das paise ka sikka
das paise ka sikka

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

मैं कुछ सात-आठ बरस की रही होऊंगी।

हमारे जमाने में उस समय पैसों का चलन था, एक, दो, तीन आने तो नहीं,अब इतनी भी बूढ़ी नहीं हूँ …हाँ तो मैं कह रही थी, पाँच, दस, पंद्रह, बीस,पच्चीस, पचास पैसे…आप समझ रहे हैं न?

हमें तो भई खर्च ने के लिए यही पैसे मिला करते थे और इन पैसों से मन की खजानी मिल भी जाया करती।

बुड्डी के बाल, छोटे गर्म गुलाब जामुन … सच्ची के गुलाब जामुन भई!

एक बुजुर्ग आया करता गली में, लम्बे से बाँस की पतली काड़ियों से बना मूढा, उस पर पीतल की चमचमाती बड़ी-सी परात और एक हाथ में नूतन बत्तियों वाला स्टोव।

ये जो बुड्डी के बाल वाला था न, यह भी ऐसी ही एक मशीन और बाँस की छोटी-छोटी काड़ियां और साथ में जादू की शक्कर लिए, “बुड्डी के बाल…बुड्डी के बाल” चिल्लाता घूमता।

मुझे याद है गली में उसकी पहली आवाज और माँ से मेरी जिद्द के बीच वो गली के आखिरी छोर तक पहुंच जाया करता और माँ से पैसे ले मैं उसे भैया-भैया चिल्लाते गली के आखिरी छोर तक दौड़ जाती।

कहाँ थकान लगती थी उस समय, गलाबी बालों का गच्छा एक पतली डंडी पर चिपका वो दिया करता था। धीरे-धीरे उसे खाते हुए मैं तब तक न घर पहुंचती जब तक वो मेरे मुंह में घुल कर पूरा मुंह और जीभ को लाल न कर देता।

छोटे गुलाब जामुन वाला हमारे घर के सामने ही अक्सर बैठता। अपना बत्तियों वाला स्टोव जलाता, शीरे से भरी गुलाब जामनुओं की बड़ी परात उस पर करीने से रखता और बड़े से पलटे के परात पर टन टन मारता हुआ सबको अपने आने की खबर देता।

बच्चों के साथ बड़े भी चाव से उससे छोटे गर्म गुलाब जामुन खरीदते और खाते।

मैं अक्सर बैठ कर उस बुड्डे को देखती। उसका चेहरा मुझे अपना-सा लगता, उसकी सफेद दाढ़ी-मूंछ और मटमैली-सी पगड़ी के नीचे माथे की बेतरतीब लकीरें भी गिनी हुई सी लगतीं। मन भर-भर आता उसे देख कर। इतनी बड़ी भी नहीं थी कि समझ पाती क्यों ऐसा होता था, पर जब घर के भीतर जाती तो बाबा जी (दादा जी) की काली अचकन और नीली पगड़ी वाली फोटो जरूर देखती।

हार पहने टंगी फोटो वाले बाबा जी और गली में गुलाब जामुन बेचने वाले बुड्डे को देख तसल्ली होती कि मेरे बाबा जी को मैंने चलते-फिरते देखा, उनका मेरे आस-पास होना महसूस किया।

एक दिन मैं दूसरी गली में रहने वाली मेरी सहेली के घर खेलने गई। माँ मुझे जल्दी से कहीं भेजती नहीं थी। पर मैंने शर्त मानी थी कि आज के लिए खजानी के दस पैसे नहीं मांगूगी।

दौड़ पड़ी सहेली के घर।

दो मंजिला मकान और मैं नीचे से उसे आवाजे दिए जाऊँ। पांच मिनट बाद उसने अपनी खिड़की से मुझे झांका और सीढ़ियों से नीचे आ मेरी कलाई थाम ऊपर ले जाने लगी।

अंधेरी सीढ़ियां, ईंटों की बनी हुई, थोड़ी ऊबड़-खाबड़। एक सकरी-सी गली और गली से लगे दरवाजे के भीतर एक बड़ी-सी बैठक।

लाल रंग मिले सीमेंट की मलाई किया हुआ हरी किनारे की पट्टियों से अटा हुआ बड़ा सा कमरा। उसी में डाइनिंग टेबल, किनारे पर सोफा सेट, टीवी, मतलब शहर के मशहूर हलवाइयों की शानबान से भरा हाल।

मेरी सहेली की मम्मी ने हमें लस्सी पिलाई, और सहेली मुझे अपनी छत पर ले गई।

गुड्डे-गुड्डी और खिलौने जो छत पर ही खड़ी मंजियों से तीनों ओर आड़ कर के रंग-बिरंगे दुप्पट्टों से ढंके छोटे से कमरे का आकार दे कर सजाए हुए थे।

हम खेलने लगे। छत भी बड़ी सी थी, मैं एक छोर से दूसरे छोर दौड़ने लगी। अचानक एक चमकता सिक्का दिखाई दिया। पास आ कर पैर से टटोला तो दस पैसे का सिक्का था। मन हुआ तुरंत उठा लूँ और छिपा लूँ। पर ऐसा करना गलत लगा। अनदेखी कर खेल में मस्त हो गई। अब वो सिक्का बीच-बीच में मुझे झांकने लगा, और मैं भी कनखियों से उसे।

मन ही मन संकल्प कर लिया कि सहेली से नजर चुरा कर उठा ही लूंगी।

खेलते हुए देर होने लगी। सहेली की माँ ने हमें नीचे बुला लिया। मेरा ध्यान सिक्के पर ही था और सिक्का भी मानो उचक कर मुझे देख रहा था।

सोच रही थी कि अमीरी भी क्या शय है, इनके घर में कितने पैसे होंगे कि इनको इस गिरे हुए दस पैसे की कोई चिंता ही नहीं।

माँ ने बताया था, लक्ष्मी का अपमान करने से घर से लक्ष्मी चली जाती है। इतनी लापरवाही कि यहाँ पैसे गिरे पड़े हैं और इनको होश नहीं।

भारी मन से मैं नीचे उतरी, घर जाने को हुई, अचानक याद आया मेरा रूमाल छत पर ही छूट गया।

मैं फिर से चहक कर छत पर चढ़ी, झट से रूमाल उठाया और सिक्के के पास पहुंची, सिक्का उठा कर हाथ में भींचा और जैसे ही उतरने लगी, जाने क्या मन में आया उसे वहीं मुंडेर पर रख जल्दी से नीचे उतर आई।

अपने घर की ओर बढ़ने लगी। रह-रह कर सिक्के की चमक आंखों में चौंधिया रही थी। गली में जैसे ही घुसी गुलाब जामुन वाला बुड्डा अपने सामान के साथ घर के आगे बैठा था। मैं भीतर न जा कर वहीं ड्योढ़ी में बैठ गई। जानती थी, पैसे तो माँ देगी नहीं,और किस्मत ने दस पैसे दिखाए भी, तो अंजाने डर से उसे छोड़ आई।

गुलाब जामुनओं की खुशबू नाक में भर रही थी। चुपचाप उस बुड्डे को निहार रही थी और बाबा जी को याद कर रही थी अचानक वो बुड्डा उठा और कागज के दौने में मुझे पांच छोटे गुलाब जामुन दिए और बिना पैसे लिए अपना सामान समेटने लगा।

गुलाब जामुनओं की गरमाहट हथेली महसूस कर रही थी। मेरे उदास चहरे पर एक चमक आ गई।

सहसा मेरे मुंह से निकला, “बाबा जी …पैसे कल दूंगी।”

उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा, एक मुस्कान बिखेरी और चल दिया।

मैं गली के आखिरी छोर तक उसे निहारती रही।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’