Hindi Kahani: घर के आगंन मे चिड़िया सुबह—सुबह शोर कर रही थी। आवाज बड़ी प्यारी लग रही थी बाहर आ कर देखा ठंडी हवा चल रही थी गरमी के बाद शरद आने वाला होता हे तो कुछ दिन हवा ठंडी भी अच्छी लगती हे ।
बाबू जी बाहर आंगन मे अपनी कुरसी पर बैठे महाराज से चाय बनवा कर पी रहे हे मैने पूछा, बाबू जी क्या सोच रहे हैं बडी गम्भीर मुद्रा में बैठे है? बोले बेटा ,हमनें शोर तो नही किया , तुम्हारी क्या नींद खराब हो गयी ?कल से बाहर नही आऊंगा। मैं घबरा गयी क्या हुआ बाबू जी आप ऐसे क्यों कह रहे हो
बाबू जी बड़े परेशान थे, बोले बेटा सो जाओ अभी बाद मे बात करेंगे।
नहीं बाबू जी आप घर के सबसे बड़े है। परेशान हो तो हमे नींद नहीं आयेगी, बोले बेटा कल शाम को पार्क मे एक बुजुर्ग बड़ा परेशान मिला, कह रहा था आज सुबह से मैंने कुछ खाया नही है। बहु बच्चे सब घूमने गये हैं घर में कुछ हैं नही काम वाली बाई को भी छुट्टी दे दी गई है, मैं बहुत परेशान हूं
आप आफिस गयी थी राकेश बाजार गया था। कल रात को मैने चार रोटी सब्जी आपको बाताये बिना , उनको दे दी। अरे बाबू जी इसमें परेशान होने की क्या बात है आप का आपना घर है आप घर के बड़े है और भूखे को भोजन जरूर देना चाहिये
जब तक उनके बहु बेटा नहीं आते आप सुबह शाम दोनों समय का भोजन दीजिये अन्नपूर्णा हमारे घर में रहती है आप कभी भी ऐसा मत सोचना और सब आपका है अपने अधिकारों को कम मत समझना
वैसे बाबू जी हे कौन वो बेटा , थोड़ी दूर रहता हे हमारी सोसायटी में , छोड़ो बाबू जी अब आराम करो रात भी आराम से नहीं सोये थे।
Also read: औरत पहले हूं—गृहलक्ष्मी की लघु कहानी
छुट्टी का दिन था, मैंने महाराज को कहा चाय बना दे। खाना बनाना थोड़ा ज्यादा बनाना बाबू जी अपने दोस्त के लिये सुबह शाम खाना देंगे। दो चार दिन बीत गये । सब अपने अपने काम मे लग गये । एक दिन सोसायटी में बडा शोर मच रहा था। कपूर जी घर बेच कर चले गये, कहां गये किसी को नही बाताया। मैंने पूछा बाबू जी कपूर साहब कौन है, जो घर बेच गये ये वही हैं जिन्हे चार छ: दिन मैंने खाना दिया था । उन्हें लोगों ने सलाह दी ऐसे लोगों को घर देने की क्या जरूरत हे जो दो वक्त का खाना भी नही दे सकते
खुद ना बनाये पर काम वाली को तो छुटी नही देते
कपूर साहब ने अपना रहने का इन्तजाम वृद्धा आक्षम में पैसे दे कर कर लिया। बाकी पैसा अपने पास रखा
रिटायरमेन्ट का पैसा बेटे ने पहले ही अपने फ्लैट के लिये ले लिया था और आराम से रहने लगा
कपूर साहब ने दो बच्चे जिनके मॉ बाप करोना से गुजर गये उन की परवरिश भी की। और आराम से रहने लगे
बच्चे वृद्ध आक्षम में मिलने आते और आदर करते घर का अपना सामान उन्होंने दान कर दिया । बच्चों का सामान उनके फ्लेट मे रख दिया । सोसायटी में फ्लैट की चाबी लिखा पढी करके दी और कहा उन से राजिस्टर में हस्ताक्षर ले कर चाभी देना मेरा पता नही बताना अब मुझे आराम से रहने दो
कुछ एक महीने बाद बच्चे आये घर पहुंच कर देखा , घर के बाहर ताला लगा है । बाबू जी को फोन लगाया फोन बन्द कर दिया था। आस—पडोस के लोगों से पूछा तो किसी को कुछ नहीं पता था। सोसायटी में जा कर बात की । पता चला यह मकान बिक गया है, जो यहां रहते थे वो चाभी देकर गए हैं। रजिस्टार से बात करके आप इस मकान की चाबी ले सकते हैं।
बहुत साल बीत गये बाबूजी का पता नही चला आचनक एक बार बच्चों की सालगिरह पर वृद!ध्रर आक्षम भोजन देने गये वहां पिता को देख कर परेशान हो गये उन्होने मुंह मोड लिया तथा अपना रोता मन भी छुपा लिया ।
बच्चे चाहे कितने भी नालायक हो पर मां—बाप दुखी हो कर छिपा लेते हैं। बेटे ने बहुत कोशिश की मानाने की पर वह नहीं माने गुस्सा भी ठीक था ।एक महीने के लिये जा रहे हो काम वाली को भी छुट्टी दे दी बल्कि उस को समझा कर जाते बाबू जी के सब काम तय समय पर करना उन्हें कोई परेशानी ना हो उनका निरादर कर के चल दिये इन्सान कहां जाये जीवन मे कभी बड़ों का निरादर ना करना हाथ से सब जायेगा
अच्छा आचरण बुजुर्गों का आदर करता हे मनुष्य की वास्तविक पूंजी धन नही उसके विचार हैं। पोते ने भी दादा को देखा उससे बात की पर ज्यादा नहीं कि कही फिर मोह मे ना फंस जाऊं
घर आते ही बेटे ने कहा मां—पापा आप तो अभी से अपना स्थान बुक कर लो क्योंकि आपका बेटा जो देख रहा वही करेगा मॉ बहुत गिड़गिडायी पर उन्होंने उसकी तरफ ध्यान नहीे दिया अपना मन भगवान में लगा कर कुछ महीने जिये और मौत को गले लगा लिया। जिन बच्चों को पढा रहे थे उन्हें सब अधिकार दे दिये गये थे उन बच्चो ने सब काम पूरे किये और शहनशाह की तरह आदर से विदाई दी।
