Hindi Love Story: “कहाँ से आ रहे हो?” उसने कार में बैठते ही पूछा। “घर से। बताया तो था तुम्हें, कि आज घर पर ही हूँ।”
“हाँ, पर कहीं तो गए थे।” “अरे कहीं नहीं। आज कहीं निकलने का मूड ही नहीं था। तुमसे बात हुई तब तो नहाया हूँ।”
“और ये जो तुम में से ख़ुशबू आ रही है, परफ्यूम तो तुम्हारा नहीं है।”
“मेरा ही है, और किसका माँग कर लगाऊँगा। रेग्यूलर वाला मिला नहीं तो ये ले आया था। क्यूँ अच्छा नहीं लगा?”
“एक बात बताओ मेरे माथे पर ‘सी’ लिखा दिखता है तुम्हें?”
“ऐसा क्यूँ बोल रही हो?”
“वाह! क्या एक्टिंग करते हो, सुपर्ब। यार्डली का लेडिज़ परफ्यूम है यह, जिससे तुम महक रहे हो…”
“ओ..ओ..ओ.. मिन्स मैं किसी यार्डली वाली से चिपक कर आ रहा हूँ और लिपस्टिक वग़ैरह के भी तो कहीं कुछ निशान नहीं दिखे तुम्हें? देखो शायद कहीं कोई लव बाइट ना रह गया हो। हे भगवान! मम्मी कल धोयेगी कपड़े तो मुझे भी धो डालेगी…” मैंने भरसक संजीदगी से कहा।
“तुम्हें जरा भी शर्म नहीं है ना?…मम्मी का तुरंत ख़याल आया और यहाँ मेरे सामने जो भौंक रहे हो…मेरी फीलिंग्स से तुम्हें कुछ लेना-देना नहीं…” वह उबाल के प्रोसेस में आ चुकी थी।
“मेरे किसी से थोड़ा चिपक लेने से, तुम्हारी फीलिंग्स का क्या लेना-देना है भई!”
“यू टर्न लो…मुझे कहीं नहीं जाना तुम्हारे साथ। जिससे चिपके थे, उसी को करा लाओ डिनर।”
“अरे पागल। ऐसा कुछ नहीं है। मस्ती कर रहा था।” मैंने बात संभाली।
“मैं सब समझती हूँ। तुम ट्राई करते रहते हो, मस्ती-वस्ती समझ कर मैं कुछ ना कहूँ तो पता नहीं कोई लिमिट रहेगी भी या नहीं तुम्हारी। पर तुम लेडिज़ परफ्यूम क्यूँ लोगे, कोई लॉजिक नहीं इस बात में तो…” वह मुझ पर यक़ीन करना चाह रही थी।
“तुम्हारी कसम यार। मेरा ब्रांड दिखा नहीं तो ये वाला उठा लिया। मुझे याद ही नहीं रहा कि, परफ्यूम लेते समय लेडिज़ जेन्ट्स भी देखना होता है…” मैंने हँसते हुए कहा।
“वाह बेटा वाह! ऐसी गलती कौन करता है यार? और कसम भी मेरी ही खाओ…ताकि मैं जल्दी निकलूँ और तुम नई-नई फ्रैगरेन्स वालियों के साथ छुट्टे सांड बने फिरो…” उसने भी उसी मज़ाक से कहा।
“तुम्हारा खाना बना होगा ना घर में?” मैंने चिढ़ाने की वापसी की।
“क्यों?…अच्छा मुझे वापस छोड़ने की सोच रहे थे? उस चुड़ैल के साथ जाने की प्लानिंग में जान-बूझ कर मुझसे लड़ाई कर रहे हो ना? ताकि मुझे वापस छोड़ो और उसे लेकर जाओ? जब इतना सोच ही लिया, तो घर में मेरा खाना बना हो या नहीं इससे तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है? वापस भी क्यूँ जाओगे, यहीं छोड़ दो, कैब लेकर निकल जाऊँगी…”
“सुनो, तुम्हें पीरियड्स आने वाले हैं क्या?”
“क्यों तुम्हें उससे क्या लेना-देना? अपनी उस चुडै़ल का ध्यान रखो उसे कब आ रहे कब नहीं…और हाँ! नहीं आने का तो ज़्यादा ही रखते होगे न?” उबाल वापसी पर था।
“माता जी! शॉपिंग का बिल पड़ा होगा मेरे पास अब भी। पूरा पैकेट ही नहीं खोला…घर जाकर वाट्सअप कर दूँगा आपको। डेट-टाइम सब ठीक से चेक कर लेना। मोबाइल नम्बर भी तो होगा उसमें मेरा; या बोलो तो पहले उस स्टोर में चलें, शॉपिंग डिटेल्स मिल जाएगी…” अब मुझे और गुस्सा नहीं करना था उसे।
“रहने दो। तुम कहना क्या चाहते हो कि, मैं शक्की हूँ। तुमने ही तो उल्टा सीधा बोल कर भड़काया है मुझे।” नर्म पड़ने की उसने पूरी कोशिश की।
“तो डार्लिंग,आवाज़ के पीछे का सच और मज़ाक नहीं समझती तुम?”
“हाँ भई, मैं नहीं समझती। अच्छा बताओ, वो समझती है?”
“तुम्हारी तो ना…ढिशुम…” कहते हुए मैंने उसकी नाक पर धीरे से मुक्का मारा। उसने मेरा मुक्का पकड़कर, उस पर लिपिस्टिक के निशान दाँतो के निशान के साथ ही मिला दिए।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
