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Over Eating Disorder
Over Eating Disorder

Over Eating Disorder: अब तक लोग यही समझते थे कि जरूरत से ज्यादा खाना ही मोटापे का कारण है जबकि एक नया शोध कहता है कि ओवर इटिंग ही मोटापा का मुख्य कारण नहीं है। इसके बजाय, मोटापा का अधिकतर अधिकांश दोष मॉडर्न डाइट्री पैटर्न को जाता है, जो हाई ग्लाइसेमिक लोड वाले फूड्स के सेवन की विशेषता है। यानी कि खास तौर पर प्रोसेस्ड और तेजी से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट। ये फूड्स हार्मोनल रिस्पांस का कारण बनते हैं, जो हमारे मेटाबॉलिज्म, फैट स्टोरेज, वेट गेन और मोटापा को बदल देता है। यह शोध द अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लीनिकल न्यूट्रीशन में प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार मोटे लोगों को हार्ट डिजीज, स्ट्रोक, टाइप टू डायबिटीज और कुछ खास तरह के कैंसर होने का बहुत ज्यादा खतरा है।   

अमेरिका की डाइट्री गाइडलाइंस कहती है कि वजन कम करने के लिए फूड और बेवरेजेस से मिलने वाली कैलोरी काउंट को कम करना और फिजिकल एक्टिविटी को बढ़ाना जरूरी है। वेट को मैनेज करने का यह अप्रोच सालों पुराने एनर्जी बैलेंस मॉडल पर आधारित है, जो यह बताता है कि वजन बढ़ने का कारण खर्च करने से ज्यादा एनर्जी के सेवन की वजह से होता है। आज के समय में सस्ते प्रोसेस वाले फूड का सेवन ज्यादा हो रहा है, जिससे लोग जरूरत से ज्यादा कैलोरीज का सेवन कर रहे हैं और आज की खराब लाइफस्टाइल की वजह से स्थिति और निगेटिव होती जा रही है।  

मोटापा की वजह अपर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी   

Over Eating Disorder
Exercise is Important

अपर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी के साथ अधिक खाना मोटापे की एक मुख्य वजह है। वहीं दूसरी ओर, सालों से पब्लिक हेल्थ मैसेज में लोगों को कम खाने और अधिक फिजिकल एक्टिविटी करने के लिए प्रोत्साहित करने के बावजूद, मोटापे और मोटापे से संबंधित बीमारियों की दर में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। इस स्टडी में एनर्जी बैलेंस मॉडल में खामियों पर इशारा किया गया है, यह कहा गया कि एक वैकल्पिक मॉडल, कार्बोहाइड्रेट-इंसुलिन मॉडल मोटापे और वजन बढ़ने को बेहतर तरीके से समझाता है। इसके अलावा, कार्बोहाइड्रेट-इंसुलिन मॉडल अधिक असरकारी और लंबे समय तक चलने वाले वेट मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी का रास्ता बताता है।

बोस्टन चिल्ड्रन हॉस्पिटल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर डेविड लुडविग के अनुसार, एनर्जी बैलेंस मॉडल हमें वजन बढ़ने के बायोलॉजिकल कारणों को समझने में मदद नहीं करता है। वह कहते हैं कि विकास में तेजी के दौरान, मान लेते हैं कि टीन बच्चे प्रति दिन के लिए 1,000 कैलोरी इनटेक को बढ़ा सकते हैं। लेकिन क्या उनकी ओवर इटिंग से विकास में तेजी आती है या क्या विकास में तेजी के कारण टीन बच्चा भूखा रह जाता है और ओवर इटिंग कर लेता है?

एनर्जी बैलेंस मॉडल के विपरीत, कार्बोहाइड्रेट-इंसुलिन मॉडल एक दावा करता है कि ओवर इटिंग मोटापे का मुख्य कारण नहीं है। इसके बजाय, कार्बोहाइड्रेट-इंसुलिन मोटापे के लिए मॉडल डाइट्री पैटर्न को बहुत अधिक दोष देता है, जिसमें हाई ग्लाइसेमिक लोड वाले फूड्स का सेवन अधिक किया जाता है। खास तौर पर प्रोसेस्ड और तेजी से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट।

वजन बढ़ने के पीछे का कारण 

Over Eating Disorder
Obesity Problem

जब हम बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट का सेवन करते हैं, तो बॉडी इंसुलिन सेक्रेशन को बढ़ा देता है और ग्लूलागोन सीक्रेशन को दबा देता है। यह बदले में, फैट सेल्स को अधिक कैलोरी स्टोर करने का इशारा देता है, जिससे मांसपेशियों और अन्य मेटाबॉलिक एक्टिव टिशू को कम कैलोरी मिलती है।

ब्रेन यह मानता है कि शरीर को पर्याप्त एनर्जी नहीं मिल रही है, जो बदले में भूख लगने की फीलिंग की ओर ले जाती है। इसके अलावा, फ्यूल के संरक्षण के शरीर की कोशिश में मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है। इस प्रकार, हम भूखे रहने की कोशिश करते हैं, भले ही हम हमारी बॉडी में एक्स्ट्रा फैट बढ़ता रहता है। मोटापे की साइंस को समझने के लिए हमें सिर्फ यह समझना जरूरी नहीं है कि हम कितना खा रहे हैं बल्कि यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि किस तरह फूड्स हमारे हार्मोन और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है। कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन मॉडल नया नहीं है, इसकी शुरुआत 1900 के शुरुआती दौर में हुई है। लेकिन यह जरूर है कि द अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लीनिकल न्यूट्रीशन आज भी बहुत मायने रखता है, जिसे 17 अंतर्राष्ट्रीय स्तर के साइंटिस्ट, क्लिनिकल रिसर्चर और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स ने मिलकर लिखा था। उन्होंने साथ मिलकर कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन मॉडल के सपोर्ट में लिखा है। इसके साथ ही, इन्होंने परीक्षण योग्य परिकल्पनाओं की एक सीरीज की पहचान की है, जो भविष्य के रिसर्च को गाइड करने के लिए दो मॉडल को अलग करती है। 

एनर्जी बैलेंस मॉडल की जगह पर कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन मॉडल को अपनाने से वेट मैनेजमेंट और मोटापे के इलाज पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है। लोगों को कम खाने के लिए बोलना आमतौर पर लंबे समय तक काम नहीं करता  है। इसकी बजाय, एक स्ट्रेटेजी बनानी चाहिए, जो कार्बोहाइड्रेट-इंसुलिन मॉडल पर आधारित है। यह रास्ता हम जो खाते हैं, उस पर अधिक फोकस करता है। 

डॉ लुडविग के अनुसार, लो फैट डाइट युग के दौरान तेजी से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट की खपत को कम करने से शरीर में फैट स्टोर करने के लिए ड्राइव अपने आप कम हो जाती है। इसके रिजल्ट में, लोग कम भूख और संघर्ष के साथ वजन कम कर सकते हैं। इसके लेखक स्वीकार करते हैं कि दोनों मॉडल को टेस्ट करने के लिए आगे रिसर्च की जरूरत है। 

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