Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “आज कितने दिनों बाद मिल रहे हो, बिल्कुल ही टाइम नहीं है न तुम्हारे पास।” उसने आते ही शिकायत की। एक पब्लिक पार्क की बेंच पर मैं उसका पिछले पाँच मिनट से इंतज़ार कर रहा था।

“क्यों नहीं है, रोज ही तो बातें हो रही हैं और दस दिनों से बाहर ही तो था ना।” उसने अपना हैंड बैग किनारे रखा और मेरे पास बैठ गई। उसकी ख़ुशबू मुझे हमेशा ख़ुश कर जाती है।

“वाह क्या बात, फोन में भी मुश्किल से आधा घंटा बात करते हो। तुम तो पता नहीं कहाँ बीजी रहते हो, यहाँ मैं अकेले पड़े-पड़े बोर हो जाती हूँ। कितना पढूँ और घर के कितने काम करूँ। दिन तो किसी तरह निकल ही जाता है; रात में बिल्कुल बेचैन हो जाती हूँ।”

“क्यों? बेचैनी क्यों यार। थोड़ी देर बात करो और आराम से मीठी नींद लो; यह बादशाहत सबको थोड़ी ना नसीब होती है। हा…हा…हा…”

“और जो अकेलापन खाता है, मुझे तुम चाहिए।” उसने बगैर मेरी ओर देखे कहा।

तल्ख़ बातें कह जाना मेरी शख़्सियत का हिस्सा है- “तो तुम क्या समझती हो; अकेलेपन से बचने के लिए किया गया गुनाह प्यार है?”

वह चुप रही मेरी ओर देखा और मेरे चेहरे पर छाए सवाल की गहराई में डूबने से बचने लगी।

“चनाचूर खाओगी?” मैंने चनाचूर वाले को हमारी ओर आते देखा।

“हाँ, ले लेते हैं।”

हम चनाचूर के तीखेपने से जूझने लगे और ज़िंदगी के तीखे सवालों को दरकिनार कर दिया गया।

कोई विचार सुगंध की तरह फैला। कैसे जीया जा सकता है, उन जवाबों के बग़ैर जो जब-तब गले में फँस जाया करते हैं; सवालों को बिसराकर हसीन ज़िंदगी किस तरह जीयी जा सकती है, मेरी ज़िंदगी में यह सीखना बाकी रह गया है।