शिखा की तस्वीर आज के अखबार में देख कर मेरी आँखों में एक अनोखी सी चमक आ गयी थी और गहरे संतोष से मेरा अंतर्मन खिल उठा था। शिखा ने पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया था । इतना ही नहीं मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी उसका स्थान पचास के आस पास था। अखिल भारतीय इंजीनीयरिंग प्रवेश परीक्षा में भी उसका रैंक चार सौ के आस पास था। अब तो पूरी तरह से तय था की वह जिस ब्रांच को भी चुनना चाहे उसे अपने  मन चाहे कालेज़ में प्रवेश निश्चित रूप से मिल सकता था ।
शिखा का जन्म  एक साधारण से परिवार में हुआ था। चार भाई -बहनों में वह सबसे बड़ी थी। पिता एक ऑटो चालक थे और माँ साधारण ग्रहणी थी और  ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी ।
शिखा शुरू से ही हर कार्य में बहुत कुशल थी। तीक्ष्ण बुद्धि होने के कारण सदैव कक्षा में प्रथम आती थी। यही कारण था की वह अपने शिक्षकों में काफी प्रिय थी और उनसे बच्चों की तरह ज़िद भी कर लेती थी ।
एक दोपहर शिखा विद्यालय से घर लौटी ही थी कि उनके पड़ोस वाली आंटी हांफते हुए उनके घर आई और माँ से बोली ‘अभी अभी अस्पताल से किसी का फोन आया है कि भाई साहब का एक्सीडेंट हो गया है और वह बुरी तरह से घायल हो गये हैं।’ यह सुन कर शिखा ने अपना स्कूल का बैग  रखा और माँ के साथ अस्पताल के लिए चल दी। वहाँ पहुँच कर पिताजी को खून में लथपथ बेहोशी की हालत में पड़ा देख उसका तो दिल ही बैठ गया । माँ अपने आप को संभाल न पाईं और रोने लगी । यह सब देख वहाँ खड़े लोग भी इक्कठा हो गये और ढाढस  बंधाने लगे। पास ही वह सज्जन भी खड़े थे जिन्होंने घर फोन किया था। शिखा ने उनका धन्यवाद किया और डाक्टर साहब से मिलने के लिए चल पड़ी। 
 
डाक्टर साहब ने बताया की सिर पर चोट लगने के कारण उसके पिताजी  बेहोश हैं. जब तक होश नहीं आ जाता तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता। तीन दिन बीत गये पर पिताजी को न तो होश आया और न उन्होंने आँख हीं खोली। दिन भर की थकी मांदी शिखा बिस्तर की टेक लगा कर शायद सो गयी थी कि अचानक किसी के कराहने की आवाज़ सुन उसकी आँख खुल गयी ।
 
पिताजी दर्द से कराह रहे थे और फटी निगाहों से शून्य में ताक रहे थे । वह झट पट डाक्टर साहब को बुलाने के लिए दौड़ी , डाक्टर साहब ने परीक्षण करने के पश्चात बताया की सिर पर चोट लगने के कारण वह अभी पहचान नहीं पा रहे.।समय के साथ साथ उनकी यादाश्त वापस आ जाएगी। शिखा के कंधे पर हाथ रख बड़े प्यार से उसे समझाया कि  अब घबराने की आवश्यकता नहीं है।
सात दिन बाद पिताजी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई और वे घर आ गये।
घर में कमाने वाला कोई न था । पिताजी की बीमारी का खर्चा, बहन भाईओं की पढ़ाई, घर का खर्चा – अनेक सवाल मुँह बाय खड़े थे । माँ का सारा समय पिताजी की देख भाल में बीतता । परिवार का सारा भार शिखा के मासूम कंधों पर आ पड़ा था ।
 
 
 
 
 
 
सुबह उठ वह स्कूल जाती । बोर्ड की परीक्षा सिर पर थी  अपनी प्रतिभा के कारण वह पहले ही सबकी स्नेह पात्र तो थी ही , अब सभी उसका और अधिक ध्यान रखने लगे। 
 
वह घर आ कर दो घंटे पड़ोस के छोटे बच्चों को ट्युशन पढाती , अपना होमवर्क करके कुछ घर के काम निपटा कर अपनी कोचिंग क्लास के लिए निकल जाती ।पाँच से सात तक कोचिंग क्लास होती। फिर वह घर आ कर कुछ समय पिताजी के पास बैठ उनसे बातचीत करती और दिन  भर की हर बात उन्हें  बताती। अब उनकी तबीयत में भी सुधार आ रहा था। वह अपनी बेटी की समझदारी और हिम्मत देख फूले न समाते थे।  
 
खाना खाने के बाद वह फिर पढ़ने बैठ जाती । पढ़ते पढ़ते न जाने कब  सो जाती उसे पता ही न चलता। माँ की आवाज़ सुन सुबह उसकी आँख खुलती । फिर वह अपनी दिन चर्या में व्यस्त हो जाती । पिताजी के स्वास्थ में भी अब सुधार हो रहा था । वह अब धीरे धीरे सब पहचानने लगे थे। माँ भी कुछ सिलाई   का कार्य कर लेती थी । सब कुछ धीरे धीरे सामन्य होने लगा था। 
 
शिखा के मन में बस एक ही लगन थी कि मुझे भी डाक्टर बन सबकी सेवा करनी है । जब द्रढ निश्चय हो तो क्या असंभव है। उसे तो दिन  रात एक ही धुन थी मुझे डाक्टर बनना है। जैसे जैसे परीक्षा  पास आ रही थी उसका सरा ध्यान अपने सपने को सार्थक करने में लग गया था। आखिर उसकी मेहनत रंग लाई  और परिणाम सबके सामने था । उसने  अपने सपनों को साकार कर लिया था और न केवल अपना अपितु अपने स्कूल, जिले का नाम  भी रौशन किया था । उसकी  कर्तव्य निष्ठा ने अपना असर दिखाया और उसने अपने सपनों को साकार कर लिया उसका  परिवार ऐसी बेटी पा कर धन्य हो गया था। 
 
ऐसी बेटी पा कर तो ह्रर माँ-बाप कह उठता है: 
बेटी तू है घर की पेटी 
कहते हैं तुझे ही लक्ष्मी 
पूजें  तुझे कह कर धरती ।
 
अपने को समर्थ तू कर ले 
अपने अंदर गुण सब भर ले 
तेरे इस समर्थ रूप के आगे
नतमस्तक हों जाएँ सारे आ के । 
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