Khush Rehne ka Matra
Khush Rehne ka Matra

Best Kahani in Hindi: ‘खुश रहने का एक ही मंत्र है बेटा और वह है सबकी हां में हां मिलाते हुए अपना सिर भी हिलाते रहो। उनके सुर में सुर मिलाते रहो।’

मैं खुश रहने के मंत्र की तलाश में काफी दिनों से इधर-उधर भटक रहा था, लेकिन मुझे आज तक खुश रहने
का कोई मंत्र नहीं मिला। अब मैं आपको थोड़ा विस्तार से बतलाता हूं। मैं अपने जीवन में बड़ा ही दुखी और परेशान रहा हूं। मेरे पास सब कुछ है किंतु खुशी नहीं है। खुशी न होने से मेरे पास ‘सब कुछ’ कुछ नहीं के बराबर है। एक दिन मैं खुश रहने के मंत्र को जानने के लिए अपने शहर के कुछ लोगों, जिनमें छोटे-बड़े, दुबले-मोटे, ज्ञानी- महाज्ञानी और विज्ञानी सभी तरह के लोगों से मिला और उनसे पूछा कि मुझे खुश रहने का कोई मंत्र बताओ। वे बेचारे मेरी ही तरह खुश रहने के मंत्र की खोज में थे। भला वे कैसे बताते कि
खुश रहने के मंत्र क्या होते हैं। फिर भी कुछ महान विभूतियों ने अपनी अक्ल के गेट खोल कर मुझे बताया कि खुश रहने का मंत्र यही है कि दुख होने पर भी दुखी न दिखो।

उससे दूर-दूर ही रहो। मुझे उन परम ज्ञानीजी की बात बिलकुल ही नहीं जंची और मैं उदास मन से उठ कर चला आया। अबकी बार मैं एक सफेद दाढ़ी मूंछ वाले बाबा के पास गया और वही प्रश्न किया। वे बाबा अपनी लंबी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले’ खुश रहने का एक ही मंत्र है बेटा और वह है सबकी हां में हां मिलाते रहो। उनके सुर मे सुर मिलाते रहो। साथ ही गाते रहो ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा…! किसी भी भले मानुस की बात पर ‘नहीं’ शब्द मत बोलो। बहुत से लोग ‘नहीं’ शब्द सुनने के आदी नहीं होते हैं। इसलिए उनके सम्मुख ‘नहीं’ शब्द न तो निकालो और न इस तरह के विचार ही प्रकट करो। समझे कि नहीं…! मैंने जबरदस्ती मुंडी हिला कर कहा, ‘हां महाराज, कुछ-कुछ समझ रहा हूं। वे चौंक कर बोले, ‘कुछ-कुछ से तुम्हारा अभिप्राय क्या है? मैंने मिमियाते हुए कहा, ‘कुछ-कुछ से मतलब सब कुछ से है महात्माजी। मुझे एक बार फिर निहारते हुए वे उवाचे, ‘अब आगे की बात सुनो- जैसे आप अपनी पत्नी को खुश रखोगे तो वह वैसे ही तुम्हें भी खुश रखेगी। जानते हो उसकी खुशी क्या होगी? उसकी खुशी यही होगी कि वह जो जो कहती जाए तुम उसे वैसे वैसे ही मानते चले जाओ। इसी में तुम्हारी खुशी है। ‘लेकिन बाबा कभी-कभी नहीं बोलना भी जरूरी हो जाता है। मैंने अपनी बीती हुई दर्दभरी अनुभूति की बात कही तो वे नाराज हो कर बोले, ‘बस, यही तो कमी है, जरा सी बात भी अपनी पत्नी की नहीं मान सकते! जब तुम अपनी पत्नी को खुश नहीं रख सकते तो फिर तुम किस उम्मीद से खुश रहने की
जिद करते हो! बेचारी पत्नी जरा कुछ अपनी बात कहती है कि पति महाशय तुरंत उसके विरूद्ध खड़े हो जाते हो और उसे नाखुश कर देते हो। भले आदमी दुखी होने का कारण तो तुम स्वयं ही हो।

बात मेरी समझ में आ गई थी, लेकिन हर बात में पत्नी की हां में हां मिलाना समझदार पति के लिए तो ठीक हो सकती है, परंतु मेरे जैसे-टेड़े आदमी के लिए वह ठीक कैसे हो सकती थी। मुझे इन बाबा की बात भी नहीं जमी और मैं वहां से नाखुश होकर एक-दूसरे परम ज्ञानी के पास गया और अपना रोना रोया। मेरे रोने पर वे मंद-मंद मुस्कुराए।
शायद हर ज्ञानी पुरुष मेरी तरह रोने वाले हर आदमी पर इसी तरह से मुस्कुराता है। यह बात मैं अच्छी तरह से समझ गया था, परंतु इसके अलावा मेरे पास और कोई दूसरा उपाय भी नहीं था।

परम ज्ञानी पुरुष ने कहा, ‘पहला तो यह कि किसी की बात को कान लगा कर ध्यान से सुनो। यदि वह कुछ पूछे तो उसके बारे में बताओ, यदि वह नहीं पूछे तो अपनी तरफ से तुम्हें कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है।
दूसरी बात यह कि यदि दो या दो से अधिक लोगों में कोई बात चल रही है तो उनकी बात में अपनी टांग न अड़ाओ।
और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दूसरे क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं? इन सबके लफड़े में बिल्कुल भी पड़ने की जरूरत नहीं है तुम केवल अपने काम से काम रखो।

न किसी से अकल लो और न किसी की नकल करो। जब तुम जैसे अक्लमंद से कोई कुछ भी पूछ नहीं रहा है तो तुम्हें क्या जरूरत है दूसरों से पूछने और बताने की। तुम अपने आपको अति महत्वपूर्ण मानो कि मुझ जैसा
कोई नहीं है और सबको अपने से कमतर समझो। अपने आपको श्रेष्ठ और अपने काम को सर्वश्रेष्ठ और सर्वोपरि समझकर करते चले जाओ। यदि कोई तुमसे कुछ पूछना या जानना चाहता है कि तुम क्या कर रहे हो तो उसे यही छोटा सा जवाब दो कि समय आने पर तुम्हें सब कुछ मालूम हो जाएगा, अभी मुझे अपना काम करने दो। उस व्यक्ति को ज्यादा भाव मत दो। तुम्हारा काम ही तुम्हारा नाम करेगा और तुम्हें खुशी देगा। समझ गये ना। यही जीवन का असली मंत्र है, खुशी का मंत्र है। यह कह कर परम ज्ञानी पुरुष ने अपने मुंह के साथ साथ अपनी आंखे भी बंद कर ली।
कहने का मतलब यह कि उनका मंत्र ज्ञान का चैह्रश्वटर पूरा हो गया था। मुझे उनकी बात ठीक लगी थी। इसलिए उठ कर खड़ा हुआ। फिर उनके श्री चरणों में पांच सौ का गांधी छाप नोट रख दिया और उन्हें प्रणाम कर अपने घर लौट आया।