Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “तुम्हारे पीरियड्स आने वाले हैं क्या?” “आं.हाँ…मेरे ख़्याल से टाइम होने वाला है, तुम्हें कैसे पता?”

“बिना बात तुम इतना चिड़चिड़ जो कर रही हो।” मैं मुस्कुराया।

“ठीक है, मैं चिड़चिड़ कर रही हूँ यह तो समझ आता है; पर तुम्हें कौन से पीरियड्स आने वाले हैं जो तुम चिड़चिड़ा रहे हो?” उसने अपनी तुनकमिज़ाजी जारी रखी।

“आते हैं ना लड़को को भी। वो वाला ना सही, पर महीने-दो महीने में कभी कुछ मुश्किल और नेगेटिव दिनों का दौर तो हम भी झेलते हैं; तुम्हें क्या लगता है ‘मूड स्वींग’ पर अकेले तुम लड़कियों की ही मोनोपॉली है?” कारण समझ आ जाने से थोड़ा हल्का हुआ था मैं।

“मैं तो यही समझती थी।”

“तो गलत समझती थी, सुधार लो अपनी सोच।” मैंने उपेक्षा से कहा।

“तुम मुझे एक बात ईमानदारी से बताओगे? पूछूँ?” उसकी नज़रें कार की खिड़की से बाहर की ओर जिस अंदाज़ में गईं, मैं कुछ तो समझ गया कि अब मैडम दार्शनिक मूड में हैं।

“पहले तुम यह बताओ कि बेईमानी से कब मैंने कोई बात कही है?” बहुत बार मुझे उसकी बराबरी के मूड में हुज्जत करनी होती है।

“तुम मुझसे अब भी सच में प्यार करते हो?” उसे सिर्फ़ अपना सवाल पूछना था, मेरे सवाल के जवाब की उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी; ना मुझे ऐसे सवालों के जवाब की उम्मीद रखनी चाहिए।

“हे भगवान!” मैंने अपना बायाँ हाथ स्टेयरिंग से हटा कर अपना माथा ठोंका।

“भगवान से माँगू जवाब?” उसने फ़ब्ती कसी।

“तुम एक काम करो, आगे फूल मिल जाएँगें; एक गुलाब ले लेते हैं, पत्तियाँ तोड़ते हुए ‘ही लव मी…ही लव मी नॉट’ का गेम खेल लेना।” जैसे को तैसा।

“तुम किसी बात का सीधा जवाब नहीं दे सकते?” उसने कहा।

“फूल से सीधा जवाब मिल जाएगा ना तुम्हें। जब प्यार करता ही नहीं, तो फिर झूठ बोलने में मुझे क्या दिक्क़त होने वाली है? एक्चुली हमारा रिलेशन ही फिर तो झूठ हो गया न।”

“मैंने ऐसा तो नहीं कहा।” उसने कहा तो तीर निशाने पर बैठता लगा मुझे।

“मुझे पता है इतना कि, ‘लव मी, लव मी नॉट’ का गेम तुम लड़िकयों का फ़ेवरेट है।” मैं उसके चेहरे पर भाव बदलते पढ़ना चाहता था।

“तुम लड़कियों पर ज़्यादा बुद्धि मत लगाओ। सड़क देख लो ठीक से, वरना ठोक दोगे किसी को।” उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी कि, आज जैसे सवाल होंगे; उससे ज़्यादा ज़ोखिम भरे जवाब।

ज़िंदगी सड़क पर ही नहीं, इश्क़ में भी तो दाँव पर ही लगी होती है। थोड़ी रपटन की क़ीमत बहुत चुकानी होती है; सड़क पर भी, दिल पर भी। यूँ तो उस वक़्त भी समझता था, बवंडर ख़ामोश हो जाने तक सफ़र रफ़्ता-रफ़्ता तय करना ही अच्छा हुआ करता है।