Moral stories hindi ‘Kon jita kon hara’
पात्र-परिचय हवा दीदी निक्का, निक्की और मोहल्ले के अन्य बच्चे कौओं की टोली और उनका राजा मेघवर्ण कौओं का चतुर मंत्री स्थिरजीवी उल्लुओं की टोली और उनका राजा अरिमर्दन उल्लुओं का चतुर मंत्री रक्ताक्ष
पहला दृश्य
(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान, जिसमें एक तरफ बच्चे खड़े-खड़े बातें कर रहे हैं। तभी हवा तेजी से बहती हुई आती है और बच्चों को मजे से बातें करते और खेलते देख, ठिठक जाती है। फिर हवा दीदी बच्चों के पास आकर बड़े उत्साह से बताने लगती है….)
हवा दीदी : अरे वाह, भई, मेघवर्ण ने भी क्या चाल चली? कैसा अजब चक्रव्यूह बनाया? मैं तो नाटक देखकर हैरान रह गई। बेचारे अरिमर्दन की तो बुरी हालत हुई, बहुत बुरी।
निक्का : (हैरानी से) कौन मेघवर्ण हवा दीदी, कौन अरिमर्दन…?
निक्की : क्या आप जंगल में गज्जू दादा का फिर कोई नया नाटक देखकर आ रही हो हवा दीदी?
हवा दीदी : (प्यार से सिर हिलाते हुए) हाँ भई, हाँ। अरे यह तो मैं तुम्हें बताना ही भूल गई कि जंगल में गज्जू दादा रोज पंचतंत्र का एक नया नाटक पेश करते हैं। इतने बढ़िया ढंग से क्या कहें? उसे देखते ही मेरा मन होता है कि चलकर अपने प्यारे निक्का, निक्की एंड बच्चा कंपनी को भी यह नाटक दिखा दूँ।
निक्का : अरे, यह तो अच्छी बात है हवा दीदी, बहुत अच्छी बात।
निक्की : तो फिर हमें दिखाइए ना यह मजेदार नाटक। पर हाँ, पहले यह तो बता दीजिए कि मेघवर्ण कौन था और अरिमर्दन कौन था?
हवा दीदी : अरे भई, मेघवर्ण तो बादलों की तरह काला था। तुम समझ ही गए होगे, यह था कौओं का सरदार। और उल्लुओं का सरदार था अरिमर्दन। बहुत समय से कौओं और उल्लुओं में तनातनी और झगड़ा चला आता था। पर इस बार तो मेघवर्ण ने ऐसा दाँव चला, ऐसा दाँव चला कि अरिमर्दन और उसकी सेना का सफाया हो गया। एकदम सफाया।
निक्का : अरे, तब तो यह नाटक हम भी देखेंगे।
निक्की : जरा देखें तो, मेघवर्ण ने किया क्या?
हवा दीदी : (हँसते हुए) अच्छा लो, देखो यह नाटक। तुम खुद समझ जाओगे।
दूसरा दृश्य
(कौओं के राजा मेघवर्ण ने घने जंगल में एक विशाल वटवृक्ष पर अपना डेरा डाला हुआ है। वहाँ उसने अपने लिए एक मजबूत किला बना रखा है, जिससे कोई शत्रु उसका या किसी भी कौए का अहित न कर पाए। फिर हजारों कौए हर वक्त उसकी सेवा में लगे रहते हैं। मेघवर्ण के मंत्री भी बड़े ही स्वामिभक्त हैं जो हर वक्त उसकी सेवा के लिए तैयार रहते हैं।)
कौओं की टोली : (एक साथ) हमारे राजा मेघवर्ण की जय हो।
दूसरी टोली : (जोश में नारे लगाते हुए) जय हो, जय हो, राजा मेघवर्ण की जय हो।
(जिस बरगद के पेड़ पर मेघवर्ण रहता है, उससे कुछ दूर ही उल्लुओं का राजा अरिमर्दन भी रहता है। वह बड़ा क्रूर है और कौओं का तो पक्का वैरी है। जो भी कौआ अकेला दिखाई देता है, उसे अरिमर्दन के सैनिक उल्लू पकड़कर मार डालते हैं। इससे कौओं के दल में बड़ा आतंक फैल गया है और सभी बड़े दुखी हैं।)
मेघवर्ण : (अपने आप से) अरे, यह क्या हो रहा है? कोई न कोई भारी गड़बड़ जरूर है। उसके संकेत बड़े साफ नजर आते हैं। कुछ दिनों से अरिमर्दन के किले में बड़ी तेज गतिविधियाँ चल रही हैं। बहुत सारे उल्लू हमारे किले के चारों ओर उड़ान भरते हुए हर वक्त टोह लेते रहते हैं। यह तो चिंता की बात है, बड़ी चिंता की बात। आखिर कुछ न कुछ तो करना होगा। मुझे अपने मंत्रियों से सलाह करनी चाहिए।
(पंखों से इशारा करके मंत्रियों को बुलाता है।)
मेघवर्ण के मंत्री : आदेश दीजिए महाराज। आप कुछ चिंतित लग रहे हैं। बताइए, हमें क्या करना है?
मेघवर्ण: (कुछ गंभीर होकर) इधर कुछ दिनों से लक्षण तो आप देख ही रहे होंगे। दुश्मन की सेना की हलचल बढ़ती जा रही है। यह साफ-साफ शत्रु-सेना के हमले की निशानी है। उनकी दुष्टतापूर्ण गतिविधियाँ हर घड़ी बढ़ती जा रही हैं। हमें भी कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। और जल्दी, बहुत जल्दी।
मेघवर्ण के मंत्री : हाँ महाराज, आप ठीक कह रहे हैं। यह बड़ा चुनौतीपूर्ण समय है। हमें होशियारी से शत्रु-पक्ष की चालों का जवाब देना चाहिए। नहीं तो हम सभी के लिए संकट पैदा हो जाएगा।
(मेघवर्ण का मंत्री स्थिरजीवी बड़ा बुद्धिमान और भरोसेमंद था। उसने मेघवर्ण की ओर एक छिपा हुआ इशारा किया। फिर तत्काल पैंतरा बदलकर…)
स्थिरजीवी : महाराज, उपाय तो जरूर है, जिससे हम शत्रु के हमले से बच सकते हैं। पर मुझे शक है कि आप उसे नहीं मानेंगे। वैसे भी आप कौन से बुद्धिमान राजा हैं! बल्कि सच कहूँ तो मैं आपको मूर्ख ही समझता हूँ। आप जैसा मुर्ख राजा होगा तो प्रजा कभी सुखी होगी ही नहीं।
(सुनकर मेघवर्ण गुस्से के मारे आगबबूला हो गया। दूसरे मंत्रियों की भौंहें भी टेढ़ी हो गईं।)
मेघवर्ण के मंत्री : महाराज, लगता है कि यह स्थिरजीवी दुश्मन का जासूस बन गया है और हमारी गुप्त सूचनाएँ उन्हें देता है। यह हमारी नहीं, दुश्मन की बोली बोल रहा है। इसलिए इसे जीवित नहीं छोड़ना चाहिए। इसे हम अभी जान से मार देते हैं।
मेघवर्ण : (गरजकर) नहीं, तुममें से कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा। तुम इसे मेरे पास छोड़ दो। मैं इससे अच्छी तरह पूछूगा कि इसने शत्रु को हमारी कौन-कौन सी गुप्त सूचनाएँ दी हैं। फिर इसे तड़पा-तड़पाकर मारूँगा। ऐसे दुष्टों के लिए यही उचित है।
(मेघवर्ण के इशारा करने पर कौए वहाँ से चले गए। कुछ देर बाद मेघवर्ण स्थिरजीवी की ओर तीखी नजरों से देखता हुआ…)
अब तुम बच नहीं सकते। नालायक कहीं के, धोखेबाज। तुम्हें तो मैं अपने हाथों से मारूँगा। इतनी बुरी मौत मिलेगी तुम्हें कि तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा।
स्थिरजीवी : (ढिठाई से हँसता हुआ) मुझे किसी का डर नहीं है राजा। तुम्हारा भी। कर लो जो तुम्हें करना है।
मेघवर्ण : (गुस्से में) अच्छा, तो फिर यह ले।
(मेघवर्ण स्थिरजीवी को अपनी चोंच से बुरी तरह घायल करके छोड़ देता है।)
स्थिरजीवी : (कराहता हुआ) हाय, इससे तो मैं मर ही जाता, तो अच्छा था।
मेघवर्ण : (गुस्से और नफरत से भरकर) अब तू यहीं पड़ापड़ा तड़पता रह। जब तक मौत न आए, तेरे कष्टों का अंत नहीं हो सकता।
तीसरा दृश्य
(स्थिरजीवी को वहीं पड़ा छोड़कर कौओं का राजा मेघवर्ण उड़ गया। स्थिरजीवी उसी पेड़ के नीचे घायल पड़ा था जिस पर कौओं के राजा मेघवर्ण का किला था। जल्दी ही उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को उसके जासूसों ने सूचना दी।)
अरिमर्दन : (हँसते हुए) अरे वाह, यह तो कमाल की बात है, बड़े ही कमाल की बात कि कौओं का राजा मेघवर्ण अपना किला छोड़कर कहीं चला गया है। खुशी मनाओ, झूमो नाचो। दुश्मन हमसे डरकर भाग खड़ा हुआ। आहा-हा, बड़े दिनों बाद यह खुशी का दिन आया है। आज सब लोग जी भरकर जश्न मनाएँगे। हाँ, पहले झटपट आप लोग दुश्मन के किले पर अधिकार जमा लीजिए।
(अरिमर्दन का आदेश सुनते ही ठठ के ठठ उल्लू आए और उन्होंने झटपट मेघवर्ण के किले पर कब्जा कर लिया। वे खुशी से भरकर आनंद और जश्न मनाने लगे।)
अरिमर्दन : (खुशी से गद्गद होकर) आज सबको आजादी है, पूरी आजादी। आज कोई किसी को न रोके।
(पर एकाएक किसी उल्लू की निगाह उस पेड़ के नीचे घायल पड़े स्थिरजीवी पर पड़ी। उसने बाकी उल्लुओं को भी इस बारे में बताया।)
एक उल्लू : (हैरान होकर) देखो-देखो, यह कौन है, यह कौन?
दूसरा उल्लू : (आँखें नचाता हुआ) हाँ-हाँ, कौन-कौन-कौन…? कौन-कौन-कौन?
एक उल्लू : (गरदन उचकाता हुआ) कौन-कौन-कौन…? कौन-कौन-कौन?
(देखते ही देखते यह बात उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को भी पता चली। उसने अपने सभी मंत्रियों से सलाह ली। उनमें रक्ताक्ष सबसे अधिक चतुर और बुद्धिमान था। उसने सबको सावधान किया।)
रक्ताक्ष : देखो भाइयो, स्थिरजीवी कौआ भले ही घायल हुआ हो, पर हमारे लिए कम खतरनाक नहीं है। हमें यह नहीं भूलना नहीं चाहिए कि यह शत्रु राजा का मंत्री था। हमें इसका हरगिज भरोसा नहीं करना चाहिए और इसे जीवित नहीं छोड़ना चाहिए।
(लेकिन बाकी मंत्रियों ने रक्ताक्ष की बात का विरोध किया…)
एक मंत्री : नहीं महाराज, इस घायल कौए को मारना तो बेहद क्रूरता वाली बात है।
दूसरा मंत्री : इसकी बातों से भी लग रहा है कि अब यह कौओं के सरताज मेघवर्ण के साथ नहीं, बल्कि हमारे साथ है।
तीसरा मंत्री : फिर इसे मारकर हमें क्या मिलेगा?
रक्ताक्ष : (तीखे स्वर में) लेकिन महाराज, मैं फिर कहूँगा कि शत्रु-दल के किसी भी प्राणी पर दया करना अपनी आत्महत्या जैसा है। इसे हमें तत्काल मार देना चाहिए, नहीं तो हम सभी संकट में ही पड़ जाएँगे।
स्थिरजीवी : (अपने आप से) अरे, इस रक्ताक्ष के कारण मेरी तो कोई चाल चल ही नहीं पा रही। मुझे कुछ और नाटक करना चाहिए।
(एकदम करुण स्वर में अरिमर्दन से) महाराज, लगता है, मैं अब भी अपना विश्वास नहीं दिला सका हूँ। तो फिर मेरे जीने का फायदा ही क्या? आप जल्दी ही आग का प्रबंध कीजिए ताकि मैं उसमें जल मरूँ। शायद आग में जलकर ही मुझे मुक्ति मिले!
(इस पर सभी की आँखें भीग गईं, पर रक्ताक्ष के चेहरे पर बड़ी कठोरता थी। बड़े ही व्यंग्यपूर्ण शब्दों में…)
रक्ताक्ष : हे महानुभाव, आप ऐसा क्यों करना चाहते हैं ?
स्थरजीवी : (बात बनाता हुआ) असल में मेरे अंदर कौए के रूप में जीने की कतई इच्छा नहीं है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि कौए दुष्ट और विश्वासघाती होते हैं। मेरी इच्छा है कि आग में जलकर अगला जन्म एक उल्लू के रूप में लूँ, ताकि मेरा जीवन सार्थक हो सके।
रक्ताक्ष : (फिर से व्यंग्य वचन कहते हुए) आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? कोई जरूरी तो नहीं कि कौए ही दुष्ट और विश्वासघाती हों। उल्लू भी तो दुष्ट और विश्वासघाती हो सकते हैं। क्या यह बात ठीक नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप नाटक कर रहे हों।
(पर स्थिरजीवी की भावुकतापूर्ण बातों का अरिमर्दन पर गहरा असर पड़ा।)
अरिमर्दन : देखो भाई रक्ताक्ष, यहाँ मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ। तुम बेकार शक कर रहे हो। इस घायल कौए की बातों में बड़ी गहराई और सच्चाई है। मुझे तो लगता है, यह बिल्कुल हमारे ही मन की बातें कह रहा है। इसलिए इसे मारने की बजाय हमें इसे अपने साथ मिला लेना चाहिए।
एक मंत्री : बात तो ठीक है।
दूसरा मंत्री : हाँ-हाँ, बात तो ठीक है।
तीसरा मंत्री : बिल्कुल ठीक।
रक्ताक्ष : (गुस्से में आकर) अब मैं यहाँ एक पल भी नहीं ठहर सकता। यहाँ विनाश अवश्यंभावी है। कृपया मुझे जाने की इजाजत दें।
(गुस्से में आकर रक्ताक्ष उसी समय किले से बाहर चला जाता है।)
चौथा दृश्य
(रक्ताक्ष के जाने के बाद स्थिरजीवी मन ही मन बड़ा खुश था। अपने आप से…)
स्थिरजीवी : उल्लुओं के दल में केवल यही एक बुद्धिमान था, जिससे मुझे खतरा था। अब यह चला गया तो कोई मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। अब मैं यहाँ मजे में रहूँगा और अपने राजा मेघवर्ण की योजना के अनुसार काम करूंगा।
(अब स्थिरजीवी मजे से उल्लुओं के बीच में रहने लगा। वह ऊपर से उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को भाने वाली चिकनी-चुपड़ी बातें करता था। पर अंदर ही अंदर मौके की तलाश में था कि कब इन उल्लुओं का सर्वनाश किया जाए?)
स्थिरजीवी : (अपने आप से) बस, अब मैं अच्छी तरह जम गया। अब मैं जरा इन उल्लुओं को दिखाता हूँ कि मैं क्या कर सकता हूँ? अरिमर्दन का सर्वनाश नहीं किया, तो मेरा नाम स्थिरजीवी नहीं। अपना काम पूरा होते ही मैं अपने प्यारे राजा मेघवर्ण से जा मिलूँगा, हःहःहः।
(थोड़े ही दिनों में स्थिरजीवी खूब खा-पीकर मोटाताजा हो गया। फिर वह शत्रु के किले में बेहिचक यहाँ से वहाँ भ्रमण करने लग गया। उसने देखा कि उल्लुओं के राजा अरिमर्दन के किले में प्रवेश-द्वार तो है, पर बचकर भागने के लिए कोई संकट-द्वार नहीं है। अपने आप से…)
स्थिरजीवी : यह उल्लुओं के राजा की एक और बड़ी भारी गलती है। पहली गलती तो यही थी कि इसने मुझे शत्रु का मंत्री होते हुए भी छोड़ दिया और मेरी बातों का भरोसा किया। दूसरी गलती एक ऐसे किले में रहना है, जिसमें बचकर भागने के लिए कोई गुप्त द्वार ही नहीं। यही चीज इसके लिए काल बनेगी, काल!
(अब स्थिरजीवी उस किले के आसपास मजे में घूमता-फिरता। जब कभी वह घूमकर आता, तो अपनी चोंच में कुछ लकड़ियाँ ले आता। उन्हें उल्लुओं के राजा अरिमर्दन के किले के आसपास बिखरा देता। इस तरह उसने ढेर सारी लकड़ियाँ आसपास इकट्ठी कर लीं।)
एक उल्लू सैनिक : पता नहीं, यह स्थिरजीवी चोंच में लकड़ियाँ ले-लेकर क्यों आता है ? इसकी तो लीला ही न्यारी है। यों ही ऊटपटाँग काम करता रहता है। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि कहीं यह पागल तो नहीं?
दूसरा उल्लू सैनिक : अरे छोड़ो यार! जब हमारे राजा अरिमर्दन को ही फिक्र नहीं है, तो हम क्यों अपना दिमाग खराब करें? जो भी करता है, करता रहे। वैसे भी पागलों का क्या है, वे तो कोई न कोई अटपटा काम करते ही रहते हैं। फिर इसे तो हमारे राजा अरिमर्दन ने इतना सिर चढ़ा दिया है कि उनके सिवाय यह किसी की बात सुनता ही नहीं।
पाँचवाँ दृश्य
(कुछ दिनों बाद स्थिरजीवी ने कौओं के राजा मेघवर्ण को गुप्त संदेश भेजा।)
स्थिरजीवी : राजन, मैंने सारा काम कर दिया। बस अब आप झटपट सेना के साथ आ जाइए। विजय की बेला पास आ चुकी है।
मेघवर्ण (मंत्रियों और सेनापति से) हमें गुप्त खबर मिली है। शत्रु पर चढ़ाई करनी होगी। आप लोग झटपट तैयारी कीजिए।
(जल्दी ही मेघवर्ण कौओं के दल-बल के साथ वहाँ आ गया। सभी कौओं ने अपनी चोंच में जलती हुई लकड़ियाँ पकड़ी हुई थीं। आते ही उन्होंने उल्लुओं के राजा अरिमर्दन के किले में आग लगा दी। उसी समय आसपास पड़ी हुई लकड़ियों में भी आग लग गई।) अरिमर्दन : (चौंककर) हाय-हाय, हाय-हाय, यह क्या? उल्लू सेनापति : जान की फिक्र कीजिए महाराज। शत्रु सेना ने बुरी तरह हमला कर दिया। उल्लू मंत्री : मारे गए, हम सब मारे गए। एक उल्लू सैनिक : पर ये लकड़ियाँ तो स्थिरजीवी ने…? दूसरा सैनिक : हाँ-हाँ, वह पागल नहीं था। वह तो बड़ा कटनीतिज्ञ था, पागल तो हम साबित हुए। पहला सैनिक : हाय-हाय, हम मारे गए! हम सब मारे गए। (उल्लुओं के पास बचकर भागने का कोई रास्ता तो था ही नहीं। जो उल्लू बचने के लिए किले से बाहर निकलते, उन्हें कौए मिलकर मार डालते।) मेघवर्ण : (गरजकर) घेर लो सबको कोई बचकर जाने न पाए! कौआ सेनापति : मारो, मारो, सबको मारो! एक वीर कौआ : कोई दुश्मन बचकर जा ना पाए। दूसरा वीर कौआ : इन्होंने हमें बहुत सताया है। तीसरा वीर कौआ : पर आज हमारा दाँव लगा है। हम किसी को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। (देखते ही देखते अरिमर्दन और उल्लुओं की पूरी सेना घिर गई। अपनी नासमझी से उसने खुद ही अपने विनाश को आमंत्रित कर लिया।) अरिमर्दन : (बुरी तरह पछताता हुआ) ओह, यह क्या से क्या हो गया? पर गलती मेरी ही है। आखिर मैंने क्यों उस नाटकबाज कौए पर यकीन कर लिया? वह दुष्ट कौआ मेघवर्ण का मंत्री था, मैं यह भी भूल गया। वह हमारे साथ रहा, पर उसने वफादारी निभाई अपने राजा मेघवर्ण के साथ। और हमारे मंत्री…? सबके सब नालायक निकले। इन्होंने तो जरा भी समझदारी नहीं दिखाई। हमारे जासूस भी सुस्त और बौड़म निकले। मेरे मंत्रियों में बस, अकेला रक्ताक्ष ही सबसे अधिक समझदार था, पर वह तो मेरी गलती से पहले ही छोड़कर चला गया। (अब मेघवर्ण ने अपने सैनिकों के साथ फिर से अपने किले पर कब्जा कर लिया। सब कौए स्थिरजीवी का जय-जयकार कर रहे थे। क्योंकि आखिर उसी की चाल से ही इतने शक्तिशाली उल्लुओं पर उन्होंने विजय पा ली थी।) कौआ सेनापति : जय हो, हमारे राजा मेघवर्ण की जय हो! सभी कौए : जय हो, जय हो, जय हो! एक वीर कौआ : हम जीत गए, भई जीत गए! दूसरा वीर कौआ : हाँ हाँ, हम सब जीत गए। तीसरा वीर कौआ : खुशी मनाओ, जीत गए। (अब मेघवर्ण और सभी कौए फिर से हँसी-खुशी अपना जीवन गुजारने लगे।) गज्जू दादा : जंगल के मेरे प्यारे-प्यारे दोस्तो, यों खत्म हुई कहानी मेघवर्ण और अरिमर्दन की। अब आप यह तो समझ ही गए होंगे कि कौन जीता और कौन हाका? पर भई, जरा इस बात पर भी ध्यान देना कि मेघवर्ण जीता तो क्यों जीता और अरिमर्दन क्यों हारा? इतना तो तय है कि जीतता वही है जिसमें हिम्मत भी है और चतुराई भी। आशा है, आप लोग भी इस नाटक से यह सीख लेंगे ताकि हमेशा कामयाब रहें। छठा दृश्य (स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान। निक्का, निक्की और सब बच्चे हवा दीदी को घेरकर खड़े हैं और उससे बातें कर रहे हैं।) हवा दीदी : हाँ तो प्यारे बच्चो, तुमने देख लिया ना कि क्या दाँव खेला मेघवर्ण और उसके सरदारों ने? निक्का : समझ गए हवा दीदी, हम समझ गए! निक्की : अरिमर्दन को उसके घर में पछाड़ दिया। निक्का : लगता है दीदी, मेघवर्ण के सरदार भी ज्यादा समझदार थे। वफादार भी थे अपने राजा के लिए। इसीलिए उसकी जीत हुई। हवा दीदी : शाबाश निक्का, शाबाश। तुमने समझ ली मेरी बात। निक्की : और अरिमर्दन के सलाहकार ज्यादातर बुद्ध थे। वे समझ ही नहीं पाए शत्रु की चाल। निक्का : एक ही समझदार था अरिमर्दन का सलाहकार। पर उसकी बात नहीं मानी गई, तो वह छोड़कर चला गया। हवा दीदी : ठीक कहा तुम लोगों ने, बिल्कुल ठीक। एक अच्छे और योग्य राजा को अपने सलाहकार बड़ी सूझबूझ से चुनने चाहिए और उनकी सही बातों पर ध्यान देना चाहिए। निक्का : अरिमर्दन अहंकारी था, उसने यह सोचा ही नहीं। निक्की : फिर कौओं में ज्यादा एकता भी तो थी। मेघवर्ण सबकी बात सुनता था। इसलिए सब उसे प्यार करते थे। हवा दीदी : बिल्कुल, बिल्कुल! नाटक तुमने बिल्कुल ठीक समझा। अच्छा, अब विदा दो। मुझे जाना है दूर, बहुत दूर, ताकि गज्जू दादा का नया नाटक देखकर तुम बच्चों को भी दिखा सकूँ। सब बच्चे : (एक साथ) हुर्रे! (हवा दीदी हाथ हिलाते हुए विदा लेती है। बच्चे भी एक साथ हाथ हिलाकर विदा कर रहे हैं। निक्का और निक्की के चेहरे उनमें सबसे अलग नजर आ रहे हैं।) (परदा गिरता है।)
