक चुके थे। इस विश्व के दो पालन-पोषण करने वाले मात, स्वरूप तत्त्व पानी और धरती! धरती ही यहाँ जल को रूंध रही थी! जगह नहीं दे रही थी! इसलिए तो बेटे-बहु के जीवन समर्पण जैसी अनहोनी हो रही थी। दादा की नजर बावड़ी के तले में झलक रहे जलरेखा की चमक पर थी, पर उनका चित्त तो देवलबहु की ओर था। कहीं वह काठ बनकर जमीन पर गिर न जाए! नहीं, ऐसा नहीं हुआ। शायद उसने कलेजे पर पत्थर रख लिया था। जिसका बेटा-बहु सदेह बावड़ी में समा गए थे, उस माँ को वे देखते रह गए…बगैर कोई शब्द बोले, निःशब्द वह जमीन पर बैठी रही। फिर तनिक रुककर बोली-
“बापुसा, उस पानी में मुझे बहु की चुनरी और अभेसंग का सिंदूरी साफा तैरते हुए दिखाई देते हैं”।
“अभागे नीर कौन पियेगा जी रे…” दादा के मस्तिष्क में फिर से वह पंक्ति कौंध गई। वे बोले-
“बहु वह रंग रक्त का नहीं, वह तो कुंकुमवरणा रंग है। बेटे बहु की चुनरी और साफा तो हमारे राज की प्रजा पर पीढ़ी दर पीढ़ी छाया रहे ऐसा छत्तर है, बहु!”
“जी बापुसा, आपकी बात सोलह आने सही है। इस माधबावड़ी में इतना पानी छलक रहा है! गाँव के लोगों की आँख से निकला पानी ही इसमें कितना सारा होगा! पर बापुसा, मेरी आँख से मैंने एक बूंद पानी भी निकलने नहीं दिया। मेरे बेटे-बहु ने जो बीड़ा उठाया था उसे बट्टा नहीं लगने देना था मुझे। मेरी आँख से निकली एक बूंद भी अगर बावड़ी के पानी में घुल जाती तो बावड़ी का पानी हमारी बस्ती के लिये निरा खारा-खारा हो जाता!”
अपने बेटे बहु को राज की रैयत की खातिर जीवन का बलिदान करते, पानी में समाते देखने वाली माता के हृदय की धरती समान समझदारी देख दादा भावविभोर हो गए।
“हाँ, तो बहुमा, तुम तो राज की प्रजा के लिये पलभर में जान निछावर करने के लिये तैयार हो जाने वाले बेटे-बहु की जनेता हो। तभी तो अभेसंग गेंदलड़ी खेलते वक्त पानी में गिर गई गेंद को लेने जा रहा हो उसी सहजता से बावड़ी की सीढ़ियाँ उतर रहा था! गाँव की बहुओं के घड़ों पर झगमग होते सूरज को देख रही हो न! और उन सब के हृदय से उठती सुकून की शीतलहर ही तो हमारे बेटा-बहु हैं!”
“इन्हें देखकर मेरे दिल को बहुत संतोष मिलता है जी, ये सब हमारे बच्चे सरीखे ही तो हैं बापुसा!” ।
“तो बहु इस पानी को अग्राह्य नहीं करते! तुमने बावड़ी के पानी को सर-आँखों पर लिया है या नहीं?”
समरथ दादा के इस प्रश्न पर देवलबहु थोड़ा सकुचा गई, फिर उठ खड़ी हुई। दरबारगढ़ के चारों ओर बरामदे में दरबारगढ़ के रहने वाले इकट्ठ होकर खड़े थे। जिसका बेटा-बहु बावड़ी में समा गए थे उस जनेता से आँख मिलाना भी सब के लिये दुष्कर था। देवल के आसपास की हवा भी शायद थम गई थी। दादा के बुलावे पर वह आँगन में गई थी तब से सबके हृदय में धक-धक हो रही थी। बरामदे में ही स्थित देवस्थान से देवल ने कुंकुम पात्र लिया। फिर एकदम ही मंदगति से वह दरबारगढ़ की दहलीज से निकलकर बावड़ी की ओर जाने लगी। पीछे समरथ दादा चल दिये। दरबारगढ़ के कई लोग भी पीछे-पीछे चल दिये। बावड़ी के पास पहुँचकर, देवलबहु बावड़ी की दूसरी सीढ़ी पर पाँव रखकर खड़ी हो गई। पाँव पानी में रखे, उसने हाथ पिछवाड़े लेकर चुनरी का पीछेवाला हिस्सा खींचकर चूंघट ऊँचा किया। अपनी उंगली पानी में डुबोई। गीली उंगली सिर पर और बाद में जीभ के आगे वाले हिस्से पर लगाई। कुंकुमपात्र से कुंकुम की चुटकी लेकर बावड़ी के पानी में छोड़ दी। उलटे पाँव ही वह बावड़ी की सीढ़ी चढ़ गई और दरबारगढ़ की ओर चूंघट आगे खींच कर चलने लगी। इस बार तो वह अतिशय मंद गति से चल रही थी। उसके पीछे चलने वाले कहीं उससे आगे न निकल जाएँ इस बात का खयाल करके चल रहे थे। दरबारगढ़ तक पहुँचने पर देवल वहीं रुक गई, अंदर नहीं गई।
“देवलबहु, आओ अंदर!”
“बापुसा, अब मुझे अनुमति दीजिये। मैंने बावड़ी के पानी को सिर-आँखों पर ले लिया है। वह पानी तो अमृत जैसा ही है- आपने सही कहा था। सूरज और चन्द्र जब तक रहें तब तक बावड़ी का पानी भी आज की तरह ही छलकता रहे, इतनी ही रब से गुजारिश है। पर मैं ये पानी नहीं देख पाऊँगी। उसी में समाए बेटे-बहु के पीछे मैं अन्न-जल छोड़ दूँ और देहत्याग करूँ तो दरबारगढ़ और अभेसंग के किये पर पानी फिर जाएगा। पर यह पानी देखते रहना मुझसे नहीं होगा। मुझे कुंड के किनारे झोंपड़ी बनानी है। मुझे सम्मति दीजिये। मेरी आँखों में आँसुओं का जमघट बैठा है, उसे उत्तरी कुंड में बह जाने दो”, कहते हुए देवल फिर से ससुर के आगे धूल में बैठ गई।
उठो बहुमां, मेरे अभेसंग और सतीमा को गाजे-बाजे के साथ विदा दी, अब तुम्हें किस मुँह से ‘ना’ कहूँगा। जी को दु:खी मत करो। अमृत तो हम जैसे मिट्टी के पुतलों को चाहिये। तुम और तुम्हारे अंश के तो दिल ही अम ‘त से भरे हैं। जाओ मां, खुशी-खुशी जाओ! पर एक ही कसक है हिवड़े में…। यह अभेसंग और सतीमाँ का बेटा…” समरथ दादा के मुँह से शब्द पूरे निकल पाएँ उससे पहले ही उनके एकदम पास से आवाज सुनाई दी-
“ठाकुर, इतना ही नाता जान पाए आप! मैं अभेसंग की दादी बैठी हूँ, बहुत कुछ संभालने के काबिल! बहु को अब यहाँ ज्यादा देर मत रोको। जाओ देवल बहु। जाओ तुम्हारे धाम!”
अरे, ये तो ठकुराईन! दादा चौंके। उन्होंने नजर उठाकर इर्द-गिर्द देखा। दरबारगढ़ के अंदर-बाहर भीड़ जमा थी पेड़ पर रखे पंखी को ही देखते अर्जुन की तरह वे खुद तो देवल बहु और माधबावड़ी के अलावा कुछ देख नहीं पा रहे थे। अभेसंग के दूध पीते बच्चे को बाँहों में सुलाए, पत्नी पास में ही थी। उसकी आँखों में माधबावड़ी में छलक रहे पानी की तरह वात्सल्य छलक रहा था।
देवल धूल में से उठकर खड़ी हुई। पीछे की ओर उत्तरी कुंड की दिशा में पाँव उठाया कि दादा बोल उठे-
“बहुमा, तुमसे एक विनती है- कुंड की ओर जाने के मोड़ तक के दस कदम दरबारगढ़ की ओर पीठ करके मत जाना। दरबारगढ़ तुम्हारी पीठ कैसे देख पाएगा? और माई… ये हाथ लंबा चूंघट ऊपर कर लो। गामदेवी को चूँघट शोभा नहीं देगा। जाओ, खुशी से जाओ! गाँव की देवी का स्थानक तो दूर-सुदूर ही होता है न! उत्तरी कुंड जो आजतक गाँव के लिये ‘आह’ था, अब गामतीर्थ हो जाएगा, गाँव का गौरव कहलाएगा”।
देवल ने, बावड़ी के पास किया था उसी तरह, हाथ पीछे की ओर ले जाकर घूघट ऊपर उठा लिया। मंद गति से डग भरने लगी, नीची नजर रखे, उलटे पाँव चलते वह जाने लगी। कुंड की ओर मुड़नेवाला मोड़ आने पर वह रुकी। रूखी आँखों में दरबारगढ़ को नजर में समा लिया। फिर सूखी आँखें लिये धीमे पाँव वह उत्तरी कुंड की ओर चलने लगी।
समरथ दादा उसे जाते हुए देखते रहे। बाद में दहलीज के पास वाले चबूतरे पर देवल ने रखे कुंकुमपात्र से कुंकुम की चुटकी देवल के पदचिन्ह पर रखते चले। मोड़ आने पर खड़े रहे, और नीचे की ओर झुककर देवल के पदचिन्ह पर से धूल से सने कुंकुम की चुटकी लेकर अपने माथे पर चढ़ाई। दादा अश्रुसिक्त आँखें बंद कर सिर्फ इतना ही बोल पाए,
“आपका जाना हमारे ‘सर-आँखों पर’ देवलमाँ!”
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
