Overview:माइग्रेन में औरतें क्यों सबसे ज़्यादा जूझती हैं, फिर भी उन्हें राहत क्यों नहीं मिलती?
महिलाएं पुरुषों की तुलना में माइग्रेन और सिरदर्द की शिकार ज़्यादा होती हैं, लेकिन उनकी तकलीफ को अक्सर "सिर्फ स्ट्रेस" कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हार्मोनल बदलाव, पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज़ जैसे कारण इनके पीछे होते हैं। बावजूद इसके, महिलाओं की परेशानी को गंभीरता से नहीं लिया जाता, जिससे सही इलाज में देरी होती है। महिलाओं को पर्सनल इलाज और जागरूकता की ज़रूरत है।
Women and Headaches: सिरदर्द की शिकायत हर किसी को होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में सिरदर्द से ज़्यादा क्यों परेशान रहती हैं? कई बार ये दर्द एक आंख के पीछे हल्की सी झनझनाहट से शुरू होता है और फिर तेज़ सिरदर्द, मतली, थकान और तेज़ रोशनी से परेशानी तक पहुंच जाता है। खासकर माइग्रेन का दर्द तो कई बार घंटों या दिनों तक बना रहता है।
पर दुख की बात यह है कि इतने गंभीर लक्षण होने के बावजूद, महिलाओं की ये तकलीफ अकसर डॉक्टर क्लीनिक में ‘सिर्फ तनाव’ कहकर नजरअंदाज कर दी जाती है। जबकि रिसर्च बताती है कि महिलाएं माइग्रेन से पुरुषों के मुकाबले 2 से 3 गुना ज़्यादा जूझती हैं।
इस लेख में हम जानेंगे कि महिलाओं को सिरदर्द ज़्यादा क्यों होता है, इसके पीछे हार्मोन्स की क्या भूमिका है, डॉक्टर उनकी बातों को गंभीरता से क्यों नहीं लेते और उन्हें सही इलाज कैसे मिल सकता है। आइए इस गंभीर विषय को आसान भाषा में समझते हैं।
हार्मोन की वजह से क्यों बढ़ता है सिरदर्द?

महिलाओं में सिरदर्द खासकर माइग्रेन की सबसे बड़ी वजह उनके हार्मोन होते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि एस्ट्रोजन नामक हार्मोन जब पीरियड्स से पहले घटता है, तो ये ब्रेन पर असर डालता है और माइग्रेन शुरू हो सकता है। यही वजह है कि लड़कियों को पीरियड्स शुरू होने के बाद माइग्रेन ज़्यादा होने लगता है।
गर्भावस्था, मेनोपॉज़ और हार्मोनल दवाओं के चलते भी ये उतार-चढ़ाव और ज़्यादा बढ़ जाते हैं। कुछ महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान राहत मिलती है, तो कुछ को और दर्द होने लगता है। यानी हार्मोन का बदलाव सीधे तौर पर ब्रेन की नसों और केमिकल्स को प्रभावित करता है, जिससे सिरदर्द शुरू हो जाता है।
पीरियड्स और माइग्रेन: हर महीने एक जैसी तकलीफ

महिलाओं को पीरियड्स के समय जो माइग्रेन होता है, वह आम माइग्रेन से ज़्यादा तकलीफदेह होता है। यह दर्द ज़्यादा देर तक रहता है और कई बार दवाएं भी असर नहीं करतीं। डॉक्टर्स कहते हैं कि बहुत सी महिलाएं पीरियड्स के पहले दिन या उसी हफ्ते में सबसे ज्यादा दर्द की शिकायत लेकर आती हैं।
कई बार हार्मोनल दवाएं जैसे पिल्स या एचआरटी (हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी) कुछ महिलाओं को राहत देती हैं, लेकिन कुछ को इससे और दर्द बढ़ जाता है। यानी एक ही इलाज हर महिला पर असर नहीं करता। इसीलिए हर महिला को अपने पीरियड्स के समय के माइग्रेन का पैटर्न समझना चाहिए और उसी हिसाब से इलाज करवाना चाहिए।
डॉक्टर महिलाओं के दर्द को हल्के में क्यों लेते हैं?
बहुत बार महिलाएं सिरदर्द की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास जाती हैं, तो उनकी तकलीफ को गंभीरता से नहीं लिया जाता। डॉक्टर्स इसे तनाव, पाचन या आंखों की परेशानी बताकर नजरअंदाज कर देते हैं।
एक रिसर्च बताती है कि पहले के ज़माने में पुरुष डॉक्टर महिलाओं की बातों को बहुत कम महत्व देते थे। आज भी कई महिलाएं कहती हैं कि उनके दर्द को ‘नखरा’ या ‘भावुकता’ कहकर टाल दिया गया। यही वजह है कि बहुत सी महिलाएं समय रहते इलाज नहीं करा पातीं। महिलाओं के दर्द को समझने और स्वीकार करने की ज़रूरत है, ताकि उन्हें सही और समय पर इलाज मिल सके।
हर महिला के लिए एक जैसा इलाज क्यों नहीं होता?
हालांकि सिरदर्द की दवाएं सभी के लिए समान होती हैं, लेकिन महिलाओं में हार्मोन की वजह से उनके असर अलग होते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि महिलाओं के लिए इलाज को उनकी उम्र, हार्मोनल स्थिति और जीवनशैली के हिसाब से बदलना चाहिए।
जैसे कि कुछ महिलाओं को पीरियड्स शुरू होने से एक दिन पहले ही दवा शुरू करनी चाहिए, जिससे दर्द को रोका जा सके। कभी-कभी हल्के दर्द में NSAIDs या ट्रिप्टान जैसी दवाएं कारगर होती हैं। कुछ महिलाओं को बर्थ कंट्रोल या हार्मोन थेरेपी भी दी जाती है। पर ये सभी उपाय एक जैसी हर महिला पर काम नहीं करते। इसलिए एक पर्सनलाइज्ड अप्रोच जरूरी है।
महिलाएं क्या कर सकती हैं: दर्द को हल्के में न लें
अगर डॉक्टर या लोग आपकी शिकायत को नजरअंदाज करें, तो चुप मत रहें। सबसे पहले, अपना एक ‘हेडेक डायरी’ रखें। उसमें तारीख, लक्षण, दर्द का समय, दवा और असर लिखें। ये डॉक्टर को बीमारी समझने में बहुत मदद करेगा।
अगर एक डॉक्टर से राहत नहीं मिले, तो स्पेशलिस्ट के पास जाएं। पूछने में हिचकिचाएं नहीं। । महिलाएं अपनी सेहत के लिए जितना जागरूक होंगी, उतना ही बदलाव होगा।
