पुलिस अजय के पास आई। अजय रूमाल द्वारा अपने होंठ पोंछ रहा था। उसके होंठों से रक्त निकल आया था। इंस्पेक्टर ने अजय से पूछा, ‘ये कौन लोग थे? और झगड़ा क्यों हो रहा था?’

अजय ने एक पल सोचा- वह चन्दानी तथा उसके बारे में जो कुछ भी जानता है, इंस्पेक्टर को बता दे, परंतु फिर वह चुप हो गया। वह स्वयं भी तो उसी गैंग का एक सदस्य रह चुका है। उसे कम सजा नहीं होगी। चन्दानी के पास उसके अपराध के प्रमाण हैं। वह एक साधारण अपराधी नहीं है। अपनी चालाकी द्वारा उसने अपने व्यक्तियों को एक और ढंग से बांध रखा है। उसकी तथा उसके व्यक्तियों के मध्य जो विशेष तथा बड़े अपराध के वार्तालाप होते हैं, उसे वह टेप कर लिया करता है, इसीलिए यदि उसके किसी व्यक्ति को गलती से उसके गुप्त अड्डे का पता चल भी गया तो उसका भेद खोलने के लिए उसे सोचना पड़ेगा कि गिरोह के साथ वह भी पकड़ा जाएगा।

‘आप कुछ सोच रहे हैं।’ इंस्पेक्टर ने अपनी हथेली पर दूसरे हाथ द्वारा छोटे डंडे का हंटर हल्के-हल्के मारते हुए पूछा- बहुत भेद भरे भाव में।

‘जी हां,‘ अजय ने तुरंत बात बनाई! बोला, ‘उन गुंडों में से एक को मैं पहचानने का प्रयत्न कर रहा था। मैंने उसे कहीं देखा है।’

‘देखा है! कहां?’ इंस्पेक्टर ने उत्सुक होकर पूछा।

‘यही तो याद करने का प्रयत्न कर रहा था।’

इंस्पेक्टर ने एक पल सोचा। फिर पूछा, ‘इस झगड़े की जड़ क्या थी?’

‘जाने कौन शरीफ लड़की थी, जिसे वे छेड़ रहे थे। मुझसे देखा नहीं गया। लड़की का पक्ष लिया तो बात बढ़ गई।’

‘लड़की कहां है?’ इंस्पेक्टर ने इधर-उधर देखा।

‘चली गई।’

‘चली गई?’

‘हां।’ अजय ने कहा, ‘कौन लड़की लड़ाई-झगड़े तथा उसके बाद पुलिस केस में फंसकर कचहरी दौड़ना पसंद करेगी? लड़की की इज्जत बहुत कोमल होती है इंस्पेक्टर साहब।’

इंस्पेक्टर ने एक पल सोचा। केस में कोई दम नहीं है। उसने कहा, ‘यदि उनमें से आपको किसी भी व्यक्ति की पहचान तथा उसका ठिकाना याद आ जाए और आप आवश्यक समझें तो इस हलके की चौकी पर आकर रिपोर्ट लिखा सकते हैं।’

‘धन्यवाद।’ अजय बात बनाते-बनाते थक चुका था। उसने चैन की सांस ली।

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