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Hindi Story: फिल्मों के कामयाब डायरेक्टर कई दिनों से अपनी नई फिल्म ’पगला कहीं का’ के लिये हीरो की तलाश कर रहे थे। बहुत से कलाकारों का स्क्रीन टेस्ट लेने के बाद भी उन्हें ऐसा कोई अभिनेता नहीं मिल रहा था जो पागल की भूमिका को जीवंत तरीके से निभा सके। इसी उलझन में डूबे डायरेक्टर साहब एक दिन पार्क में सैर करते हुए वीरू की अजीबोगरीब हरकतों को देख कर रुक गये।

वीरू बिना जली हुई सिगरेट पी रहा था। उसकी पत्नी ने कहा कि आज तुम्हारी सिगरेट में से धुआं क्यूं नहीं निकल रहा? वीरू ने उससे कहा कि तू सारी उम्र ठीक नहीं हो सकती, जब देखो पागलों वाली बात ही करेगी। अरे पागल, यह ’सी.एन.जी’ सिगरेट है, इसमें से धुआं नहीं निकलता। वीरू की पत्नी ने बात का रुख बदलते हुए कहा कि मैंने सुना है कि आजकल के हसीन मौसम की चांदनी रातों में समझदार लोग भी पागलों जैसी हरकतें करने लगते हैं। वीरू ने लंबी सांस लेते हुए जवाब दिया कि मैंने भी तो ऐसे ही मौसम की एक चांदनी रात में तुम्हें शादी के लिये हां कही थी। वीरू की पत्नी ने कहा कि तुम मज़ाक बहुत अच्छा कर लेते हो। वीरू ने कहा कि मैं मज़ाक नहीं कर रहा, मैं तुमसे शादी करके सच में पागल हो चुका हूं। इस बात पर पत्नी जी ने अपने पतिदेव से कहा कि शादी के बाद आज पहली बार तुमने समझदारी और सच्चाई की बात की है।

इतने में वीरू पत्नी से नाराज़ होकर एक कागज हाथ में लिये अपने सिर को झुका कर थोड़ा अलग होकर बैठ गया। फिल्म के डायरेक्टर साहब वीरू के पास जाकर बोले कि भाई क्या कर रहे हो? वीरू ने कहा कि देख नहीं रहे कि चिट्ठी लिख रहा हूं। डायरेक्टर ने पूछा कि यहां पार्क के अंधेरे से कोने में बैठ कर किसको चिट्ठी लिख रहे हो? वीरू ने चिढ़ते हुए कहा कि अपने आपको। वीरू का यह जवाब सुनकर अब डायरेक्टर से रहा नहीं गया और उन्होंने वीरू से कहा कि अच्छा यह बताओ कि इसमें क्या लिखा है। वीरू ने कहा कि अभी यह चिट्ठी मुझे मिली कहां है? जब मिलेगी तभी बता पाऊंगा कि मैंने इसमें क्या लिखा है।

वीरू के हाव-भाव देख कर डायरेक्टर साहब मन ही मन खुश हो रहे थे कि अपनी फिल्म के लिये जिस प्रकार के चालचलन के किरदार को मैं कई महीनों से तलाश रहा था, वो आज अचानक इस पार्क में इस तरह से मिल गया। डायरेक्टर साहब कुछ इधर-उधर की बातें करने और वीरू के बारे में अच्छे से जानने के बाद उससे थोड़ा झिझकते हुए बोले कि क्या मेरी फिल्म में पागल का रोल करोगे? फिल्म में काम करने का ऑफर सुनते ही वीरू झट से बोला कि मुझे तो बचपन से ही फिल्में बहुत अच्छी लगती है। फिल्मों में काम करने का शौक तो मुझे पागलपन की हद तक था। लेकिन इससे पहले की मैं फिल्मों में काम करके अपने खानदान और इलाके का नाम रोशन करता, मेरी शादी इस पागल औरत के साथ हो गई। वीरू की बात खत्म होने से पहले ही उसकी पत्नी गुस्से से बरसते हुए बोली कि शादी से पहले तो तुम ही मुझे पाने के लिये पागल थे। दिन-रात कामकाज छोड़ कर बस हर समय मुझे मिलने के लिये तुम्हारे सिर पर जुनून सवार रहता था।

वीरू ने पत्नी की बात को अनसुना करते हुए बड़ी ही खुशी और उत्साह से कहा कि डायरेक्टर साहब आप एक बार मौका देकर देखो, मैं इस रोल में जान फूंक दूंगा। डायरेक्टर साहब बोले-‘तुम्हें कुछ भी खास करने की जरूरत नहीं, बस जैसे हो वैसे ही दिखते रहो, मेरे लिये इतना ही काफी है। डायरेक्टर साहब ने वीरू को थोड़ा और परखने के इरादे से पूछा कि मान लो तुम्हारी जेब में सिर्फ दो सौ रुपये हैं और मैं तुम्हें एक अच्छे होटल में खाना खिलाने के लिये कहूं तो तुम क्या करोगे? वीरू ने कहा- ‘यह तो कोई मुश्किल काम नहीं है। मैं इतने पैसों से किसी भी महंगे होटल में अपने साथ आपको भी खाना खिला सकता हूं।’ डायरेक्टर साहब ने हैरान होकर वीरू से कहा कि क्या तुम जानते हो कि आजकल होटल इतने महंगे हो गये हैं कि एक बार खाना खाने पर हजारों रुपये का बिल बन जाता है।

वीरू ने कहा कि मेरी बचपन से ही यह आदत रही है कि मुझे जो कुछ भी पाना हो मैं उसे पाकर ही रहता हूं उसके लिये चाहे मुझे पागलपन की किसी भी हद तक जाना पड़े। अब जहां तक होटल में खाना खाने की बात है तो मैं बड़े आराम से खाना खाऊंगा। उसके बाद जब बिल देने की बारी आयेगी तो मैं कुछ भी झगड़ा करने की बजाए सिर्फ इतना कहूंगा कि मेरे पास पैसे तो हैं नहीं आप पुलिस को बुला लो। जैसे ही पुलिस वाले आयेंगे, मैं यह 200 रुपये उन्हें देकर बड़े आराम से अपने घर चला जाऊंगा।

वीरू की बातें सुनकर डायरेक्टर साहब ने उससे कहा कि तुम्हारे अंदर जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने के लिये कोशिश, साहस और योग्यता जैसे सभी गुण मौजूद है, फिर भी तुम अजीबोगरीब हरकतें क्यूं करते हो? वीरू ने कहा कि मैं अच्छे से जानता हूं कि सफलता सिर्फ उन्हीं लोगों को मिलती है जिन्हें यह विश्वास होता है कि वो सफल होंगे। मनचाही मंजिल पाने के लिये सबसे अधिक जरूरत होती है मन में एक जुनून की, एक पागलपन की। लेकिन मैं जिस भी राह पर आगे बढ़ने लगता हूं मेरी पत्नी मेरी टांग खींच देती है। मैं यह भी समझता हूं कि सफल आदमी केवल उसी को कहा जा सकता है जो दूसरे लोगों द्वारा फेंकी गई ईटों और पत्थरों से अपने भविष्य की एक मजबूत नींव तैयार कर लेता है।

डायरेक्टर साहब ने कहा कि फिर तो तुम्हें यह बताने की जरूरत नहीं कि चींटी से लेकर हाथी तक साधारण आदमी से लेकर राजा तक हर कोई किसी को अपने जीवन का लक्ष्य पाने के लिये किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ता है, लेकिन इनमें से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हर परिस्थिति को हंस कर झेलना जानते हैं, ऐसे लोग खुद भी खुश रहते हैं, दूसरों को भी खुश रखते हुए सफलता को अपना गुलाम बना लेते हैं। डायरेक्टर साहब और वीरू की बातचीत को सुनकर जौली अंकल के मन में भी यह विश्वास जागने लगा है कि कामयाबी पाने के लिये दीन-दुनिया को भूलकर मेहनत और ज्ञान के साथ लगातार प्रयास करना भी जरूरी होता है फिर चाहे जमाना उसे पागलपन या जुनून ही क्यूं न कहें। सवार हो जाये जब जुनून सिर पर कि कुछ पाना है, रह जायेगा फिर क्या दुनिया में जो हाथ नहीं आना है।

ये कहानी ‘कहानियां जो राह दिखाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं

Kahaniyan Jo Raah Dikhaye : (कहानियां जो राह दिखाएं)