एहसान-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Aihsaan

Hindi Kahani: अरे यह क्या कर लिया आपने? कैसे इतना बड़ा चोट लग गया?”अपने पति को खून से लथपथ देखकर रैना लगभग चीखती हुई बोली।
“क्या बताएं …रैना…बड़ी ही बुरी किस्मत थी..।
हम सामान लेकर आ रहे थे पीछे से एक बाइक ने धक्का दे दिया!
हम सड़क पर ही गिर पड़े.. पत्थर से चोट लग गया…! देखो पुराना गुर्रा फूट गया… अब उसमें से खून निकल रहा है …!”
कराहते हुए मोहनलाल ने कहा।
“फिर यहां तक कैसे आए?”रैना घबराहट से हांफते हुए बोली।
“बड़ी मुश्किल से खड़े हो पाए… दो बार तो बेहोश होते बचे हैं…किसी ने सहारा दे दिया… !यहां तक छोड़ गया…!”
“शुक्रिया भगवान का !”
“रैना पानी पिला दो।चक्कर आ रहा है…!”
“मुक्ता,जरा पानी लेकर आना तो…!
अपने पिताजी को पानी पिला… !अलका जरा पानी गर्म कर उसमें डिटॉल डाल और रुई लेकर आ जरा…! उनके घाव को साफ करना है …!”
पानी पीकर कराहते हुए मोहनलाल अपने बिस्तर पर लेट गया।
रैना जल्दी से गर्म पानी म़े रुई डालकर उसे पोछ कर साफ करने लगी।
मोहनलाल कबीर मोहल्ले का एक दर्जी था। पूरे मोहल्ले के कपड़े सिलता था। मोहल्ले वाले उससे बड़ा प्यार करते थे। उसके मिलनसार स्वभाव और कार्य कुशलता ने उसे बहुत ज्यादा लोकप्रिय बना दिया था।
बहुत दिनों से उसके पैर पर एक मवाद वाला फोड़ा बन चुका था जो आज फट गया था।
“आपको डॉक्टर को दिखाना होगा जी देखिए तो कैसे पैर सूज गया है…!”
मोहनलाल कुछ कहता इससे पहले ही बाहर से आवाज आने लगी।
बाहर से कोई “मोहनलाल…!”कहकर आवाज दे रहा था।

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“अरे प्रिया की मम्मी आप?”
“मोहनलाल है…?हम अपनी साड़ी लेने आए हैं…फॉल पिको हो गया उसमें?”
“बहनजी…उनका तो एक्सीडेंट हो गया है…!आज तो नहीं हो पाया है।”रैना रोआंसी हो गई।
“अरे ये क्या हो गया? कैसे?”
“क्या बताएं बहनजी…!मोहनलाल यह सुन कर रोने लगा…!
पड़ोस वाले शर्मा जी की बेटी प्रिया की शादी थी।
मोहनलाल ही उनकी सारी साड़ियों में फॉल पिको कर रहा था और सबके डिजाइनर ब्लाउज सिल रहा था।
अभी उसका काम अधूरा पड़ा था और यह एक्सीडेंट हो गया।
दूसरे दिन अस्पताल में दिखाने के लिए रैना उसे लेकर गई तो डॉक्टर ने उसे अस्पताल में एडमिट कर दिया।
डॉक्टर का कहना था कि पस अंदर-अंदर ही फैल रहा है।
उसका ऑपरेशन करना पड़ेगा नहीं तो पैर काटना पड़ेगा।
मोहनलाल को एक हफ्ता अस्पताल में एडमिट रहना पड़ा।
अच्छी बात थी ऑपरेशन सफल रहा लेकिन डॉक्टर ने 3 महीने तक मशीन के पास जाने तक को सख्त मना कर दिया था।
घर में कमाने वाला मोहनलाल था, उसकी रोजी-रोटी सबकुछ उसके दरजी गिरी से ही चलती थी।
शादी के सीजन चल थे और सारे कपड़े धरे थे।
वह रोते हुए कभी अपने कपड़ों के ढेर को देखता कभी अपनी दोनों बच्चियों को और कभी अपनी पत्नी रैना को।
“ रैना कैसे कटेगा हमारा दिन…! शादी का सीजन है। अभी हमारी अच्छी खासी आमदनी का सीजन था।
रैना पेटिकोट और सिंपल ब्लाउज तो सिल लेती थी, साड़ियों में फॉल भी लगा लेती थी लेकिन उसे डिजाइनर ब्लाउज और लहंगा सिलना नहीं आता था।
यह सब काम मोहनलाल ही किया करता था ।
शादी का सीजन था तो वैसे ही स्पेशल ऑर्डर उसके पास आए हुए थे।
अब रैना को सब के कपड़े लौटाने पड़ रहे थे।
यह सब देखकर उसकी आंखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।
उस पर हर हफ्ते दवाई का खर्चा, बच्चों के स्कूल के फीस,घर का राशन। वह बड़ी मुश्किल में पड़ गई थी।
मोहनलाल के पास एक महिला जेनिफर बहुत पहले से अपने कपड़े सिलवाने आया करती थी।
वह अस्पताल में काम करती थी।उसने पहले भी रैना को सेरोगेसी के बारे में बताया भी था लेकिन उस समय रैना को इन चीजों की जरुरत नहीं थी।
एक दिन रैना अकेली ही अपने पति की दुकान पर कपड़े सिल रही थी तभी जेनिफर वहां आई।
उसने रैना से उसकी सारी कहानी सुन कर दबी जुबान से कहा
“रैना बहन,मेरी बातों को गलत अर्थ में मत लेना।
तुम्हारी दो दो बच्चियाँ हैं।अब बीमार और अपाहिज पति भी।
सबको देखना तुम्हारा ही काम है।
तुम मेरी बात मान लो…।सेरोगेट मदर बन जाओ।
बस अपनी कोख किराया पर ही तो देना होता है और फिर इसके लिए पैसे भी तो मिलेंगे.. वह भी इतने कि…सोच भी नहीं सकती हो।”
रैना मुसीबत में थी। जेनिफर की बातें रैना को भा गईं।
कुछ महीनों से एक सिन्हा दंपति आकर कबीर मुहल्ले में रह रहे थे।
बहुत ही अच्छे भले मानस थे। उनकी पत्नी का नाम मानसी था।
शादी के बहुत सालों के बाद भी वह मां नहीं बन पा रही थी।
कमी उनके भीतर ही थी इसलिए डॉक्टरों ने उन्हें आईवीएफ पद्धति या फिर सरोगेसी से बच्चा करने के लिए बताया था।
आईवीएफ उस शहर में उतना पॉपुलर नहीं था।
सेरोगेट मदर की खोज में मानसी डॉक्टरों के चक्कर लगा रही थी।
तभी एक दिन डॉक्टर ने एक खुशखबरी उसे दिया कि एक किराए का कोख मिल गया है।
“अब मैं मां बन सकती हूं…!” मानसी जी की खुशी का ठिकाना नहीं था।
आमतौर पर सेरोगेसी का नियम होता है कि ग्राहक और सेरोगेट मदर दोनों को ही एक दूसरे की जानकारी नहीं होती है लेकिन मानसी एक रसूखदार महिला थी और दिल की साफ भी।
उसने पता कर लिया कि उसके बच्चे की मां है कौन?
वह जाकर रैना से पर्सनली मिलकर भी आईं।
नौ महीने बाद एक नॉर्मल डिलीवरी के बाद रैना ने अपने कोखजाए अस्पताल को सौंप आई।
जिसके बदले में उसे एक अच्छा खासी रकम मिली।
रैना को लगभग ढाई लाख रुपए मिले थे।
“सचमुच जेनिफर सही कह रही थी। इस दुनिया में सब कुछ संभव है…! मैंने अपना कोख किराए पर दे दिया…. अब मैं अपनी किस्मत बदल सकती हूं।”

रैना ने उसे मोहल्ले को छोड़ दिया।अपने पति का बढ़िया इलाज कराया और दोनों बच्चियों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने लगी।
मोहनलाल और रैना दोनों ने मिलकर एक अच्छा बुटीक और सिलाई सेंटर खोल लिया था।
दोनों मिलकर चला रहे थे अब कोई यह नहीं कर सकता था कि कभी वे दोनों इतने गरीब थे।
देखते ही देखते समय बीत गया।रैना और मोहनलाल की दोनों बच्चियाँ शादी के बाद अपने घर चली गईं।
रैना अकेले रहकर अपनी उस बच्ची के बारे में सोच कर अपनी आंखें पोंछ लिया करती थी। मां थी तो मातृत्व से प्रेम तो रहेगा ही…!
और फिर वह कोई प्रोफेशनल सेरोगेट मदर तो नहीं थी।
मगर यह बच्ची दुनिया में आकर उसे लखपति बना गई थी। मगर यह भी सच था कि अपने ही पेट में पल रहे बच्चे का सौदा उसने किया था.. यह उसे अकेले रहते हुए कचोटता था।
अपने बच्चियों से उसने झूठ बोला था कि उसके पेट का बच्चा मर चुका है इसलिए अस्पताल वालों ने उसे लाने नहीं दिया लेकिन मोहनलाल को सब कुछ पता था।
एक दिन रैना अखबार खोलकर पलट रही थी… और उसका मुख्य पृष्ठ देखते ही चौंक गई।
उसने मोहनलाल से कहा
“यह तो मानसी सिंहा जी है ना और उनके पति विकास सिंहा?”
“ क्या हुआ?” मोहनलाल चाय पीता हुआ बोला।
“ देखिए ना उनकी बच्ची यूपीएससी की परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल की है। उन लोगों की फोटो छपी है।”
मोहनलाल ने उचटती नजरों से देखा फिर कहा
“ हो सकता है पर याद नहीं आ रहा !”यह कह कर वह वहां से उठकर नहाने चला गया।
रैना अख़बार लेकर बैठी रही। उसने मानसी को पहचान लिया और उसके साथ उससे चिपकी हुई गोरी चिट्टी सी लड़की को देखकर उसने पहचान लिया..।
“यह तो मेरी बच्ची है…!” उसने अपने आप से कहा।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
“ यह तो मेरी अपनी बच्ची है… उसका नाम मानसी जी ने क्या रखा है प्रीति…!”
बिल्कुल नाम की अनुरूप है मेरी बच्ची कितनी सुंदर है…!
देखो कैसे अखबार वालों ने लिखा है…इंजीनियर विकास सिंहा और मानसी सिंहा की इकलौती बेटी प्रीति सिंहा ने भारत का सम्मान बढ़ाया…भारतीय प्रशासनिक परीक्षा में प्रथम स्थान लाकर…!”
तभी मोहनलाल ने अंदर से आवाज दिया “रैना मुझे दुकान के लिए निकलना है। जल्दी से नाश्ता बना दो।”
“ हां जी अभी!” थके हारे कदमों से रैना उठकर रसोई की तरफ बढ़ चली।
उसने अपने हाथों को सिर पर मारकर कहा “नहीं नहीं वह मेरी बेटी नहीं है…! वह मेरी बेटी कैसे हो सकती है… कोई अपनी बच्ची को बेच सकता है क्या?
मैंने तो अपने कोख को ही बेच दिया था ना…पैसों के लिए…!
मैं यह नहीं भूल सकती…!” अपने आंसू पोंछकर रैना अपने कामों में लग गई।