‘नहीं, बस यूं ही पूछ लिया।’ उसने भी करवट लेते हुए एक आह भरी। फिर सोचा, लखनऊ से रामगढ़ है ही कितनी दूर? उसे आज ही निकल जाना चाहिए। इसी समय, बहुत चुपके से, फिर देखा जाएगा जो होगा। राधा से उसे तुरंत ही मिलना चाहिए। छुट्टी देने वाला डॉक्टर तो अब सुबह आएगा। मालूम नहीं ऐसी अवस्था में वह उसे छुट्टी देना भी पसंद करे या नहीं? कौन उसकी वास्तविकता पर विश्वास करेगा कि यह राजा विजयभान सिंह हैं? उसकी ख़ामोशी तथा उकता देने वाली जिंदगी ने उसे पहले ही सबके सामने पागल बना रखा है। नौकर-चाकर उसे पागल ही तो समझते हैं। उसकी हकीकत की जांच-पड़ताल होते-होते तो देर हो जाएगी।

ऐसी अवस्था में जब वह अपने आपको स्वयं ही पहचानने में देर करता है तो यहां का डॉक्टर उसकी बातों पर भला क्यों विश्वास करेगा? वह अधिक देर नहीं रुक सकता। जीवन की केवल कुछ ही सांसें तो शेष रह गई हैं, उसे राधा से तुरंत ही मिलना चाहिए। उसकी बांहों में उसका दम निकल जाए, बस यही उसके लिए बहुत है। जीते जी उसके पापों का प्रायश्चित तो हो जाएगा। राधा से मिलने के लिए उसकी बांहें फड़कने लगीं। धड़कन तेज हो गई। सब्र का दामन छूटने लगा। उसने दीवार पर टंगी घड़ी देखी। रात के आठ बज चुके थे।

पहाड़ी इलाके में यूं भी रात जल्द ही घनी हो जाती है। सारे रोगी सो रहे थे। गहरी-गहरी सांसों के साथ जीवन के सपनों में डूबे हुए थे। कुछ देर उसने और ख़ामोशी से सब्र किया तो उनके समीप वाला रोगी भी सपनों में पहुंच गया। उसने कमरे का निरीक्षण किया। वार्ड में कोई नर्स नहीं थी। बहुत ख़ामोशी से उठा वह। उसका पुराना गर्म ओवरकोट तथा अन्य कपड़े स्टोर रूम में बंद थे। उसके तन पर इस समय केवल अस्पताल के ही साधारण कपड़े थे। ठंड सख्त थी इसलिए उसने अस्पताल का ही कंबल लपेट लिया। दबे पगों जब वह अस्पताल से बाहर निकला तो ठंडी हवाएं सुई की नोक लिए उसके शरीर को छेदने लगीं। फिर भी उसने रुकना उचित नहीं समझा। एक पल भी देर कर देने से जीवन उसे धोख़ा दे सकता था।

बादलों पर मोटी-मोटी परतें उस समय दिखाई पड़ जाती थीं, जब बिजली की कौंध तड़पकर फैल जाती। तब दूर-दूर की पहाड़ियां भी चमक उठती थीं। अपने को संभालकर वह स्टेशन की ओर हो लिया, परंतु रास्ते में वर्षा की तूफानी झड़ी उसके ऊपर छा गई। उसका शरीर ठंड से ठिठुरने लगा। पहाड़ी इलाके की वर्षा यूं भी बहुत भयानक होती है परंतु वह तब भी बढ़ता ही गया, गिरता-पड़ता, संभलता हुआ। राधा की बांहों में वह जल्द-से-जल्द अपने आपको गिरा देना चाहता था। ऐसा लगता था मानो उसके जीवन के दिन पूरे हो चुके हैं। केवल एक ही सांस चल रही है, प्यार की धड़कन के सहारे, बहुत तेजी के साथ। शायद कुछ देर के बाद यह भी उसका साथ छोड़ दे।

 जब स्टेशन पहुंचा तो उसके शरीर की कंपकंपी ज्वर बनकर उस पर छा चुकी थी। अपने आपको भीगे कंबल में लपेटकर वह गाड़ी के एक तीसरे दर्जे के डिब्बे में बैठ गया।

 गाड़ी चली तो उसके शरीर की कंपकंपी और बढ़ गई। उसके दांत किटकिटाने लगे। उसे सख्त खांसी का दौरा पड़ गया, तो कम्पार्टमेंट में बैठे व्यक्तियों ने उसे बहुत घृणा के साथ देखा और अपने नथुनों पर कपड़े रख लिए। खांसी के साथ उसके होंठों से निकले ख़ून के धब्बे कम्पार्टमेंट की दीवार पर बह चले थे।

 ‘तुमको तपेदिक है क्या?’ एक यात्री ने उसे देखकर क्रोध से पूछा।

 उसने बड़ी कठिनाई से ‘हां’ के इशारे पर सिर हिला दिया। अपनी दुर्दशा पर उसकी आंखें छलक आईं।

 ‘राम-राम-राम।’ एक बूढ़े ने अपना बिचका हुआ मुंह और बिचकाकर कहा, ‘तुमको क्या इसी डिब्बे में बैठना था? अगले स्टेशन पर उतरकर दूसरे डिब्बे में चले जाना।’

 ‘शटअप।’ वह बहुत ज़ोर से चीख़ा, इस प्रकार कि वह बूढ़ा ही नहीं… दूसरे यात्री भी चौंक पड़े। सभी ने उसे बहुत घूरकर देखा, बहुत आश्चर्य के साथ। बूढ़ा बाबा उन्हें बहुत ढीट मालूम पड़ा। वे चुप हो गए। उसके समीप से हट गए तो वह वहीं पैर फैलाकर लेट गया।

 जब गाड़ी लखनऊ स्टेशन पर रुकी तो रात के दो बज रहे थे। भारत के स्वतंत्रता दिवस को आरंभ हुए दो घंटे बीत चुके थे, परंतु प्रसन्नता की लहर कहीं भी करवट नहीं ले रही थी। उनके जन्म दिवस को आरंभ हुए भी दो घंटे बीत चुके थे। आज 15 अगस्त है। शायद वह उसका अंतिम दिवस है‒अंतिम घड़ी है। फिर भी वह साहस नहीं छोड़ना चाहता था। राधा की बांहों में जल्द-से-जल्द वह पहुंच जाना चाहता था। उसके बाद उसके प्राण जब चाहे निकल जाएं। लड़खड़ाते पगों से वह प्लेटफार्म पर उतरा तो बरसात के कारण भरपूर वर्षा हो रही थी। यद्यपि यह पहाड़ी इलाका नहीं था, ठंड नाममात्र को भी नहीं थी, फिर भी ज्वर के कारण उसका शरीर ठिठुर रहा था, कम्पार्टमेंट में बंद रहने के कारण कंबल काफी सूख चुका था, इसलिए उसने अपने शरीर पर ठीक से लपेट लिया और बाहर निकल गया। वर्षा की दीवार पार करके वह टैक्सी वालों के समीप पहुंचा। सभी अपनी कार के शीशे चढ़ाकर रात के समय सो रहे थे। उसने एक टैक्सी के शीशे पर ज़ोर से थपकी दी। ड्राइवर की आंख खुली तो यात्री की आशा में बैठते हुए उसने दरवाजे का शीशा कुछ नीचे किया।

 ‘रामगढ़ ले चलो भइया।’ उसने विनती की।

 ‘अभी।’ ड्राइवर ने उसकी अवस्था को गौर से देखा।

 ‘हां।’ अपनी सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए उसने उत्तर दिया।

 ‘लेकिन अभी तो वर्षा के कारण वहां का रास्ता बहुत ख़राब हो गया। उस तरफ़ रात में चलना भी ख़तरे से खाली नहीं है।’

 ‘तुमको जितने भी पैसे चाहिए मैं वहां पहुंचते ही दे दूंगा।’ उसने उसके आगे फिर विनती की, ‘बस मुझे वहां की हवेली तक पहुंचा दो।’

 ‘हवेली?’

 ‘हां, मैं राजा विजयभान सिंह हूं।’

 ‘राजा विजयभान सिंह?’ ड्राइवर ने इस बार उसे और भी गौर से देखा, झांकने का प्रयत्न करते हुए, ऊपर से नीचे तकं फिर एक बहुत ज़ोरदार ठहाका लगाया‒ ‘हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा।’ राजा विजयभान सिंह? हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा।’ फिर वह गंभीर होकर उस पर क्रोधित हुआ, ‘चल भाग यहां से। कम्बख्त ने नींद हराम कर दी। पागल।’

 राजा विजयभान सिंह को उस पर सख्त क्रोध आया, परंतु फिर अपनी वर्तमान स्थिति का ज्ञान करके उन्होंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। इस समय वह क्या है? इस समय? भिखारी! जिसके पास एक पैसा भी नहीं बचा। बचाया ही नहीं, इस आशा पर कि अब तो जीवन के शेष दिन सैनिटोरियम में कट ही जाएंगे। ट्रेन में भी वह बिना टिकट ही आए थे। टी.टी. कृपालु था जिसने उनकी अवस्था देखकर कुछ पूछा भी नहीं था। उन्होंने निराश होकर भागते हुए इधर-उधर देखा। दूसरे टैक्सी वाले भी वही उत्तर देंगे। वह थोड़ा आगे बढ़े।

अगणित तांगे शेड के नीचे खड़े थे और तांगे वाले इनकी गद्दियों पर लेटे गहरी नींद में डूबे हुए थे। कुछेक खाली भी थे, शायद चालाक अपनी गरीबी के कारण इस वर्षा में भी सवारी के लिए प्लेटफार्म के समीप चक्कर काट रहे थे। उन्होंने सोचा, इनसे भी सहायता मांगना मूर्खता होगी। यह भी उनका मज़ाक उड़ाएंगे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। शरीर का ज्वर बढ़ता ही जा रहा था। जोड़-जोड़ टूटकर मानो अलग हो जाना चाहता था।

यदि वह एक बार गिर पड़े तो शायद कभी नहीं उठ सकेंगे। जो कुछ भी उन्हें करना है तुरंत कर ले। समय बहुत कम है। उनके दिल में एक आशा की ज्योति चमकी। झट तांगों के झुंड में पहुंचकर उन्होंने एक किनारे वाले खाली तांगे की रस्सी खोली। इस पर सवार होकर चाबुक संभाली और सख्ती के साथ हांक लगा दी। वर्षा तेज थी, वर्षा की झड़ी तेज थी परंतु घोड़ा बाहर आते ही सरपट भागने लगा तो वह तांगे की पिछली सीट पर अर्ध लेट से गए।

रात का तीसरा पहर, हवाओं का बहाव तूफान के समान विपरीत चल रहा था कि घोड़े को पग बढ़ाने में भी कठिनाई हो रही थी। फिर भी चाबुक की मार खाते-खाते उसने शहर की सीमा पार कर ही ली। रामगढ़ को जाने वाले कच्चे रास्ते पर तांगों के पहिए अब धंस-धंस जाते थे फिर भी राजा विजयभान सिंह ने साहस नहीं छोड़ा। राधा का प्यार उनके जीवन को साहस देने में पूर्णतया सहायक था, इसलिए जहां कहीं भी तांगे के पहिए कीचड़ में फंसकर आगे बढ़ने में असमर्थ सिद्ध हुए वहां उतरकर उन्होंने स्वयं अपने कमज़ोर हाथों द्वारा उसे धकेलकर आगे बढ़ा दिया परंतु जब धीमे-धीमे ऐसा करते हुए उनकी बची-खुची ताकत भी ज़वाब दे गई तो वह तांगे की सीट पर लेट गए।

 अचानक उन्हें महसूस हुआ वह बहुत दूर चले आए हैं। वर्षा रुक गई है‒बादल खुल चुके हैं‒कहीं-कहीं तारों ने झांकना भी आरंभ कर दिया था। उन्होंने अपनी खोई ताकत फिर समेटी। आस है तो जान है, और जान है तो संसार है परंतु इतनी दूर लगातार तांगा खींचते रहने के कारण घोड़ा अपना साहस छोड़ चुका था। जब वह एक नाले के समीप से गुज़र रहा था तो अचानक ही उसके पग फिसल गए। वह गिरा और साथ में अपने ऊपर तांगा भी ले बैठा। राजा विजयभान सिंह एक ओर छिटककर गिर पड़े। तांगे का यह पहिया टूटकर दो टुकड़े हो गया। घोड़ा तांगे में ऐसा फंसा कि दुबारा नहीं उठ सका। विजयभान सिंह अपना भार संभाल नहीं सकते थे, तांगे को क्या उठाते? अपने भाग्य पर उनको रोना आ गया। आंखें छलक आईं… परंतु तभी गर्दन उठाकर उन्होंने तारों भरी धुंध से देखा वह रामगढ़ की सरहद में पहुंच चुके हैं। यह रास्ता, यह सारी जगह उनकी जानी-पहचानी थी।

कभी इन रास्तों पर मिट्टी बिछी रहती थी। यहीं से वह अपनी छह घोड़ों वाली टमटम पर सवारी के लिए निकला करते थे। यहीं से उनकी कार गर्द उड़ाती हुई जाया करती थी। और तब लोग दूर से ही देखकर उन्हें झुक-झुककर अदब से सलामी पेश करने लगते थे। जीवन की अंतिम आशा को उन्होंने फिर टूटते-टूटते संभाला। साहस बटोरा। तूफान तो पार हो चुका है, अब केवल किनारा ही बाकी है। उन्हें साहस हरगिज़ नहीं छोड़ना चाहिए। दिल पर पत्थर का बोझ डालकर उन्होंने अपनी डूबती सांसों को फिर समेटा और खड़े हो गए। कंबल शरीर पर बोझ मालूम हुआ तो उसे वहीं छोड़ दिया।

आगे बढ़े तो पग लड़खड़ाए, परंतु अब वह एक पल भी नहीं रुकना चाहते थे। यह जीवन जाने कब साथ छोड़ दे। सांसें जाने कब उखड़ जाएं। पग बढ़ाते समय ऐसा लग रहा था मानो पूरी धरती डगमगा रही है। कीचड़ में लथपथ, लड़खड़ाते, गिरते-संभलते, वह आगे बढ़ते चले गए, अपनी तपस्या के फल में एक आशा लिए। राधा ने उन्हें क्षमा कर दिया है, वह उन्हें देखते ही अपनी बांहों में समा लेगी, उनकी छाती पर अपना सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ेगी, आंसू बहाएगी, तड़पेगी, प्यार करेगी, आंसुओं से उनके चरण धो डालेगी और उन्हें चाहिए भी क्या? यही देखने के लिए, यही प्यार पाने के लिए तो उन्होंने अपने जीवन का सब कुछ प्यार के दांव पर लगा दिया था।

 

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