अपने लोग-गृहलक्ष्मी की कहानियां
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Hindi Kahani: मुख्य अभियन्ता के पद से सेवानिवृत्ति पाकर राजधानी जयपुर में अपना सरकारी निवास खाली करते समय ज्योंही मेरे हाथ अपनी दिवंगत माँ की दीवार पर लगी बड़ी सी तस्वीर की ओर बढ़े, स्मृतियों की तेज आँधी मेरे मन को व्यथित कर गई…
मैं तस्वीर को भावों की तरंगों के साथ उतार कर उस पर लगी धूल को धीरे-धीरे पौंछने लगा फिर मन ही मन बुदबुदाया, ‘माँ, ओ माँ! आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है! जानती हो, क्यों? आज मेरी सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्ति हो रही है!’
तुम जब जीवित थीं तो कहती थीं, ‘संदेश, तू कब रिटायर होगा रे? कितने साल और हैं तेरे रिटायर्मेंट में?’
मैं कह उठा था, ‘क्यों माँ, आज यह सब क्यों पूछ रही हो?’
तुम्हारा जवाब था, ‘क्यों न पूछूं? तू जब से नौकरी पर लगा है, कितने साल हो गए हैं आज; तेरे साथ-साथ ही तो डोल रही हूँ मैं। अपना घर, अपने लोग तो छूट ही गए हैं न?’
‘माँ, तुम कहो तो आज ही तुम्हें वहाँ घुमा लाऊँ!’
‘वो जाना भी कोई जाना है बेटे?चाहती हूँ, तू रिटायर हो जाए तो सब वहीं रहेंगे…कितने बरसों से बाट जोह रहा है अपना घर।’
‘रिटायर्मेंट में तीन साल ही तो बचे हैं अब…’ माँ ने मेरे कथन को बीच में ही काट दिया था, ‘अरे बेटा, इस अवस्था में तो एक पल का भी भरोसा नहीं…तीन साल किसने देखे हैं!’
और सचमुच माँ कुछ समय में ही चल बसी थीं। इस तरह अपने घर लौटने का उनका सपना अधूरा ही रह गया था।

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मैंने माँ की उस तस्वीर को सँभाल कर बहुत प्यार से अपनी कार की पिछली सीट पर रख छोड़ी मानो वह उनकी फोटो नहीं, साक्षात् वे स्वयं ही लौट रही हों अपने उस छोटे से शहर में जिसका नाम है सलूम्बर।
ट्रक में सारा सामान लदवा कर राजधानी जयपुर से सलूम्बर की ओर परिवार सहित मेरी कार भी चल पड़ी थी जहाँ जीवन का शेष समय गुजारना था, उस शाँत से बड़े मकान में, जो स्थित था प्रकृति के सुरम्य हरे-भरे घने वृक्षों की सघन छाया के बीच जिसमें अनगिनत पक्षियों का बसेरा था और सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार कोयल की सुरीली मीठी कूक कानों में मिश्री घोल देती थी।
माँ, जो इन पक्षियों और पेड़ों के बीच से निकल कर मेरे मोह में बँधी जयपुर की बहुमंजिला वृक्षविहीन इमारतों के मध्य कैद हो गई थीं, इस तड़प के साथ कि जहाँ अब वे कोयल की कूक से सर्वथा वंचित थीं।
सलूम्बर का मकान, जहाँ मेरा बचपन बीता था और जो माँ के विवाह पश्चात् बरसों तक उनका प्रत्यक्ष गवाह बना था; उस खानदानी सुन्दर सी हवेली में वे किसी महारानी की तरह रहती थीं।
फिर मेरी बढ़ती लंबाई के साथ ही सब कुछ बदलता चला गया था। बाबूजी के निधन के बाद माँ मेरे बिना और मैं माँ के बिना नहीं रह पाता था। माँ ने मेरे साथ रहने के सुख के लिए उस हवेली की सुख-शाँति और स्मृतियों का परित्याग कर दिया जो उन्हें बहुत प्रिय था लेकिन मेरा साथ शायद उससे भी अधिक।
उदयपुर से 70 किमी. दूर 70 मोड़ों को पार करने के बाद हाड़ी रानी के लिए प्रसिद्ध उस कस्बेनुमा छोटे शहर में मेरी कार जब ट्रक के साथ-साथ पहुँची तो हमारे उस मजबूत हवेलीनुमा मकान के पड़ौसी ही नहीं बल्कि हवेली की दीवारें भी मुस्कुरा उठी थीं।
हमारे घर पहुँचने की देर थी कि कोयल का स्वर कानों से टकरा कर मन को प्रफुल्लित कर गया था और कोयल की सुरीली स्वर-लहरियों के बीच मैंने माँ की कार में पड़ी उस तस्वीर को आहिस्ता और श्रद्धापूर्वक कार से निकाल कर माँ के कमरे की मुख्य दीवार जहाँ बाबूजी की तस्वीर भी थी, के साथ टँगवा दिया हालाँकि माँ की यादों में लिपटी उन अहसासों की धारा भी आँखों से फूट पड़ी थी इस कसक के साथ कि काश, आज तस्वीर की जगह माँ खुद चल कर यहाँ आई होतीं!
ट्रक में लदा सामान उतरकर अब हवेली के विभिन्न कमरों में सजने लगा और अब मैं माँ के कमरे को अपना स्वाध्याय कक्ष बनाकर उसे सँवारने लगा।
तभी फिर से कोयल की कूक मेरे कानों से टकराई तो मैं सारा काम छोड़कर बाहर लाॅन में आ गया और पेड़ों की झुरमुट में बैठी कोयल को देखने की मेरी जिज्ञासा बलवती हो गई। लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वह दिखाई नहीं दी।
मैंने पत्नी को पुकारा, ‘दिव्या, कहाँ हो तुम? किचन से बाहर निकल कर जरा इधर तो आओ…’
दिव्या ने लाॅन में आकर पूछा, ‘क्या बात है, बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं?’
‘सुनो, कोयल की कर्णप्रिय कूहू-कूहू कितनी भली लग रही है!’
कोयल थी कि निरन्तर बिना रुके अपनी स्वर-लहरी से मन को प्रसन्न कर रही थी।
दिव्या भी उसके सुरीले स्वर में डूब सी गई और नीम के घने पेड़ पर बैठी कोयल की एक झलक के लिए उसे तलाशने लगी।
दिव्या की खोजी दृष्टि से कोयल संभवत: सहम गई अत: उसने अपना सुरीला राग बंद कर दिया।
‘हाय, कितनी मीठी आवाज है ना कोयल की?’ दिव्या एक चेयर खिसका कर वहीं बैठ गई और मुझे भी वहीं बैठने का संकेत किया।
मैंने गार्डन चेयर पर बैठते हुए कहा, ‘लेकिन वह दिखाई क्यों नहीं देती?’
‘शर्मीली कहीं की, इस तरह छिप कर बैठी है जैसे हमसे इसका कोई वास्ता ही नहीं।’
‘तुम्हें पता है, माँ भी कोयल की इसी स्वर लहरी की दीवानी थीं और अक्सर कोयल की यादों में डूबकर वहाँ जयपुर में इसकी कूक को मिस किया करती थीं।’
‘सचमुच, कितने रमणीक वातावरण में है न अपना घर? इतने घने पेड़ों की सरसराहट मन मोह लेती है और उस पर कोयल की यह कूक…जीने का आनन्द इस घर में बहुगुणित हो जाता है। वहाँ जयपुर में इतना शान्त वातावरण कहाँ? पाँच सितारा होटल में भी कोयल की यह स्वर-लहरी नहीं मिल सकती!’
सेवानिवृत्ति के बाद अब आराम के, फुर्सत के, और अपने स्वास्थ्य की अतिरिक्त देखभाल के दिन आरम्भ हो गए थे। इसके साथ ही समाजोपयोगी कार्यों की ओर भी मेरा ध्यान गया था।
सलूम्बर में अधिकांश निकट और दूर के रिश्तेदारों के साथ घनिष्ठता जो पहले भी थी, किन्तु सरकारी नौकरी के कारण कमजोर पड़ गई थी; अब पुन: पल्लवित होने लगी। चूँकि अधिकतर सगे-सम्बन्धी सलूम्बर में ही रहते थे, उन सभी अपने लोगों का घर आना आरम्भ होने लगा। अंतर केवल इतना ही था कि पहले यह उत्तरदायित्व माँ और बाबूजी निभाते थे लेकिन अब यह मेरे कंधों पर था। माँ-बाबूजी की पीढ़ी के लोग या तो स्वर्ग सिधार गए थे या फिर वे अपने जीवन के अंतिम चरण में थे।
रिश्तेदारों में कुछ तो अत्यधिक सम्पन्न थे व उच्च पदों पर कार्यरत भी; अधिकांश सामान्य तो कुछ गरीबी रेखा से नीचे भी थे। मैं दृढ़संकल्पित था कि ऐसे असहाय लोगों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने में उनका सहायक बनूँ…माँ भी अपने जीवनकाल में ऐसे लोगों की जब-तब आर्थिक मदद किया करती थीं।
माँ दोनों घरेलू सहायिकाओं को भी बहुत अच्छे से रखती थीं। उन्हें खूब स्नेह देतीं, उनके खाने-पीने में कोई कसर न छोड़तीं, उनसे मधुर बोलतीं और आए दिन उन्हें कुछ न कुछ देकर माँ को बहुत सन्तुष्टि मिलती थी।
कोमल हृदया माँ सबसे प्रीतिपूर्वक व्यवहार रखतीं और दीन-दुखियों की पीड़ा हरने का प्रयास भी करतीं। माँ तो माँ, उनकी बहू दिव्या भी उनके ही पैटर्न पर चल पड़ी थी। सलूम्बर में आते ही दो सहायिकाओं की तलाश शुरू हुई और दिव्या ने यह काम अपने स्तर पर ही निपटा कर उन्हें घर की साफ-सफाई की जिम्मेदारी सौंप दी।
इस बार गर्मी की छुट्टियों में इकलौती बिटिया शिल्पी अपने ससुराल से सलूम्बर आई तो यहाँ के प्राकृतिक वातावरण को देख कर मुग्ध हो गई।
अपने मम्मी-पापा के साथ गप्पें लड़ाना शिल्पी को बहुत भाता था।
एक अवसर पर वह बोली, ‘मम्मा, जयपुर से सलूम्बर की 480 किमी. की दूरी बहुत अखरती है- सफर करते-करते आदमी अधमरा हो जाता है।’
उसकी मम्मी का उत्तर था- ‘सफर के विकल्प तो बहुत हैं ना शिल्पी, जिनमें से एक है- जयपुर से रात को ट्रेन पकड़ो तो सुबह उदयपुर। बाकी 70 किमी. का सफर बस से। लेकिन प्रकृति की गोद में बनी इस हवेली का विकल्प है क्या?’
‘जयपुर में ही मकान बना लेते तो कितना आराम होता न? वहाँ थे तो जब चाहा, आकर मिल लेती थी। अब तो प्लान करना पड़ता है।’
दिव्या फिर बोली, ‘बेटे, तेरी दादी यह घर छोड़ने के बाद, इस घर में, और अपने लोगों के बीच लौटने की बाट जोहते-जोहते स्वर्ग सिधार गईं। तेरे पापा और मुझे भी सेवाकाल के 35 वर्षों के बाद यहाँ रहने का सुख मिला है। और, एक बात बताओ, तेरे पापा बड़े पद पर पहुँचने के बाद भी क्या ऐसा मकान जयपुर में बना सकते थे क्या?’
‘यह बात तो है मम्मा…खैर, मैं बहुत खुश हूँ कि सलूम्बर में आकर बहुत सुकून मिलता है!’
शिल्पी के कथन पर मैंने एक बात जोड़ी, ‘शिल्पी बेटे, जयपुर से उदयपुर हवाई सफर का विकल्प भी तो है न?’
‘देट्स राइट पापा।’ शिल्पी ने चहकते हुए कहा।
मैंने गंभीरता से एक बात और कही, ‘आदमी सर्विस में शिखर पर पहुँच कर यदि अपनी जड़ों को ही भूल जाए तो इसे मैं उचित नहीं मानता बेटी। हमारा यह कर्त्तव्य भी तो बनता है न कि हम सेवानिवृत्ति के बाद अपने मूल स्थान पर लौटकर जो जिंदगी भर कमाया, उसका एक भाग मातृभूमि का ऋण चुका कर अदा करें। साथ ही अपने लोगों के जीवन स्तर को सुधारने पर भी खर्च करें जिनको आज हमारी जरूरत है। और सुनो बेटे, जीवन की सारी कमाई जयपुर में महंगी जमीन और उस पर कंक्रीट की इमारत बनाने में खर्च कर भी देता तो न तो हमें सुकून मिलता और न यहाँ के लोगों को!’
‘यू आर राइट पापा…मुझे बहुत गर्व है आप पर!’ शिल्पी फिर चहकी।
शाम घिर आई थी। पक्षियों के झुंड के झुंड अपने रैन बसेरों में हरे-भरे वृक्षों की ओर लौटने लगे थे।
कोयल की कूक भी अगली सुबह तक के लिए लगभग बंद हो गई थी।