भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, भरा-भरा गोल चेहरा, कानों में कोंडा गांव के बाजार से खरीदा हुआ खिलवां, बालों को तरतीब से कोर कर बाजार से खरीदा हुआ झब्बा मिलाकर बनाया गया बड़ा सा खोपा ———–तथा खोपा के एक ओर पिसवाँ चाँदी के किलिप ————। रंग-बिरंगे गुंथे हुए फीतों (रिबन) का गजरा,——— उसकी सुन्दरता को द्विगुणित करने वाले माथे पर मोतियों की माला—— इन सबके ऊपर जो है वह है अद्वितीय सुन्दरता का प्रतीक ठोड़ी के बीचों-बीच बड़ा सा गुदना————गले में रुपयों की माला———- तो यह था उसका रूप लावण्य जिसे देख कर बरबस ही लोगों का ध्यान उसकी ओर आकृष्ट हो जाता था यदि कोई घोटुल का गीत गाती, गुनगुनाती तो राह चलते लोगों के कदम उसकी आवाज सुनकर बरबस थम जाते कंठ इतना मधुर था। कोंडा गांव के निकट ही नदी किनारे के एक गाँव में बसने वाली इस वन सुंदरी का नाम था सोमारी बाई। बस्तर बाला होने के नाते खुले वातावरण में पली-बढ़ी हिरनी-सी कुलांचे भरती फिरती थी वह जंगलों में। ऐसा लगता मानो ईश्वर ने सारा सौन्दर्य एक ही इंसान के अन्दर भर दिया हो। इसके अलावा उसकी लगन, मेहनत, जीवन में कुछ करने का जज्बा जुनून देखते ही बनता था।
बात उन दिनों की है जब लोगों के घरों में टेलीफोन भी नहीं हुआ करते थे मोबाईल तो दूर की बात थी वह आँगन बाड़ी की बहनजी के यहाँ चपरासी का काम करती थी। जिसमें बच्चों को नहलाना-धुलाना, साफ-सफाई का काम तथा दलिया बनाकर बच्चों को खिलाना, थोडा व्यायाम फिसलपट्टी में फिसलते बच्चों की देखभाल, समय होने के बाद उन्हें वापस घर तक पहुंचाना यह सब काम था उसका ——–सब काम करे हुए भी — जब बच्चे अनार के अ सीखते तो वह भी मन लगाकर उनके साथ ही ध्यान से सीखने का प्रयास करती। इसी के फलस्वरूप वह कब वर्णमाला सीख गई उसे खुद ही पता नहीं चला। बहनजी ने जब उसकी ललक को देखा तो वे भी उसे बच्चों के साथ-साथ ही सिखाने लगी।
जब वह आँगनबाड़ी के बहनजी को देखती तो सोचती की काश वह भी पढ़ी-लिखी होती तो बहन जी की ही तरह बच्चों को पढ़ाती—- खेलकूद सिखाती, कविता कहानियां सुनाती —–परन्तु उसका यह सपना तो सपना ही है क्योंकि वह पढ़ी-लिखी नहीं है और अब तो वह बड़ी हो चुकी है — तो भला हो बहनजी का जिसके कारण थोड़ा बहुत लिखना-पढ़ना, बच्चों द्वारा गाए जाने वाली कविताएँ—-कहानी सब कुछ सीख चुकी है।
आज जब वह बडी हो चकी है तो भी उसे स्कली बच्चों के साथ रहना,—– उनकी मीठी-मीठी बातें,—– उनका रोना—-हंसना सब बहुत भाता। किन्तु सबके नसीब में यह सब कहाँ अब तो वह बड़ी हो चुकी है। आज उसके गाँव में प्रायमरी स्कूल है पांचवीं तक की पढ़ाई होती है। अगर यही स्कूल उसके बचपन में खुला होता तो शायद वह भी कम से कम प्रायमरी तक तो पढ़ लिख लेती। फिर खुद ही से कहती खैर कोई बात नहीं मुझे बहनजी ने अक्षर का ज्ञान तो करा ही दिया है अब मैं अपना नाम भी बिना किसी की सहायता के लिख लेती हूँ फिर मुझे किस बात की चिंता। इसी तरह वह अपने आप को सांत्वना देती।
शाम को जब वह घोटुल गुड़ी जाती तो अपने साथियों को अपनी शिक्षा के बारे में बताती। अपनी सखियों को वहीं गोबर लिपे जमीन में बहनजी से मांग कर लाये हुए चाक के टुकड़ों से अ आ लिखना पढ़ना सिखाती। उसकी सखियाँ भी उसके साथ ही साथ अक्षर ज्ञान सीख रही थीं।
तभी उसके जीवन में कुछ परिवर्तन होने लगा। कहाँ गाँव की अल्हड बाला, जहां घोटुल गुड़ी में ही उनके रिश्ते तय होते हैं। पसंद नापसंद तय होता है उसके जीवन ने करवट बदल ली थी मन के कोने में किसी और के पदचाप की आहट आने लगी थी और यह भी कि वह धीरे-धीरे उसकी ओर खिंची चली जा रही है। दरअसल हुआ यूँ कि शहर से एक नया शिक्षक आया था उनके गाँव में। गाँव आकर उसने बहनजी के पति से अपना मेलजोल बढाया क्योंकि गाँव में कुछ लोग ही पढ़े-लिखे दीखते थे और हर कोई अपने बराबर का आदमी चाहता है बातचीत करने के लिए। बहनजी के पति भी दूसरे गाँव में स्कूल में मास्टर थे रोज साइकिल से स्कूल आना-जाना करते थे वहीं बहनजी के घर पर ही उसकी मुलाकात नए गुरुजी से हुई थी। गुरुजी भी उसे देखकर अवाक् रह गया था। उसकी सुंदरता पर मोहित हो गया था।
देखते ही देखते जान पहचान बढ़ी, यह भी कि वो भी उसे पसंद करने लगा था। दोनों ओर से जब प्यार के अंकुर फूटने लगे तो कल्पनाएँ पगडंडियों में दौड़ने लगीं,———खेतों में उड़ान भरने लगीं,———-हवा से बातें करने लगीं, ख्वाबों के उड़न खटोले में वह उसे झुलाने लगा। उसे भी ख्वाब देखने में आनंद आने लगा था——-। कहते हैं कि प्यार छुपाने से छुपता नहीं, सच ही था। बहनजी ने भी परख लिया था दोनों के बीच के आकर्षण को। उसने मना करने की कोशिश भी की मगर सोमारी भला कहाँ समझती उसकी आँखों में प्यार का नशा जो छाया था।
गाँव की अल्हड़ वन बाला का ख्वाब तो तब टूटा जब गर्मियों की छुट्टी खतम होने के बाद जुलाई के महीने में स्कूल के खुलते ही गुरुजी सपत्नी गाँव पधारे। दो महीने का इंतजार दु:ख में बदल गया निश्छल हंसी, अल्हड़पन, भोलापन का स्थान मायूसी और मौन ने ले लिया।
एक दिन उसने मौका मिलते ही गुरुजी से छलावे के बारे में पूछ ही लिया। तब उसने भी बड़ी ही चतुराई और उपेक्षा के भाव से कहा —तुम ठहरी गाँव की अनपढ़-गंवार लड़की न बातचीत का सलीका और ना ही ढंग से कपड़े पहनना, न भोजन बनाने का सलीका। सुनकर अवाक रह गई वह —जो व्यक्ति हर वक्त उसके रूप-लावण्य की तारीफ करते नहीं अघाता था, उसकी वेशभूषा, उसका श्रृंगार, उसका अटक-अटक कर हिंदी बोलना बस तारीफ, तारीफ और तारीफ—-और आज कह रहा है वह अनपढ़-गंवार है —।
इधर कुछ दिनों से बहनजी देख रही थी कि जब से गर्मियों की छुट्टियाँ समाप्त कर गुरुजी वापस आया है सोमारी हर वक्त गुमसुम-गुमसुम सी रहने लगी है उसकी खिलखिलाहट, उसकी मासूम सी मुस्कराहट न जाने कहाँ खो गई है, जंगल की ना जो हर वक्त अपने मधुर स्वर से जंगल के वातावरण को गुंजायमान करते रहती थी अब खामोश हो गई है। गुमसुम-गुमसुम सी अपने आप में ही खोने लगी है—काम में भी इसका मन नहीं लगता —तब बहनजी ने कुछ निर्णय लिया और एक दिन उसे अपने पास बिठाकर प्यार से उसका मन टटोला तो वह रोने लगी और सब हाल विस्तार से बताया —बहनजी ने उसे रोने दिया टोका नहीं ताकि उसका मन हल्का हो जाए —।
❖ फिर धीरे से पूछा बहनजी ने —-अब! अब क्या करोगी तुम सोमारी।
❖ तब सोमारी ने कहा- —- क्या करूँगी, जैसा जीवन चल रहा था पहले वैसा ही चलाऊँगी।
❖ बहनजी—-और शादी?
❖ सोमारी —–न बाबा ना अभी तो इतना बडा जबरदस्त झटका मिला है और फिर से वही —–नहीं नहीं अब यह सब मुझसे नहीं होगा।
❖ बहनजी —-तो फिर मेरी बातों को गौर से सुनो जो मैं कह रही हूँ उसे ध्यान से सुनो सोमारी।
❖ सोमारी——हाँ बहनजी बताइये न —।
❖ बहनजी—— देखो तुम मेरे यहाँ काम करते-करते बहुत कुछ अक्षर ज्ञान सीख गई हो तो सरकार ने तुम जैसे बड़े उम्र के लोगों के लिए जो पढ़े लिखे नहीं हैं, प्रौढ़ कक्षा शुरू किया है तुम उस क्लास में जाना शुरू करो और बाद में परीक्षा भी दे देना।
सोमारी —हकलाने लगी और बोली अभी इस उम्र में पढने जाऊँगी लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे मेरी हंसी नहीं उड़ायेंगे।
बहनजी —क्यों? क्यों हंसी उड़ायेंगे। तुम्हारे जैसे बड़ी उम्र के लोगों के लिए ही तो यह कक्षा शुरू किया गया है बल्कि तुमको तो खुद जाना चाहिए और अपनी सखियों को भी लेकर जाना चाहिए।
बहनजी के बार-बार समझाने पर वह पढने के लिए राजी हो गई। पहले प्रौढ़ क्लास जाती फिर घोटुल गुड़ी जाकर उसी पढ़े हुए को दुहराती इस तरह वह बहुत जल्दी सीखने लगी। अक्षर ज्ञान तो उसे पहले से था ही,तब बहनजी के प्रयास से वह पांचवी की परीक्षा में बैठी और पास भी हो गई इस बीच उसके घरवालों ने उस पर शादी का दबाव डाला तो उसने किसी तरह बहनजी के माध्यम से ही उन्हें मनाया और देखते-देखते वह कुछ सालों में आठवीं की परीक्षा भी पास हो गई शिक्षित होने की इच्छा शक्ति ने, चाह ने उसे आत्मविश्वास से भर दिया था। गांवों ने विस्तार किया कस्बा नगर का रूप लेने लगे, —-इस बीच गाँव-गाँव में आँगन बाड़ी खोलने के लिए आदेश आया तो बहनजी ने कागजी कारवाई की और उसकी नियुक्ति हो गई फिर क्या कहना था उस दिन वह पहली बार पुरानी वाली सोमारी हो गई थी वह चहकने लगी थी।
इस तरह वह अपनी दृढ इच्छा शक्ति, लगन, परिश्रम से आसपास के लोगों के प्रोत्साहन से, आंगनबाड़ी की आया बाई से आंगनबाड़ी की बहनजी हो गई थी। आज वह अनपढ़ नहीं है अब वह भी छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षित करेगी।
वह आज एहसान मानने लगी थी गुरुजी का, जिसकी उपेक्षा से जिसके द्वारा ठुकराए जाने की वजह से वह इस मुकाम पर पहुंची है अन्यथा आज भी वह आया बाई ही बनी रहती। अब वह अपनी शिक्षा से, अपने अक्षर ज्ञान से और सगी बहन से भी ज्यादा अपनों की तरह साथ देने वाली बहनजी के सद्प्रयास से अपने पैरों पे खड़ी थी उसने खुद को अक्षर के लिए समर्पित कर दिया था और उस जैसी गाँव की अन्य बालिकाओं को भी प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से उज्जवल और सुखद भविष्य के लिए ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने लगी थी। सोमारी अब अक्षर की हो गई थी। उसका चेहरा एक नई आभा से प्रकाशवान हो दमकने लगा था।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
