Emergency Medicine Day
Emergency Medicine Day

Emergency Medicine Day: वर्ल्ड इमरजेंसी मेडिसिन डे 27 मई 2025 के मौके पर हम उन नायकों को सलाम करते हैं, जो हर दिन अस्पताल की आपातकालीन इकाई में ज़िंदगी और मौत के बीच खड़े होकर फैसले लेते हैं। इस साल की थीम ‘बैटलफील्ड हीलर्स’ को समर्पित है उन डॉक्टरों और हेल्थकेयर वर्कर्स को, जो अदृश्य लड़ाइयों के सिपाही हैं—जो समय के खिलाफ, संसाधनों की कमी में, और अत्यधिक दबाव में भी हर जान बचाने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैं। डॉ. नेहा शर्मा, अटेंडिंग कंसल्टेंट, इमरजेंसी मेडिसिन, फोर्टिस अस्पताल, मानेसर, इस लेख में साझा कर रही हैं अपनी ज़मीनी हकीकत और उस इंसानी जज़्बे को जो इस चुनौतीपूर्ण पेशे को संभालता है।

हर एक शिफ्ट इमरजेंसी मेडिसिन में ऐसे लगती है मानो हम किसी युद्ध के मैदान में उतर रहे हों—लेकिन यह लड़ाई किसी दुश्मन से नहीं, बल्कि समय, अनिश्चितता और जानलेवा बीमारियों से होती है। हम युद्ध क्षेत्र के चिकित्सा विशेषज्ञों की तरह होते हैं—दबाव में काम करते हैं, सीमित जानकारी के साथ, और बिना किसी ‘पॉज़’ बटन के। हमारे हथियार हैं—सटीक निर्णय, रफ्तार और टीमवर्क।

सिर्फ पिछले हफ्ते की बात है, एक बुज़ुर्ग व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ़ होती हुई इमरजेंसी में लाया गया। कुछ ही मिनटों में हमने उन्हें इंटुबेट किया, सेंट्रल और आर्टेरियल लाइनें लगाईं, ज़रूरी दवाएं दीं और उनकी स्थिति को स्थिर किया। यह एक समन्वित, हाई-स्टेक प्रयास था—और यह सफल रहा। लेकिन जैसे ही मरीज ICU में पहुंचा, हमने जश्न नहीं मनाया। हमने खुद से और एक-दूसरे से पूछा—क्या हम और कुछ कर सकते थे? क्या हमें कुछ अलग प्रयास करना चाहिए था?

यही है हमारी जिम्मेदारी का बोझ। हमसे परफेक्शन की उम्मीद की जाती है, चाहे हालात जैसे भी हों।

इमरजेंसी मेडिसिन उस समय हमारा सर्वश्रेष्ठ मांगती है जब संसाधन सीमित होते हैं और एड्रेनालिन चरम पर होता है। लेकिन इन सबके बीच हम अंदर ही अंदर कई संघर्षों से जूझते हैं—बर्नआउट, आत्म-संदेह (इम्पोस्टर सिंड्रोम), और भावनात्मक थकान जो शिफ्ट खत्म होने के बाद भी बनी रहती है।

तो हम खुद को ढालना सीखते हैं। मरीजों के बीच कुछ गहरे साँस लेना, ब्रेक रूम में स्ट्रेच करना, या वो हंसी जो भावनात्मक बोझ से हमें बचाती है—ये सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं। व्यायाम, पर्याप्त नींद, थोड़ी सी माइंडफुलनेस—ये ऐशोआराम नहीं, बल्कि जीवनरेखा हैं। सहकर्मियों के साथ की गई बातचीत किसी थेरेपी से कम नहीं होती। सीमाएं तय करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-संरक्षण है।

कभी-कभी राहत सिर्फ साझा खामोशी में मिलती है, या उस हास्य में जो कुछ पलों के लिए इस उथल-पुथल को विराम देता है। ऐसे सिस्टम में जो हमसे हमेशा और अधिक चाहता है, ये छोटे-छोटे प्रयास हमें इंसान बने रहने में मदद करते हैं।

इमरजेंसी मेडिसिन का मतलब है अपने सभी कौशल, अनुभव, समझ और इंसानियत के साथ हाज़िर होना—जबकि अपने निजी जीवन की परेशानियों को दरवाज़े के बाहर छोड़ देना। हमें अपने बिल, अपने बच्चों, अपने अधूरे सपनों को एक तरफ रखना पड़ता है—ताकि हम अपने मरीज के सबसे बुरे वक्त में पूरी तरह से उसके साथ रह सकें।

इस वर्ल्ड इमरजेंसी मेडिसिन डे पर हम केवल उन ज़िंदगियों को नहीं, बल्कि उन चिकित्सकों को भी सलाम करते हैं—जो हर दिन, हर परिस्थिति में डटे रहते हैं। क्योंकि इलाज सिर्फ हमारा काम नहीं है—यह हमारी पहचान है।

मेरा नाम सुनेना है और मैं बीते पाँच वर्षों से हिंदी कंटेंट लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हूं। विशेष रूप से महिला स्वास्थ्य, मानसिक सेहत, पारिवारिक रिश्ते, बच्चों की परवरिश और सामाजिक चेतना से जुड़े विषयों पर काम किया है। वर्तमान में मैं...