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सुहाग रस-21 श्रेष्ठ बुन्देली लोक कथाएं मध्यप्रदेश: God Story in Hindi
Suhaag Rash

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

God Story in Hindi: बहुत दिनों की बात है। एक बार भगवन भोलेनाथ और मैया पार्वती भूलोक का हाल-चाल जानने निकले। दोनों चलते-चलते गहन वन में पहुंचे। सूर्य देवता चमक रहे थे। पार्वती जी को प्यास लगी तो उन्होंने भोलेनाथ से कहा। भोलेनाथ ने चारों ओर देखकर कहा – देवी! उस तरफ पक्षी उड़ रहे हैं, जानवरों के पगचिन्ह भी उसी और जा रहे हैं, ध्यान से सुनो पानी बहने की कलकल ध्वनि भी आ रही है। अवश्य ही वहाँ पर नदी होनी चाहिए। दोनों वहाँ पहुँचे तो देखा एक चौड़ी-गहरी, सुंदर नदी बह रही है, जिसके किनारों पर शीतल छाया देने वाले ऊँचे-ऊँचे विशाल वृक्ष हैं। नदी का पानी एकदम स्वच्छ है। जलधार के बीच में जहाँ-तहाँ कमल के फूल खिले हुए हैं जिन पर भँवरे मँडरा रहे हैं।

भोलेनाथ ने कहा यह तो मन को आनंद देने वाली नदी है इसलिए इसका नाम नर्मदा होगा। पार्वती मैया बोली इसकी कलकल ध्वनि मन को शांति दे रही है। रव (शोर) करने के कारण इसे रेवा कहा जाएगा। पार्वती मैया ने अपनी प्यास बुझाने के लिए नदी से एक अंजुरी जल लिया तो उसमें दूब का गुच्छा आ गया। दूसरी बार जल लेने पर किंशुक कुसुम भी साथ में निकले। तीसरे प्रयास में पानी के साथ-साथ अंजरी में एक फल भी मिला। पार्वती मैया को उलझन में देखकर भोलेनाथ ने बताया कि उस दिन चौत्र शुक्ल तृतीया होने के कारण विवाहित स्त्रियां अपने सुहाग की दीर्घायु और आनंदपूर्ण वैवाहिक जीवन के लिए और अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति हेतु व्रत कर गौरी पूजन करती हैं। उनके द्वारा गौरी को चढ़ाई गयी पूजन सामग्री नदी में जल के साथ प्रवाहित होकर तुम तक आ रही है।

यह सुनकर अपने प्रति स्त्रियों और कन्याओं की अचल भक्ति देखकर पार्वती मैया परम प्रसन्न हो भोलेनाथ से बोली- स्वामी! आप मेरे मायके के जैसा एक नगर बनवा दें ताकि सब नारियाँ वहाँ एकत्र होकर एक साथ मेरे साथ गणगौर व्रत कर सकें और मनवांछित आशीष पा सकें। भोलेनाथ ने पार्वती जी की प्रसन्नता के लिए उनके कहे अनुसार एक नगर बसा दिया।

स्त्रियों और कुमारियों के समूह वहाँ पहुँचने लगे। पार्वती जी से, स्त्रियों तथा कन्याओं ने एक साथ पूजन कर भोलेनाथ से अखंड सुहाग का वरदान पाया। पार्वती जी ने उन सब ग्रामवासिनियों पर सुहाग रस की वर्षा की।

कुछ समय बाद समाज के श्रेष्ठ वर्ग की महिलाएँ-कन्याएँ सोलह श्रृंगार कर भोलेनाथ और पार्वती जी के पूजन हेतु पहुँची। तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीरकर रक्त छिड़ककर सुहाग का वरदान दिया।

सबके संतुष्ट होकर चले जाने पर पार्वती मैया ने भोलेनाथ की अनुमति से नर्मदा जल से पुनः स्नान किया और बालू (रेत) का शिवलिंग बनाकर उसका पूजन कर प्रदक्षिणा की और दो कण प्रसाद पाया। उस पार्थिव लिंग से भोलेनाथ स्वयं प्रकट हुए और मैया पार्वती को अखंड सुहाग का वरदान दिया।

मालवा, निमाड़, राजस्थान, गुजरात आदि क्षेत्रों में गणगौर का लोकपर्व लंबे विछोह के बाद भूतभावन भोलेनाथ और हिमालयतनया पार्वती के पुनर्मिलन की स्मृति में धूमधाम से मनाया जाता है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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