महाराज तो कमल को बचाने में लगे थे।’
‘क्या?’ राधा मानो कुछ कहते-कहते रह गई। उसकी सांस ही अटक गई।
‘हां राधा बहन!’ रूपमती को अवसर मिला तो वह बोली, ‘हवेली में कृपाल सिंह के आदमियों से कमल को बचाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि कमल को मारना ही होता तो उसे अपने शरीर के रक्त का अंतिम कतरा भी देने पर क्यों राजी होते?’
‘हां राधा देवी!’ सहसा डॉक्टर को भी राधा की चुप्पी से अवसर मिला तो उसने समीप आते हुए कहा, ‘विजयभान सिंह स्वयं घायल थे फिर भी कमल को बचाने के लिए उन्होंने अपना जीवन ख़तरे में डाल दिया। यदि समय पर हमें उनका रक्त नहीं मिला होता तो कमल को कोई भी नहीं बचा सकता था।
राधा का दिल धक् होकर रह गया। जुबान तालू से चिपक गई। होंठ खुले-के-खुले रह गए। फटी-फटी आंखों से वह सबको देखने लगी। अपने कानों पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। यह सब क्या हो गया? क्या हो गया? यह कैसे हो सकता है? उसने वास्तविकता को जाने बिना ही दिल में भरी घृणा के कारण अनाप-शनाप बक दिया। यह उसने क्या किया? यह क्या हो गया? उफ! उसके दिल पर हज़ारों बरछियां घुस गईं।
ख़ामोशी‒पूर्णतया ख़ामोशी। कमरे में सभी ख़ामोश थे। ख़ामोशी के साथ सभी राधा के मुखड़े पर उतरते-चढ़ते प्रभाव को देख रहे थे, जहां नफ़रत की चिंगारियों ने अचानक ही गम का रूप धारण करके उसके दिल की स्थिति प्रकट कर दी थी।
सहसा कमल के होंठों पर फिर एक आह टपकी‒ ‘पिताजी…’
‘यह बेहोशी में बहुत देर से अपने पिताजी को याद कर रहा है।’‒डॉक्टर ने कहा और कमल की ओर देखा। सहसा उसके मुखड़े पर रौनक खिल उठी। चौंकता हुआ बोला, ‘अरे! कमल होश में आ रहा है…’ और फिर वह सबको छोड़कर मरीज़ की ओर बढ़ गए।
सबका ध्यान अपने आप ही कमल पर जा लगा। राधा ने भी पलटकर अपने जिगर के टुकड़े को देखा परंतु उसके पग आगे नहीं बढ़ सके। अनजाने में ही उससे ऐसा पाप हो गया था जिसकी क्षमा वह जल्द-से-जल्द मांग लेना चाहती थी। उसने रूपमती को देखा। रूपमती अपनी भीगी पलकें पोंछ रही थी। राधा की अवस्था देखकर उसे तरस आया। वह उसके और समीप आई, उसका हाथ पकड़कर प्यार से भर्राए स्वर में बोली, ‘राधा बहन! उनसे मेरी बात हुई थी। उन्होंने मुझे बताया कि वह अब तक केवल इसीलिए जीवित थे ताकि अपनी बर्बादी का तमाशा अपनी आंखों से देख लें ताकि तुम्हें भी उनकी बर्बादी देखकर संतोष हो जाए। उनकी केवल एक ही इच्छा है, तुम उन्हें क्षमा कर दो ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके।’
कुछ भी न कह सकी राधा, केवल तड़पकर ही रह गई। दिल पर मानो किसी ने जलती हुई सलाख रख दी थी। यह सलाख जो धंसती जा रही थी और वह तड़पती चली गई। आंसू थे कि गालों पर बहते ही चले गए। एक लाश बनी उसने कमल पर निगाह की, फिर रूपमती की ओर देखा।
‘वह कहां हैं?’ भर्राई आवाज़ में उसने पूछा।
‘बगल वाले वार्ड में।’ रूपमती ने उत्तर दिया, ‘ख़ून देने के बाद उनकी अवस्था और कमज़ोर हो गई है।’
राधा के दिल को चोट पहुंची। मन-ही-मन उसने स्वयं को धिक्कारा। उनके विरुद्ध बात करते समय उसके होंठ क्यों न जल गए, अंगुलियों द्वारा गाल के आंसू पोंछकर उसने एक गहरी सांस ली। उसके पग उठे तो उसने स्वयं ही बाहर जाने के दरवाजे का रुख किया, दुबारा कमल को उसने देखा तक नहीं।
जब राधा बगल के वार्ड में पहुंची तो पलंग खाली था। राधा ने चारों ओर नज़र दौड़ाई परंतु कमरा निराश कामनाओं के वातावरण में डूबी ख़ामोशी के साथ सिसक रहा था, वह पीछे पलटी तो रूपमती उसके समीप ही खड़ी थी। राधा के पीछे-पीछे आकर वह भी आश्चर्य से इधर-उधर नज़रें दौड़ा रही थी, परंतु निराशा ने उसकी दृष्टि का भी स्वागत किया, उसने राधा को देखा। राधा की आंखों से पानी का सोता जारी था।
‘मैं जानती हूं वह कहां होंगे…’ कांपते होंठों से राधा ने सब्र करने का प्रयत्न करते हुए कहा, ‘मैं उनके पास जाऊंगी अभी… इसी समय… मैं उनसे क्षमा मांगूंगी। उन्होंने जो कुछ भी मेरे साथ किया है उसे भूल जाऊंगी क्योंकि उन्होंने मेरे बेटे को नया जन्म दिया है।’
‘अभी?’ रूपमती ने आश्चर्य से पूछा।
‘हां!’ राधा ने दृढ़ मन से कहा, ‘रामगढ़ से ही ही कितनी दूर। मेरा दिल कहता है कमल को अब कोई भय नहीं। वह अवश्य बच जाएगा। उसे देखने के लिए आप लोग ही काफी हैं।’ और फिर राधा बिना किसी बात की प्रतीक्षा किए ही तेजी के साथ बाहर निकल गई।
रूपमती देखती ही रह गई, राधा को विजयभान सिंह से मिलने के लिए एकांत की आवश्यकता थी इसलिए उसने पग नहीं बढ़ाया। रामगढ़ यहां से है ही कितनी दूर। राधा राजा विजयभान सिंह के साथ जल्दी ही वापस लौट आएगी। कमल इनका बेटा है। वे स्वयं कमल के बिना अधिक देर रुकना उचित नहीं समझेंगे, कमल कितना भाग्यवान है, ख़ुशियां समेटी हैं तो अपनी ही नहीं, मां की भी, पिता की भी और साथ ही उनकी भी।
चार बजे थे कि राधा की गाड़ी गर्द उड़ाती हुई रामगढ़ की सीमा में प्रविष्ट होकर ठीक हवेली के गेट के सामने जा रुकी। दूर खड़े काम करने वाले मज़ूदरों ने एक बार उस पर अपनी दृष्टि उठाई और काम में व्यस्त हो गए। आज सुबह ही से इस हवेली में अच्छा-ख़ासा हंगामा था। पुलिस ने वारदात के स्थान पर आकर दिन-भर तहकीकात की थी। मज़दूरों को बुलाकर बातें पूछते-पूछते तंग कर मारा था, काफी देर बाद यहां का काम आरंभ हुआ था। अफसरान कमल को देखने के बहाने छुट्टी पर चले गए थे। छोटे-मोटे काम कराने वाले सहायक ही यहां रह गए थे।
राधा ने ऊपर दृष्टि उठाई। यद्यपि आकाश पर लालिमा छाने में अभी बहुत देर थी फिर भी हवेली पर भयानकपन छाया हुआ था। राधा ने ड्राइवर को प्रतीक्षा करने की आज्ञा दी और हवेली का गेट खोल दिया। राधा सरोज की ही गाड़ी में यहां आई थी। यद्यपि यह उसकी इच्छा नहीं थी फिर भी वह इसमें अस्पताल के बाहर निकलकर इसलिए बैठ गई थी क्योंकि उसे जल्दी थी, उसके बैठते ही ड्राइवर ने घबराकर इधर-उधर देखा था और फिर उसकी दृष्टि ऊपर जाकर चिपक गई थी।
एक खिड़की से समीप उसकी मालकिन रूपमती खड़ी उसे इशारा कर रही थी कि राधा को ले जाए, जहां कहीं भी वह जाना चाहे और तभी उसने तुरंत स्टेयरिंग संभाल ली थी। राधा के एक ही शब्द पर वह पूरी गति से गाड़ी लेकर रामगढ़ पहुंच गया था। यदि उसे आज्ञा नहीं मिलती तब भी उसे कमल की गंभीर स्थिति का आभास करते हुए राधा को ले जाना था, परंतु अब वह निश्चिंत था।
राधा अंदर प्रविष्ट हुई। तेज पगों से वह बरामदे में पहुंची, सीढ़ियां पार कीं। कोठे पर पहुंची, परंतु वहां कोई नहीं था। वह सीढ़ियां उतरकर सीधे बारजे पर पहुंची जहां राजा सूर्यभान सिंह तथा कुछ वर्षों तक विजयभान सिंह ने भी बैठकर रामगढ़ की प्रजा की फरियाद सुनी थी। वहां भी उसे निराशा मिली। पुरानी कुर्सी अपने समय का महत्त्व याद करके आंसू बहा रही थी। लपककर हवेली के पिछले भाग में गई, फिर जल्दी-जल्दी उसने दूसरे चप्पे को छान मारा, परंतु उसकी हांफती सांसों के साथ उसकी धड़कनें तेज होती गईं और धड़कनों के साथ निराशा का भार भी बढ़ता चला गया।
उसकी आशाओं पर पानी पड़ गया, ठंड होने के पश्चात् भी वह इस आयु में दौड़ते-दौड़ते पसीने में तर हो गई। फिर भी उसने आशा का दामन नहीं छोड़ा, वह जानती थी कि उनका यहां रहना निश्चित है। उन्हें यहीं होना भी चाहिए, हर अवस्था में। उस रात भी उसने उन्हीं का ठहाका यहीं पर सुना था और तब कमल ने टार्च द्वारा सभी चप्पों पर प्रकाश फेंका था परंतु उनका कहीं भी पता नहीं था। आज भी उसे कुछ ऐसा ही लगा मानो वह यहीं-कहीं छिपे बैठे हैं।
सहसा बड़े हॉल के सामने के दरवाजे पर ताला लगा देखकर वह ठिठकी, उस ठहाके वाली रात भी तो इस पर ताला पड़ा था। उससे सब्र नहीं हो सका। बगल से वह सीढ़ियां ऊपर चढ़ी तो एक बड़ी-सी खिड़की के समीप गुज़री। शीशे की खिड़की, परंतु पट अंदर से बंद थे। उसने एक बड़ी ईंट लेकर इस पर दे मारी। एक छनाका हुआ। शीशा टूट गया। बढ़कर उसने अंदर हाथ डाला तो कलाई कट गई, रक्त उमड़ पड़ा। खिड़की खुली तो गर्द का गुबार उड़ा और डूबते सूर्य की आती किरणों में सम्मिलित होकर मोटी रेखा में परिवर्तित हो गया। वह अंदर कूदी तो सूर्य की किरणों से काफी प्रकाश छाया हुआ था।
उसने देखा, हवेली के पुराने घिसे-पिटे बड़े-बड़े फर्नीचर बरसों से धूप की परत में छिपे हुए थे। फर्श की मोटी कालीन पर इतनी मोटी गर्द की परत थी कि उसके कदमों के गहरे-गहरे निशान बनते चले गए। उसने चारों ओर दृष्टि डाली। शायद…शायद वह यहीं-कहीं मिल जाएं, परंतु भारी-भारी फर्नीचर के अतिरिक्त यहां कुछ भी नहीं बचा था। ऐसा लगता था मानो चोर-डाकू यहां से उठाए जाने योग्य वस्तुएं पहले ही ले जा चुके हैं। वहां बड़े-बड़े चांदी के गुलदान थे, वहां सोने का तराजू था, वहां एक बड़ी शाही कुर्सी थी, जिस पर सोने की पत्ती चढ़ी हुई थी और उस जगह दीवार पर एक बहुत सुंदर तस्वीर थी।
वही तस्वीर जिसने उसके अंदर इतना जुल्म सहकर जीने की शक्ति उत्पन्न कर दी थी और जिसे उसने अभी कुछ ही दिन पहले सरोज के घर में भी देखा था। यहां तो कुछ भी नहीं है। संभवतः राजा विजयभान सिंह ने बेच दिया है। जाने कौन-सी मनहूस घड़ी थी जो उसने बददुआ दी और विजयभान सिंह को लग गई। यदि कोई अच्छी बात कही होती तो कभी पूरी न होती।
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