Overview:क्यों शुरुआती लक्षण बन जाते हैं खतरा: पाचन की छोटी दिक्कतें भी हो सकती हैं संकेत
पैंक्रियाटिक कैंसर भारत में तेजी से बढ़ रहा एक ‘साइलेंट डिज़ीज़’ है, जिसके शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य पाचन समस्या समझकर नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं। आधुनिक प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी, जेनेटिक टेस्टिंग और उम्र आधारित मूल्यांकन अब इसके इलाज और शुरुआती पहचान को अधिक प्रभावी बना रहे हैं।
Silent Signs of Pancreatic Cancer: पैंक्रियाटिक कैंसर दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में से एक है—और भारत में इसकी दर तेज़ी से बढ़ रही है। दर्दनाक सच्चाई यह है कि यह बीमारी जितनी आम होती जा रही है, उतनी ही कम समझी और कम चर्चा की जाती है।
कारण है इसके शुरुआती लक्षणों का बेहद हल्का और भ्रामक होना—खट्टी डकारें, कमर दर्द, पेट में हल्की जलन, थकान। यही वजह है कि इसे ‘साइलेंट कैंसर’ कहा जाता है।
लेकिन अब कैंसर केयर की तस्वीर बदल रही है। प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी, जेनेटिक टेस्टिंग, और एज-आधारित मूल्यांकन जैसी आधुनिक तकनीकों ने हमें यह समझने में मदद की है कि किसे ज़्यादा जोखिम है, शुरुआती बदलाव क्यों महत्वपूर्ण हैं और परिवार खुद को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।
शुरुआत अक्सर मामूली संकेतों से होती है
जिन मरीजों को मैं देखता हूं, उनमें ज़्यादातर एक जैसी कहानी सुनाई देती है
“डॉक्टर साहब, लगा बस उम्र का असर है… तनाव है… या गैस की प्रॉब्लम है।”
ये शुरुआती संकेत हो सकते हैं:
• बिना वजह वजन कम होना
• अचानक शुगर लेवल बढ़ जाना (50 की उम्र के बाद नई डायबिटीज़ खास संकेत है)
• कमर या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द
• भूख कम लगना
• हल्के रंग के मल
• पीलिया

अलग-अलग देखने पर ये सभी लक्षण आम लगते हैं, लेकिन अगर एक साथ हों, तो तुरंत जांच ज़रूरी है।
यहां प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी क्यों महत्वपूर्ण है?
पैंक्रियाटिक कैंसर कई बार जेनेटिक बदलावों से प्रभावित होता है—और आज इनमें से कई बदलावों का इलाज संभव है।
मॉडर्न कैंसर केयर की शुरुआत अब सिर्फ कीमोथेरेपी से नहीं, बल्कि मॉलिक्यूलर टेस्टिंग से होती है। इससे पता चलता है:
• DNA रिपेयर जीन में बदलाव (BRCA1/2, PALB2)
• कौन-सा मरीज टार्गेटेड थेरेपी से लाभ लेगा
• किसे इम्यूनोथेरेपी उपयुक्त है
• कौन-से कैंसर पैटर्न परिवारों में चलते हैं
हर पैंक्रियाटिक कैंसर मरीज—उम्र चाहे जो हो—के लिए जेनेटिक टेस्टिंग आज बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
बुजुर्ग मरीज: “उम्र का असर” समझकर लक्षण न टालें
जेरियाट्रिक ऑन्कोलॉजी में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोग उम्र के कारण लक्षणों को सामान्य मान लेते हैं—
“कमर दर्द तो होता ही है…”
“उम्र में भूख कम लगना आम बात है…”
पर सच यह है कि बुजुर्गों में पैंक्रियाटिक कैंसर की प्रगति अलग तरीके से होती है।
आज फ्रेलिटी असेसमेंट की मदद से बुजुर्ग मरीजों के लिए सुरक्षित, व्यक्तिगत इलाज तय किया जाता है।
कई लोग 70–80 वर्ष की उम्र में भी उचित और व्यक्तिगत इलाज को अच्छी तरह सहन कर लेते हैं।
युवा भी अब जोखिम समूह में शामिल हो रहे हैं
हालांकि यह बीमारी युवाओं में कम होती है, लेकिन जब होती है तो अक्सर ये कारण पाए जाते हैं:
• आनुवंशिक सिंड्रोम
• धूम्रपान
• मोटापा
• क्रॉनिक पैंक्रियाटाइटिस
• हाई-फैट डाइट
• अत्यधिक शराब सेवन
युवा मरीजों में इलाज से पहले फर्टिलिटी प्रिज़र्वेशन, जेनेटिक काउंसलिंग, और लंबे समय की हेल्थ प्लानिंग महत्वपूर्ण होती है।
एक घटना जिसने मेरी सोच बदल दी
कुछ वर्ष पहले 58 वर्षीय मरीज आए। बस हल्की बदहजमी और शुगर अचानक बढ़ने की शिकायत थी।
उन्हें लगा—“काम का तनाव है, कुछ नहीं।”
लेकिन जांच में पता चला कि कैंसर काफी बढ़ चुका था।
उनकी एक बात आज भी मेरे मन में है—
“काश मैंने इन छोटे संकेतों को गंभीरता से लिया होता।”
यही कारण है कि जागरूकता बेहद ज़रूरी है।
क्या करें—क्या न करें
✔ Do
• स्वस्थ वजन बनाए रखें
• धूम्रपान छोड़ें
• शराब सीमित रखें
• डायबिटीज़ को नियंत्रित रखें
• फाइबर और प्लांट-बेस्ड फूड बढ़ाएं
• परिवार का मेडिकल इतिहास डॉक्टर को जरूर बताएं
• सलाह मिलने पर जेनेटिक टेस्ट कराएं
✘ Don’t
• 2–3 हफ्ते से ज़्यादा चलने वाले नए लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें
• यह न मानें कि पैंक्रियाटिक कैंसर केवल बुजुर्गों में होता है
• बार-बार गैस-एसिडिटी समझकर जांच को टालें
• लगातार चल रही पाचन समस्या में सिर्फ घरेलू नुस्खों पर निर्भर न रहें
हम हर परिणाम नहीं बदल सकते—पर समय ज़रूर बदल सकते हैं
पैंक्रियाटिक कैंसर चुनौतीपूर्ण है, लेकिन हम जितना जल्दी पहचानेंगे, उतना बेहतर परिणाम मिलेगा।
आधुनिक तकनीक, जेनेटिक समझ और व्यक्तिगत इलाज ने भविष्य को बेहतर बनाने का रास्ता खोल दिया है।
हमें बस ज़रूरत है—
जागरूकता की, सही फैसलों की और समय पर कदम उठाने की।
INPUT BY-डॉ. रमन नारंग, कंसल्टेंट मेडिकल एवं हेमेटोलॉजी ऑन्कोलॉजी, MOC कैंसर केयर एंड रिसर्च सेंटर, लाजपत नगर, नई दिल्ली
