Short Story: कल्पवृक्ष’ हां इसी शब्द का प्रयोग करना न्यायसंगत होगा। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठने वाला व्यक्ति जो भी इच्छा व्यक्त करता है, वह पूर्ण हो जाती है। क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा होती है। मेरे जीवन में भी मां का स्थान ‘कल्पवृक्ष’ के समान ही है। जीवन पथ पर जिस मोड़ पर भी मुझे मां की आवश्यकता महसूस हुई, मां ने ‘कल्पवृक्ष’ की भांति न केवल अपनी आंचल व ममत्वरूपी छाया दी बल्कि मेरी हर आकांक्षा की पूर्ति भी की । मेरे जन्म से पूर्व मां एक वर्ष के बेटे की मृत्यु का शोक भुगत चुकी थी। ऐसे में एक बेटी का जन्म लेना पूरे समाज की दृष्टि से मां एक दयनीय स्थिति में थी।

पिता की असामयिक मृत्यु ने मां को और भी बेबस कर दिया। लेकिन मां ने न केवल स्वयं को संभाला बल्कि नये उत्साह व उमंग के साथ मेरे पालन -पोषण में जुट गई । मां की पूरी दुनिया मेरे इर्द -गिर्द थी। अनेक व्यथाओं से जूझते हुए मां ने कभी मुझे कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया।

जब कभी स्कूल में फीस भरने की बारी आती तो मां कहीं न कहीं से व्यवस्था कर देती। इसी तरह किताबों का बंदोबस्त भी मां सहजता के साथ कर देती थी। मां की अपेक्षाओं के अनुरूप मैं भी पढाई-लिखाई में तेज थी । धीरे -धीरे मैं स्कूल से कॉलेज आ गई ।

मैं जल्दी से जल्दी आत्मनिर्भर होकर मां का अवलंबन बनना चाहती थी। भगवान की असीम कृपा से यह इच्छा भी पूरी हो गई। एम. ए. के पश्चात नेट उत्तीर्ण करके कालिज में व्याख्याता के पद पर मेरी नियुक्ति हो गई।

अब मैं मां को पूरी तरह से खुश देखना चाहती थी। अब मां को मेरे विवाह की चिंता सताने लगी। लेकिन मैं सिर्फ मां के साथ रहना चाहती थी। मुझे डर था कि विवाह के बाद मैं मां की देखभाल अच्छी तरह से नहीं कर पाउंगी।

लेकिन मां के समझाने पर में कॉलेज के प्रोफेसर नवीन से मेरी शादी तय हो गई। नवीन ने मुझसे वादा किया कि शादी के बाद वह मां की देखभाल में कोई कमी नहीं रहने देगा। लेकिन विवाह के पश्चात नवीन की कथनी और करनी में फर्क आ गया।

मां बीमार रहने लगी और मैं मां को अपने पास रखना चाहती थी। इसी बात पर हम दोनों के बीच झगड़े होने लगे। इस बात का पता मां को चला तो मां ने मुझे समझाया कि बेटी शादी के बाद लड़की की प्राथमिकता ससुराल ही होती है न कि मायका ।

मैंने मां से काफी तर्क-वितर्क किया और मां के साथ रहने की जिद की । मैंने मां से कहा कि मैं कल आपको लेने आ जाऊंगी। अगले दिन जब मैं घर पहुँची तो घर पर ताला लगा था। दरवाजे पर एक चिट्ठी मिली जिसमें लिखा था-“एक मां कभी भी अपनी बेटी का घर टूटता हुआ नहीं देख सकती। मैं जहाँ भी रहूँगी, खुश रहूँगी। ” मेरी आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे । मां ने एक बार फिर से ‘कल्पवृक्ष’ बनकर मेरे जीवन को छाया प्रदान कर दी थी ।