Hindi Story: प्रेम बाबू ने शादी के तुरंत बाद गांव के साथ अपने एक जोड़ी माता-पिता को अलविदा कह कर अपनी अदद बीवी के साथ दिल्ली के एक पॉश इलाके में डेरा जमा लिया था। कुछ ही समय बाद उनकी मॉर्डन बीवी के न चाहते हुए भी ऊपरवाले ने उनके घर एक प्यारा-सा बेटा भेज दिया।
प्रेम बाबू की मैडम आधुनिक और आजाद ख्याल की होने के साथ-साथ एक मल्टीनेशनल कम्पनी में महत्त्वपूर्ण ओहदे पर आसीन थी। अपनी पर्सनैलिटी की फिक्र के चलते मैडम साहिबा ने अपने बेटे को मां के दूध से महरूम रखते हुए उसका काम भी बाजार में मिलने वाले डिब्बाबंद दूध से ही चलाया था। इन्हें अपने पति और बेटे से अधिक हर समय अपने बॉस का ख्याल रहता था कि उन्होंने खाना और दवा समय पर ली या नहीं। अगर उनकी बीवी मायके गई है तो घर से उनकी पसंद का सारा खाना तैयार करना मैडम की सबसे पहली प्राथमिकताओं में से एक होती है।
आज सुबह से ही सारे शहर में सुहावने मौसम के बावजूद प्रेम बाबू के घर में तूफान का माहौल बना हुआ था। इससे पहले कि यह तूफान सारे घर में तबाही मचा दे, प्रेम बाबू दौड़-दौड़ कर अपनी पत्नी के काम में हाथ बंटा रहे थे। अब आप सोच रहे होंगे कि अगर सारे शहर का मौसम खुशनुमा था तो प्रेम बाबू के घर सुनामी जैसा खतरा क्यूं मंडरा रहा था? जी हजूर, इसका छोटा-सा कारण यह था कि इनकी नौकरानी जो घर में खाना बनाने के साथ इनके बेटे की देखभाल करती थी वो अचानक बिना बताये छुट्टी कर गई थी। अभी यह सारी तनावपूर्ण हलचल चल ही रही थी कि अचानक बड़े जोर से दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजे पर मां और बाबूजी को कई बरसों के बाद देखने पर प्रेम बाबू के चेहरे पर खुशी की जगह ऐसे भाव आ रहे थे जैसे उसके सिर पर बिजली कौंध गई हो। औपचारिकता निभाते हुए प्रेम बाबू ने कहा कि आने से पहले कोई संदेशा भेज देते तो मैं खुद स्टेशन पर आ जाता। प्रेम बाबू की मां ने कहा कि बेटा संदेशा तो गैरों को भेजा जाता है, अपने घर आने के लिये कैसा सन्देश?
किसी तरह हिम्मत जुटा कर प्रेम बाबू ने अपनी पत्नी को गांव से मां और बाबू के आने की सूचना दी। प्रेम बाबू की पत्नी दफ्तर जाने की जल्दी में सास-ससुर को बिना कोई चाय-नाश्ता पूछे ही अपना बैग और बेटे को लेकर चल दी। जैसे-तैसे प्रेम बाबू ने अपनी मां के साथ मिल कर कुछ खाने-पीने का इंतजाम किया। मां ने बेटे से पूछा कि बहू पोते को क्यूं साथ ले गई है? प्रेम बाबू ने बताया कि आज हमारे यहां काम करने वाली नौकरानी नहीं आई, यह अब उसे पड़ोस में काम करने वाली एक बाई के यहां छोड़ कर जायेगी।
खैर आप बताओ कि अचानक दिल्ली आने का कैसा प्रोग्राम बना लिया? इससे पहले की मां कुछ बोलती, बाबूजी ने बताया कि तुम्हारी मां को हर समय पेट में दर्द रहता है, गांव के डॉक्टर ने कुछ और टेस्ट करवाने के लिये कहा जो सिर्फ दिल्ली में ही हो सकते थे। बस इसलिये एकदम से यहां आना पड़ा। प्रेम बाबू ने माफी मांगते हुए कहा कि आप बिल्कुल चिंता न करें, आज तो मेरा दफ्तर जाना बहुत जरूरी है, लेकिन एक-दो दिन में छुट्टी लेकर मैं खुद साथ चल कर सारे टेस्ट करवा दूंगा। प्रेम बाबू के पिता ने कहा-‘बेटा तू फिक्र मत कर। मैं पहले भी कई बार यहां आ चुका हूं, यह थोड़े से टेस्ट तो मैं खुद ही करवा लूंगा।’ कुछ ही देर में मां और बाबूजी अस्पताल के सारे कागज संभाल कर टेस्ट करवाने के लिये निकल पड़े। अस्पताल से घर वापिस आते समय जब उनका ऑटोरिक्शा लाल बत्ती पर रुका तो मैले-कुचैले कपड़े पहने एक औरत छोटा-सा बच्चा उठाये उनसे भीख मांगने लगी। बुजुर्ग लोग अक्सर कहते हैं कि अपना खून अपना ही होता है। प्रेम बाबू की मां ने बाबूजी से कहा कि यह बच्चा तो बिल्कुल अपने पोते की तरह लग रहा है। बाबूजी ने डांटते हुए कहा कि तुम भी न जाने क्या-क्या सोचती रहती हो? यह भिखारी का बच्चा हमारा पोता कैसे हो सकता है?
देर शाम को जब बहू अपने बेटे को घर लेकर आई तो प्रेम बाबू की मां ने झट से बच्चे के पैर को गौर से देखा। प्रेम बाबू ने जब इसका कारण पूछा तो मां ने उसे घर के एक कोने में ले जाकर सारी बात बता दी। मां की बात सुनते ही प्रेम बाबू के पैरों तले की जमीन खिसक गई। उसने किसी तरह यह बात अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास किया। पहले तो मैडम साहिबा आगबबूला हो उठी, फिर पति के बार-बार कहने पर उस बाई को बुला कर बात करने को मान गई। जैसे ही उसे पुलिस के हवाले करने की धमकी दी तो उसने झट से मान लिया कि जब आप लोग काम पर चले जाते हो तो हम आपके बच्चों को अपने साथ ले जाकर चौराहों पर भीख मांगते हैं। इतने सुंदर बच्चों को देख कर लोग काफी अच्छे पैसे दे देते हैं।
बाबूजी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि गांव के इतने बड़े जमींदार घराने के पोते से किस प्रकार सड़क पर भीख मंगवाई जा रही है। एक समझदार इंसान की तरह उन्होंने अपना संतलुन बनाते हुए अपनी बहू को कहा कि हम जानते हैं कि हमारे यह साधारण वस्त्र देखकर तुम हमें छोटा समझ रही हो और हम लोग तुम्हें अच्छे नहीं लगते? लेकिन एक बात कभी मत भूलो कि कोई कितना भी बुरा क्यों न हो, उसमें अनेक गुण विद्यमान रहते हैं। बेटा शहर में रह कर पैसा कमाना बहुत जरूरी है, लेकिन इस बात को कैसे झुठला सकते हो कि जो बच्चे नौकरों की उंगली पकड़ कर चलना सीखते हैं उनको बाद में अपने मां-बाप के साथ चलने में शर्म आती है। आप चाहे सारी उम्र अपने बेटे को किसी चीज की कमी न होने दे, लेकिन एक समय वो आपके हर काम में कमियां निकालेगा। जिन बच्चों को नौकर और बाईयां बोलना सिखाते है उनके मां-बाप को सदा अपशब्द सुनने को मिलते हैं। ऐसे बच्चों को आप चाहे सारी उम्र सहारा समझ कर पालते रहो, लेकिन मुसीबत के समय वह आपको बेसहारा छोड़ देते हैं। उस समय आप जैसे मां-बाप के पास अपने गमों और दुःखो को लेकर रोने के सिवाए कोई चारा नहीं बचता।
इस सारे नजारे को देखने के बाद जौली अंकल भी युवा पैरेन्टस को यही सन्देश देना चाहते हैं कि यदि आप उम्मीद करते हो कि आपके बच्चे हर समय ताजे फूलों की तरह हंसते-मुस्कुराते हुए अच्छे नागरिक बने तो यह तभी मुमकिन है जब छोटे बच्चों को माता-पिता से अच्छे संस्कार मिलेंगे। कोई भी इमारत तब तक मजबूत नहीं बन सकती जब तक उसकी नींव कमजोर हो।जीवन में कुछ भी अच्छा करने और अच्छा बनने के लिये बुजुर्गों का आशीर्वाद सदैव लेते रहना चाहिये।
ये कहानी ‘कहानियां जो राह दिखाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–
