भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
अपने ब्लाउज में पैडिंग ठूसते हुए वल्ली मौसी ने गुनगुनाना शुरू किया “मेरी नथनी सवा लाख की रे साजना।” साड़ी पहनकर उसने शीशे में अपने आप को ताड़ा, पर जैसे कुछ तय नहीं कर पाई। वास्तव में सजने-संवरने का लक्ष्य ही होता है प्रशंसा पाना, पर विडंबना यह है कि प्रशंसा पाने के लिए अन्य लोगों के औदार्य पर निर्भर रहना पड़ता है। और अन्य लोगों से औदार्य की अपेक्षा वल्ली मौसी बहुत पहले ही छोड़ चुकी थी।
पुराने पुल के नीचे, किन्नरों की बस्ती में, वल्ली मौसी रहती थी। अपनी पचपन साल की उमर में पैंतालीस साल उसने इसी बस्ती में बिताए थे। वल्ली के सारे सुख-दुख, रिश्ते-नाते सब इसी बस्ती से जुड़े हुए थे। वह इस शहर की नस-नस से वाकिफ थी। जैसे हर किन्नर अपने शहर के लोगों की हैसियत और फितरत समझता है, वैसे वल्ली भी यहां के लोगों की नियत और औकात खूब जानती थी। किसी के आगे हाथ फैलाने से पहले ही वल्ली नाप लेती थी कि कौन डर के पैसे देगा, कौन घृणा से, और कौन पीछा छुड़ाने के लिए।
“अरी चाची चल धूप निकल आई!” माधुरी ने बाहर से आवाज लगाई। माधुरी अपने आप को किसी फिल्म की हीरोइन से कम न समझती थी। गाढ़ी लाल लिपस्टिक और कान में बड़े से झुमके उसकी स्थाई पहचान थे। वल्ली ने माधुरी की आवाज सुनकर जल्दी से नकली जुड़ा लगाया और बाहर निकल आई। दोनों चल दिए। तेज धूप में शहर खोटे सिक्के की तरह चमक रहा था।
करीब तीन घंटे बाद भी ट्रैफिक सिग्नल पर दोनों को कुछ खास कमाई नहीं हुई। वक्त के साथ लोगों की जेब और दिल दोनों छोटे हो चले थे। उस पर सरकार ने शिक्षण बढ़ाकर लोगों को रेशनल बना दिया था। अब आधुनिक लोग किन्नर के श्राप से डरते नहीं थे। माता के कोप से ज्यादा भयानक उन्हें महंगाई लगती थी।
करीबन दो बजे. वल्ली मौसी और माधुरी बस स्टैंड की एक टपरी पे चाय और मस्काबन लेकर बैठे। सुबह से दोपहर हो गई थी, पर बस 130 रुपए मिले थे। वल्ली ने सर पीटते हुए कहा, “चाय पानी का निकाल के दोनों के हिस्से मे पचास-पचास मुश्किल से आएगा।”
माधुरी ने भी सरकार और पढ़े लिखे लोगों पर अपनी भड़ास निकाली। उसे इस महीने नई साड़ी खरीदनी थी, पर देने वाले हाथों की कृपणता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। दोनों चाय के साथ पावरोटी का सूखा टुकड़ा चबाती हुई भीड़ को चुप-चाप देखती रही। हजारों aआने-जाने वालों की भीड़ में सड़क के किनारे बैठी वह दोनों कुछ अजीब-सी लग रही थी। उन्हें न कहीं जाना था, न कहीं कोई उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। बचपन से ही उनके जीवन में कोई खास ध्येय नही था, न स्कूल, न नौकरी, न घर, न रिश्ते। मानो जीने की कोई ठोस वजह ही नही थी, और इसीलिए उन्होंने छोटी-छोटी वजह खुद बना ली थी…जैसे नई साड़ी खरीदना, फिल्म देखना, झुमके खरीदना, और जिंदा रहना।
शाम होने को आई थी, और माधुरी ने कहा, “चल चाची कादंबरी चलते हैं। चौबीस नंबर वाली को बच्चा हुआ है।”
कादंबरी मध्यम वर्गीय लोगों की वसाहत थी। वल्ली मौसी और माधुरी अक्सर यहां आया जाया करते थे। तीज-त्योहार, शादी-ब्याह पे उनका हमेशा का फेरा रहता था। चौबीस नंबर के मकान में एक बड़ा सा परिवार रहता था। उस घर की बहू को कुछ ही दिन पहले बच्चा हुआ था सो शगुन लेना बाकी था। हलाकि वल्ली उस परिवार से कुढ़ती थी क्योंकि पूरा घर महालोभी था। एक-एक रुपए के लिए घर की औरतें चिक चिक मचा लेती। पिछली दीपावली तो बह ने झगडा करके सिर्फ इक्यावन रुपए दिए थे. सो आज भी कोई बड़ी आशा नहीं थी। इन सब के बावजूद, वल्ली और माधुरी कादंबरी की तरफ चल दी।
चौबीस नंबर पर पहुँची तो दोनों का मुंह बिगड़ गया। घर के आंगन में बहू कपड़े सूखा रही थी, और सास दो चार औरतों के साथ बैठकर अचार बना रही थी। वल्ली और माधुरी को यकीन हो गया की प्रतिवादी का संख्याबल ज्यादा होने कि वजह से आज कम रुपए में ही संतुष्टि करनी पड़ेगी। फिर भी कमर कस के माधुरी ने तालियां बजाते हुए शुरू किया, “माई बच्चे की नजर उतारने आई। शगुन करा दे, लल्ला को गोदी में दे दे।”
बहू अंदर जाके कपड़े में लिपटा हुआ गोल-मटोल बच्चा ले आई। वल्ली और माधुरी ने जब उसे हाथ में लिया तो बच्चा टुकुर-टुकुर देख कर हंस दिया। उसकी नजर उतारने के बाद ही अस्ली नोक झोंक शुरू हुई।
वल्ली और माधुरी ने 501 मांगे। सास ने 100 रुपए देने की बात की। ऊपर से बहू और सारी पड़ोसन भी इकट्ठा हो के खींच-तान करने लगी। यह मोर्चा लंबा चला। आसपास के घर से भी औरतें झांक के यह तमाशा देख रही थी।
आखिर थक कर वल्ली ने कहा, “चल ठीक है २५१ दे दे। अब कम मत बोलना, तेरे लल्ला को माई लंबी उम्र दे।”
इस पर सास ने कुढ़ कर कहा, “अरी पर यह लल्ला नहीं है मौसी, बेटी है। सोच समझ के मांगो।”
वल्ली ने निराशा से कहा, “ठीक है, चल 151 दे दे।”
और ठीक उसी पल… पता नही पीछे खड़ी बहू को क्या हो गया। वो सारी औरतों को धक्का लगाती हुई आगे बढ़ आई। उसकी आंखें लाल हो रही थी, और होंठ किसी अज्ञात आवेश से कांप रहे थे। उसने ब्लाउज से 500 का नोट निकाल के वल्ली के हाथ पे धर दिया, और कहा, “नहीं, 500 ही लेना पड़ेगा… और बेटी को लंबी उम्र की आशीष देना।” इतना कह कर वह आंधी की तरह बच्चे को लेके अंदर चली गई।
माधुरी की हंसी रुक ही नहीं रही थी। वह लोग कम लेने के लिए तैयार थे, लेकिन फिर भी बहू ने ज्यादा थमा दिए। उसने हंसी से लोटपोट होते हुए वल्ली से कहा, “यह बहू तो बड़ी बेवकूफ निकली।” वल्ली ने सिगरेट का कश लिया और डूबते सूरज में अजनबी से शहर को देखती रही।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
