इस युग के यूरोप में तीन महा घमंडी शासक पैदा हुए- नेपोलियन, मुसोलिनी और हिटलर। तीनों अपने आप को अपराजित मानते थे। तीनों ने विश्व साम्राज्य का सपना देख रखा था।
तीनों तपे और खूब तपे, किन्तु उनका हस्र क्या हुआ? सम्राट नेपोलियन का तो कथन ही था कि शब्दकोष से ‘असंभव’ शब्द ही हटा देना चाहिए। सारे यूरोप को उसकी विजय वाहिनी ने रौंद कर धर दिया। नेपोलियन जिधर भी गया-विजय उसका स्वागत करने को पहले से ही खड़ी मिली। वही नेपोलियन-एक नन्हे से समुद्री टापू के कारागार में मरा। उसकी विजयों का महत्त्व क्या रहा? एक साधारण सा कैदी बन कर वह जेल में सड़ता रहा। कहां गया उसका गर्व_ उसका घमंड? मदान्ध मुसोलिनी पूरा दानव बन गया था।
अपनी हवाई ताकत पर उसे बड़ा गर्व था। शक्ति के मद में चूर मुसोलिनी कहा करता था “युद्ध ही विश्व की अनिवार्य आवश्यकता है, जरूरत है।” नन्हे से देश, अबी सीनिया पर आक्रमण कर उसे तहस-नहस करके प्रसन्न होता रहा वह। उस देश के निवासियों पर विषैली गैसें डलवाई उसके विजय के लिए। युद्ध को संसार की अनिवार्य आवश्यकता बताने वाले सीन्योर (अपराजित) मुसोलिनी का अंत युद्ध ने ही कर दिया। फांसी के तख्ते पर प्राणान्त हुआ उसका। हिटलर का तो नाम ही आतंक का प्रतीक बन चुका था। उसने एक हाथ में हथकड़ी और दूसरे में बम लेकर विश्व को चुनौती दे दी थी-‘हथकड़ी पहनो।
मेरी परतंत्रता स्वीकार करो, नहीं तो तुम्हारे ऊपर बम डाल दूँगा, भून डालूंगा मैं तुम्हें।” युद्ध की अग्नि स्वयं हिटलर ने लगाई और उसके सामने ही उस युद्ध में जर्मनी को खंडहर बना दिया। एडाल्फ(अपराजित) हिटलर का अस्तित्व इस प्रकार मिट गया कि उसकी लाश का भी किसी को पता नहीं चला। प्रकृति गर्वहारी है। मनुष्य का घमंड मिथ्या है। धन का, बल का, सेना का, ऐश्वर्य का, किसी का कितना भी बड़ा गर्व क्यों न हो-वह तो मिटेगा ही_ मिटकर ही रहेगा। हमें भूल कर भी गर्व नहीं करना चाहिए। पर पीड़क न बन कर हम परोपकारी बनें, दीन-दुखियों की सदा सहायता कर जरूरतमंदों की मदद करें।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
