कहते हैं कि जब एक औरत मां बनती हैं तो उसका दूसरा जन्म होता है क्योंकि बच्चे को जन्‍म देने की प्रक्रिया सबसे कठिन मानी जाती है। पर फिर भी वह दर्द को झेलने के लिए तैयार रहती हैं। जहां कुछ औरतों को प्रसव पीड़ा में बहुत कम दर्द होता है, वहीँ कई दर्द से तड़प उठती हैं। यही दर्द और तड़प वो तब महसूस करती हैं जब वो दोबारा प्रेगनेंट होती हैं

‘‘मेरा पहला प्रसव अधिक आरामदेह नहीं रहा। मैंने सभी तकलीफदेह लक्षण सहे हैं। क्या इस बार भी यही सब होने वाला है?”
हालांकि पहले प्रसव से ही आने वाले प्रसवों की सूचना मिल जाती है इसलिए हो सकता है कि आपको पहले वाली ही कुछ तकलीफों का सामना फिर से करना पड़े लेकिन कुछ बदलाव भी आ सकते हैं क्योंकि सारी गर्भावस्थाएं एक सी नहीं होतीं जैसे पहली गर्भावस्था में जी मिचलाना व खाने से अरुचि की मात्रा बहुत ज्यादा थी तो इस बार ऐसा नहीं होगा। आपके जेनेटिक अनुभवों से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह गर्भावस्था कितनी तकलीफदेह या आरामदेह होगी। इसमें कुछ ऐसे कारण भी शामिल हैं, जिस पर आप स्वयं काबू पा सकती हैं। वे हैं :-
 

सामान्य स्वास्थ्य :- यदि आप पूरी तरह स्वस्थ होंगी तो गर्भावस्था काफी आरामदेह हो जाएगी इसलिए अपने स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान दें।

वजन :- यदि आप डॉक्टर की सलाह के अनुसार धीरे-धीरे वजन बढ़ाएंगी या फालतू वजन घटाएंगी तो वैरीकोज़ वेन्स, स्ट्रेच मार्क,पीठ में दर्द, थकान, अपच व सांस लेने में तकलीफ जैसी सभी परेशानियों से छुटकारा पा सकती हैं।

आहार :- गर्भवती स्त्री जितना अच्छा आहार लेगी, एक स्वस्थ शिशु के जन्म की संभावना बढ़ती जाएगी, साथ ही गर्भावस्था भी काफी आरामदेह रहेगी। इससे न केवल उलटी व जीमिचलाने जैसी तकलीफों से छुटकारा मिलेगा बल्कि, थकान, कब्ज, योनि संक्रमण, एनीमिया व सिर दर्द आदि से भी आराम मिलेगा। यदि गर्भावस्था के दौरान कोई परेशानी हो भी गई,तो भी स्वस्थ शिशु के जन्म की संभावना बनी रहेगी।

स्वस्थता (फिटनेस) :- आपको पूरी तरह से स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थता पर भी पूरा ध्यान देना होगा। दूसरी व उसके बाद वाली गर्भावस्थाओं में व्यायाम बहुत महत्व रखता है क्योंकि इससे पेट के निचले हिस्से की मांसपेशियों की लोच बढ़ती है। कई तरह के दर्द व खासतौर से पीठ के दर्द में आराम मिलता है।

जीवनशैली में बदलाव:- आपाधापी से भरी जीवनशैली में आपको गर्भावस्था के तकलीफदेह लक्षणों का सामना करना पड़ सकता है जैसे जी मिचलाना, थकान, सिर दर्द, अपच आदि। काम अधिक हो तो किसी की मदद लें। तनाव अधिक होने लगे तो थोड़ी देर काम छोड़ दें या योग व विश्राम की तकनीकें अपना कर मन को शांत करें। इस तरह आप पहले से बेहतर महसूस करेंगी।

दूसरे बच्चे :- कई गर्भवती महिलाएं, घर में दूसरे बच्चों के साथ इतनी व्यस्त रहती हैं कि उन्हें अपनी गर्भावस्था से जुड़ी तकलीफों का एहसास ही नहीं होता। कुछ महिलाओं को इस भागदौड़ के बीच कई बुरे लक्षणों का सामना करना पड़ता है जैसे-बच्चों को सुबह स्कूल भेजने या रात के खाने के समय की भागदौड़ के तनाव से जी मिचलाने व थकान की शिकायत बढ़ जाती है। पीठ में दर्द रहने लगता है। सही समय पर शौच न करने से कब्ज रहने लगती है। बच्चों के सर्दी-जुकाम व खांसी के कीटाणुओं से संक्रमण भी हो सकता है। ऐसा तो नहीं हो सकता कि आप अपनी गर्भावस्था की वजह से बड़े बच्चे/बच्चों को अपने से दूर कर दें (न ही आपको पहली गर्भावस्था वाली देखभाल व दुलार मिल सकता है) आपके लिए स्वयं अपनी देखरेख काफी होगी। बच्चे को सुलाते समय खुद भी झपकी ले लें, अपने खाने-पीने का ध्यान रखें व ऐसे काम न करें जिनसे गर्भावस्था में कोई परेशानी पैदा हो जाए या उससे कष्ट बढ़ जाएं।

‘‘मैं पहली गर्भावस्था में कुछ जटिलताएं भुगत चुकी हूं। क्या इस बार भी ऐसा ही होगा?”
एक जटिल गर्भावस्था का मतलब यह नहीं होता कि दूसरी भी वैसी ही होगी। हालांकि इनमें से कुछ जटिलताएं दोबारा सामने आ सकती हैं लेकिन सबके लिए ऐसा नहीं कह सकते। इनमें से कई ऐसी रही होंगी, जो सिर्फ एक ही बार हों, जैसे-कोई संक्रमण या फिर दुर्घटना! अगर वे जटिलताएं जीवनशैली की वजह से थीं तो शायद जीवनशैली में बदलाव के बाद वे सामने न आएं (जैसे धूम्रपान, मदिरा सेवन, मादक पदार्थ या कोई पर्यावरणीय कारण)। हो सकता है कि आप इस बार पर्याप्त चिकित्सीय देखभाल लें, जो शायद पहले नहीं ले पाई थीं। अगर कोई क्रॉनिक रोग की वजह से जटिलताएं आई थीं जो शायद आपने अब गर्भधारण से पहले ही उनकी चिकित्सा करा ली होगी; जैसे-मधुमेह या उच्च रक्तचाप। उन सब जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए ही डॉक्टर इस बार पहले ही संभल गए होंगे और आपको पूरी देखभाल दी जा रही होगी। कारण चाहे कोई भी क्यों न हो,अपेक्षित सावधानी व देखभाल के बल पर स्वस्थ शिशु के जन्म की गारंटी दी जा सकती है
 

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