Hindi Love Story: “मैं समझती हूँ हमारा रिश्ता, पवित्रता-अपवित्रता की हदों में समा ही नहीं सकता। शायद इसलिए ही मुझे कोई गिल्टी नहीं।”
वह आज मुझसे अपनी शादी के बाद पहली बार मिल रही थी। शबाब पर रहे गर्मी के दिन की उदास वह शाम जो शहर से लगते जंगल से गुज़रती सड़क पर, कार में बैठे हम दोनों गहराई से महसूस कर पा रहे थे। हवाओं का रूखापन थोड़ी बेचैनी पैदा कर रहा था, पर सिगरेट के धुएँ को बाहर निकाल देने की गरज़ से ए.सी. ऑफ करके ग्लास नीचे रखे जाने ज़रूरी थे। टूकड़ा-टूकड़ा सुकून थी यदा-कदा आ जाने वाली परिंदों की चहचहाहट।
उसने सीधी खाली सड़क की ओर देखते हुए धीमी आवाज़ में कहना जारी रखा-“अब मैं ज़्यादा अच्छे से समझती हूँ कि, अगर ज़िंदगी में किसी रिश्ते को अनमोल कहा जा सकता है, तो वह हमारा है। बाकी सब जगह मैंने बनिए देखे हैं; सभी को अपनी शर्तों पर रिश्ते चलाने हैं चाहे वह माँ-बाप, भाई-बहन हों या सास-ससुर और पति। मैं थक गई हूँ सबकी उम्मीदों पर खरे उतरते और खौफ़नाक पालतूपन से जूझते हुए।”
“यह रास्ता चुना भी तो तुमने ही था।” हाँलाकि मुझे तुरंत ही लगा कि, मुझे यह बेरहम खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए थी।
“हाँ चुना था मैंने। मेरे क़र्ज़ उतारने थे मुझे। पर यह कभी ना चुकने वाले होते हैं, यह मुझे पता नहीं था।”
शायद वह भावनाओं के उतार-चढ़ाव को इस स्तर तक लाना चाह रही थी कि, आगे बात की जा सके। एक मिनट की बहुत लम्बी शांति के बाद उसने आवाज़ का मुर्दापन मिटाते हुए कहा-“कर्जे होते तो शायद चुक भी जाते; अहसान कैसे उतार पाऊँगी? मुझे घिन आती है उनसे, जिनसे मैं हर समय घिरी रहती हूँ और जिनके लिए मुझ पर ज़बरदस्ती जवाबदेही लाद दी गई है। अब इस नफ़रत के जीवन से मैं बाहर निकलना चाहती हूँ। क्या उस ज़िंदगी का मुझे थोड़ा भी हक़ नहीं, जिसे मुझे जीना है। या मेरे ही सपने गए-गुजरे हैं, यूज़लेस एंड कूड़ा? जिनको चाहो तो फेंको या थूक दो उन पर।”
“अपेक्षाओं का जीवन अब भी जी रही हो तुम।” शायद मुझे यह लगता रहा है कि, उसे ज़्यादा सपने देखने का हक़ होना भी क्यों चाहिए, जिसके सपने पूरे करने की ज़िम्मेदारी दूसरों पर हो।
“हाँ, नहीं कर पायी हूँ ख़त्म। अब भी चाहती हूँ कि कोई कहे मुझे कि घर लौट आ; लेकिन मेरे अपने अब वो पराए हो गए हैं, जो मुझे सिर्फ़ नसीहत देते हैं।” मैंने देखा उसकी आँखों में काले पानी की सज़ा नाच रही थी, और मैं उसे किसी तरह समझाने में क़ामयाब हो नहीं सकता था कि यह उसका चुनाव है। बेहतर है सवालों को ही भुला देना और नई चहचहाहटों के बीच नए आसान और सुलझे सवाल ढूँढ निकालना जो जीने की राह पर हौसला अफ़ज़ाई करते हैं, बगैर इस फ़िक्र में पड़े की वे राहें झूठ के नालों की हैं या सच के झरनों की।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
