abhimaanee hava
abhimaanee hava

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

सुंदरवन सचमुच बहुत सुंदर था। यहां तरह-तरह के पेड़ व जीव-जंतु हिल-मिलकर रहते थे। सब परस्पर एक-दूसरे से परिवार की भांति जुड़े थे। बड़े छोटों को स्नेह देते और उनकी देखभाल करते तो छोटे बड़ों का कहना मानते और उन्हें सम्मान देते थे। हवा को यह देखकर बहुत आश्चर्य होता था। वह किसी से अधिक वास्ता नहीं रखती थी। वह सदा इस अभिमान में रहती थी कि यदि मैं बहना बंद कर दूं तो इन सब को पता चल जाए। परंतु वह नीमू दादा को बहुत प्यार करती थी और अधिक से अधिक समय उनके साथ ही बिताती थी। वह उनकी पत्तियों को अपनी गति से झूला-झूलाती व पतली-पतली टहनियों को नाच नचाती…यहां-वहां शाखाओं के बीच लपकती, फिरती रहती थी। नीमू दादा को उसकी अठखेलियां भाती थीं। वह उसे थपका कर अपने से लिपटा लेता था।

हवा के मन में न जाने कहां से यह बात घर कर गई कि वह सबसे महत्त्वपूर्ण है, सबसे न्यारी है। पर सब उस हिसाब से उसकी पूछ नहीं करते।

आज वह नीमू दादा को कह ही बैठी, “दादा! मैं न रहूं तो पृथ्वी पर जीवन ही खत्म हो जाएगा। जंगल के सारे जीव-जंतु, पेड़-पौधे सब खत्म हो जाएंगे…पर ये मेरी परवाह नहीं करते… मेरे महत्त्व को नहीं समझते…. सब अनभिज्ञ बने चुप रहते हैं।”

“ऐसा नहीं है बिटिया रानी! हम सब परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं… एक के बिना दूसरे का जीवन कुछ भी नहीं।”

“नहीं दादा! आप भी न, अपनी बिटिया की ताकत को नहीं समझते… देखो-देखो! मैंने अपनी तनिक-सी गति बढ़ाई और आप की टहनी के ये पीले पत्ते धरती पर लुढ़कने लगे। मैं और तनिक गति बढ़ा दूं तो ये छोटे-मोटे पौधे तो धरती पर ही लोट जाएंगे। और ये देखो!” हवा ने गति पकड़ी तो धूल का बवंडर आसमान की तरफ गोल-गोल लट्टू-सा घूमता ऊपर जाने लगा। हवा यह देखकर खिल खिलाने लगी।

नीम का पेड़ निरुत्तर हो सोच में पड़ गया। इसे कैसे समझाऊँ कि इसका अपने ऊपर इतना अभिमान करना ठीक नहीं।

“हवा बिटिया! ऐसा नहीं है, जंगल में हम-सब मिलकर रहते हैं। तुम्हारा अपने बल से किसी को सताने के बारे में सोचना ठीक नहीं बिटिया!” नीम के पेड़ ने समझाते हुए कहा।

परंतु हवा ने नीम के पेड़ की एक न सुनी, उसके सिर पर तो घमंड का भूत सवार था।

रात के नीम अंधेरे में पेड़ों ने हवा को सबक सिखाने के लिए गुपचुप योजना बनाई और सूर्यदेव से मुलाकात करने का निश्चय किया।

सुबह हवा ने देखा, जंगल के सब पेड़ गायब हो गए। उसे बड़ा अचरज हुआ।

“खैर जाने दो, मुझे क्या! कौन-सा उन बिन मैं मरी जा रही हूं।” वह मन ही मन बड़बड़ाई।

हवा दिन भर इधर-उधर बहती रही। किसी ने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया। वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए वेग से बहने लगी। सबने अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लीं।

हवा ने देखा जो लोग पहले खुले पार्कों में उसका साथ पाने को तत्पर रहते थे, वे अब उससे दूर भाग रहे हैं… वे सब अपने-अपने घरों में बंद हो रहे हैं। पहले तो उसने सोचा कि ये सब मुझसे डर कर भाग रहे हैं, पर लोगों की आंखों में अपने प्रति नफरत देखकर वह आश्चर्यचकित रह गई।

“मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?” निराश हो वह अपने प्रश्न का उत्तर खोजने निकल पड़ी। मगर वह किससे पूछे? नीमू दादा भी पता नहीं कहाँ चले गये हैं? सब उससे जान छुड़ा कर भाग रहे हैं।

रास्ते में उसे बादल भैया दिखाई पड़े। बादल ने भी उसे देखकर अपना मुंह मोड़ लिया।

“अच्छा अभी तुझे बताती हूं…” कह कर वह उसे अपनी गति से इधर-उधर, ऊपर-नीचे डुलाने लगी। जब थक गई तो बोली, “बादल भैया! तुम भी मुझसे नाराज हो क्या? मैंने ऐसा क्या कर दिया है? और ये सारे पेड़ भी आज कहां गायब हो गए। मेरे नीमू दादा भी कहीं नहीं दिखाई दे रहे?”

“सच सुन पाओगी!”

“हां… हां बताओ न भैया!”

“यह सब तुम्हारे घमंड की वजह से है…”

“मेरी वजह से?”

“और नहीं तो क्या! तुम्हें पता भी है, तुम क्या कर बैठी हो…?”

“हां…हां भैया! मैं भी सोच रही हूं कि पता नहीं सब मुझसे नफरत क्यों कर रहे हैं? कोई भी मुझे पसंद नहीं कर रहा… सब मुझसे दूर भाग रहे हैं… ऐसा क्यों?”

“इसका कारण भी तुम स्वयं हो! पेड़ों के न रहने से तुम्हारे अंदर ऑक्सीजन खत्म हो गई है। अब तुम्हारे अंदर केवल और केवल जहर भरा है। तुम लोगों की सांसें घोंट रही हो… तुम्हारा मुख्य घटक ऑक्सीजन, जो प्राण वायु था, जो पेड़ों से तुम्हें प्राप्त होता था और लोग तुम्हें इसी वजह से गले लगाते थे।”

“हां! तभी मैंने लोगों को प्रार्थना करते सुना था कि हे भगवान! हमारे जंगल के पेड़ वापस भेज दो… कमबख्त जहरीली हवा ने तो हमारा जीना हराम कर दिया है।”

“और क्या तो पेड़ों के बिना हम बादल भी परेशान हो गए हैं… अब हम अपनी जल गगरी लिए पेड़ों को ढूंढ रहे हैं… कहां जाकर अपने जल की गगरी उड़ेले… इसीलिए तूफानी रूप धारण करने पर मजबूर हैं!”

“तब तो मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई बादल भैया! अब मैं क्या करूं? सच कहूं! मुझे अपने नीमू दादा की बहुत याद आ रही है। कुछ दिनों से मैं एक पल को भी आराम नहीं पा सकी हूं।”

“चलो… चलो सूर्य देवता के पास चलते हैं। अब वही कुछ कर सकते हैं!”

“हूं! मैं सब जानता हूं कि तुम क्यों आए हो? ऐ नादान हवा! तुम्हें अपने ऊपर इतना अभिमान नहीं करना चाहिए था। मैंने ही तुम्हें सबक सिखाने के लिए जादू से सुंदरवन के पेड़ों को यहां अपने इस सुनहरे वन में बुला लिया था।”

“ओह! वह रहे मेरे नीमू दादा! मुझे माफ कर दो दादा! तुम ठीक कहते थे, हम सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। क्षमा कर दो दादा!”

हवा की आंखों में पश्चाताप के आंसू देख कर नीम के पेड़ ने हवा को दुलारते हुए अपने इर्द-गिर्द लिपटा लिया। सुंदरवन में पूर्व की भांति बहार आ गई।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’