Hindi Love Story: “अरे वाह, गिफ्ट, क्या बात है। उससे बड़ी बात यह है कि जनाब को याद रहा।” उसने ख़ुश होते हुए कहा। जब वह कार में आकर बैठी, मैंने उसे अपने पीछे छिपाकर रखा हुआ लाल चमकीले रैपर में लपेटा हुआ डिब्बा दिया। उसने कहा था कि मैं विदेश से जब लौटूँ तब कुछ स्पेशल लेकर आऊँ; उसने पहली बार ही मुझसे कुछ लाने को कहा था।
“तुम्हें भूलूँगा कैसे डार्लिंग। खोल कर तो देखो।”
उसने बहुत ही प्यार से डिब्बे की पैंकिंग कम से कम ख़राब हो, ऐसे खोला और आई फोन देखते ही कहा-“ये क्या है यार।”
“क्यों? तुम्हें पसंद नहीं आया?” मुझे आश्चर्य हुआ।
“तुम्हें पता तो है, पिछले महीने ही मैंने नया फोन लिया है और ऐसे बेकार में फोन बदलने का रद्दी शौक़ मुझे नहीं।”
“अब लाया हूँ इतना महंगा और प्यार से, तो प्यार से रखना चाहिए न।”
वह एक मिनट चुप रही और मेरी आँखों में देखने से बचते हुए मुझे पैकेट वापस देते हुए कहा- “मैं सस्ती लड़की नहीं हूँ जो मँहगी चीजों से ख़ुश हो जाऊँ। मुझे शौक़ होता इसका तो ख़ुद भी ख़रीद लेती। तुमसे कहा था मैंने वहाँ की कोई ख़ास चीज़। इससे कहीं ज़्यादा क़ीमत चुकानी पड़ेगी तुम्हें मेरे गिफ्ट की। मेरे लिए गिफ्ट पैसों से मत ख़रीदा करो; फीलिंग्स से ख़रीदा करो, अगर तुम्हारे पास हो।”
“तुम ऐसा कैसे कह सकती हो कि ये मैंने बगैर मन और बगैर फीलिंग्स ख़रीदा है?”
“ये बताओ, जो चीजें यहीं मिल सकती हैं वो मैं तुम्हें वहाँ से लाने को क्यों कहती?” उसके स्वर की लपटें अब धीमीं हो गई थीं; पर गरमाहट क़ायम थी।
“हर चीज़ तो हर जगह मिल जाती है…”
“नहीं, ऐसा भी नहीं है। हर कल्चर में ऐसी चीजें होती हैं, जो उस जगह की स्पेशलिटी होती है।”
“वहाँ की स्पेशलिटी तो वहाँ की गर्ल्स थी। ख़ूबसूरत, लंबी और सुनहरे बाल।” मैं समझ चुका था उस बात पर बहस करके अब कोई फ़ायदा नहीं, कि वह गिफ्ट ले ले। वैसे इसके दृढ़ फ़ैसले मुझे हमेशा पसंद आते रहे हैं, उनमें वह लिजलिजापन नहीं कि आसानी से बदल जाएँ।
“ओहो…तो अब बोली ना असली बात। उन लड़कियों की बाँहों से निकलने का टाइम मिलता, तब तो मार्केट-वार्केट जाने की सोच पाते। ऐसा ही हुआ ना?” उसने भी मज़ाकिया बात का उसी लहज़े में जवाब दिया।
“हाँ। मैंने सोचा भी कि लड़कियों से ही पूछ लूँ वहाँ की कोई स्पेशल चीज़।”
“तो बताया नहीं उन्होंने?”
“बताया था, पर हमारी और उनकी जीभ के स्वाद और सुगंधों में भी अंतर है। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि लोकल परफ्यूम्स ख़ुशबू देने के लिए हैं या अजीबो-ग़रीब गंधाने के लिए।”
“सच बताओ, तुमने वो गंध परफ्यूम्स की बॉटल से ली; या लड़कियों में सूंघी?” उसकी भौहों पर मज़ाकिया शक और जलन का रिसाव दिखने लगा।
“लड़कियों में ही सूंघी। लेकिन क़सम से बस ऐसे ही चलते-फिरते…”
“लेकिन यह कैसे कह सकते हो कि वो स्मेल पसीने से मिलकर अजीब ना बनी हो? इसके लिए तो परफ्यूम की बॉटल से सूंघना पड़ता ना?” उसका जाल मैं समझ चुका था। उसने आगे कहा -“और तुम ख़ुद ही दारू की स्मेल में डूबे हुए होगे, उसके साथ ही लड़कियों को सूंघते फिर रहे होगे। है ना?”
“तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?” मैंने बातों की दिशा बदल देनी चाही।
“है ना। मैं कहाँ तुम्हें बदचलन कह रही हूँ, लेकिन ये सूंघा-सूंघाई वाली तुम्हारी हरकतें कोई सात्विक तो नहीं थीं।” उसका धीमा घूँसा मेरे पेट पर लगा। फ्रंट मिरर एडजस्ट करते हुए मुझे दिखाई दिया, मेरे चेहरे पर उसके यकीन की दमक चहल कदमी करने निकली थी।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
