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Are you a victim of this disorder?

Victims of disorder : किसी अपने की मौत का दु:ख सभी को होता है लेकिन कुछ लोग इस सदमें से कभी बाहर नहीं निकल पाते हैं। लंबे समय तक इस तरह एक घटना को लेकर सोचना कोई सामान्य बात नहीं है। यह एक खास तरह का अवसाद है, जिसे प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर कहते हैं।

पिछले कुछ समय से हम सभी एक अजीब दौर से गुजर रहे थे। जहां एक तरफ बेरोजगारी इंसान को हैरान-परेशान किए हुए थी तो दूसरी तरफ अपनों मौत उसे दु:खी कर रहा था। धीरे-धीरे स्थिति बेहतर होने लगी है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनों के जाने को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। किसी का पति चला गया तो किसी का बेटा! किसी की मां चल बसी तो किसी की बेटी।

हर वो परिवार जिसका कोई अपना चला गया है, वो एक अथाह दु:ख में जी रहा है। लंबे समय तक इस सदमे में रहने की वजह से वह एक अवसाद में घिर गया है। दुनियाभर के मनोवैज्ञानिक इसे एक खास तरह का डिप्रेशन बता रहे हैं। इसे प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर बताया जा रहा है।

विदेशों में इसे लेकर कई तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं। यहां तक कि लोगों से मुखर होकर इस पर बात करने की अपील कर रहे हैं। खासकर, कोविड के बाद शहरों में अकेले रहकर काम करने वाले युवाओं में इसकी शिकायत सामान्य तौर पर देखने को मिली है। इसमें मनोवैज्ञानिक भी उनकी मदद कर रहे हैं।

हालांकि, यह बीमारी बहुत ही कम संख्या में देखी गई है। किसी अपने के जाने का दु:ख हर किसी को होता है लेकिन कोविड के बाद  यह एक चर्चा का विषय बन गया है। आज हम इस प्रोलोंग ग्रीफ डिसऑर्डर पर बात करेंगे, जिस पर अब तक लोगों का कम ही ध्यान गया है

क्या है प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर?

मनोवैज्ञानिक डॉ. स्वाति सिंह का कहना है कि प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर एक ऐसा दु:ख या कहें कि शोक है जिसकी गिरफ्त में इंसान लंबे समय तक रहता है। कई बार तो इंसान इस दु:ख से निकल ही नहीं पाता। मतलब इस बीमारी के मरीज सालों तक किसी दु:ख के साये में रहते हैं और मरीज सालों तक किसी दुर्घटना का शोक मनाते रहते हैं।

चिकित्सा जगत के लिए चुनौती

मनोवैज्ञानिक डॉ. स्वाति सिंह का मानना है कि ये वर्तमान में ही चर्चा में आया है। इस पर कई सालों से शोध किया जा रहा है। यह बीमारी चिकित्सा जगत के लिए भी एक चुनौती है। आप इसे ऐसे समझिए कि किसी परिचित की मौत होती है तो उस पर रोना एक सामान्य व्यवहार है। फिर समय के साथ व्यक्ति इससे उबर आता है। दिक्कत तब शुरू होती है जब सालों बाद भी वह उसी घटना के
बारे में सोचता रहता है।

रही बात इस उदासीनता की अचानक से चर्चा में आने की तो वह इसलिए है क्योंकि किसी दु:ख से इंसान को धीरे-धीरे निकलने में कम से कम छह महीने का समय लगता है। ज्यादा से ज्यादा समय वह आसपास के माहौल से सामंजस्य बैठाते हुए लेता है। जबकि कोविड को गुजरे हुए एक साल होने जा रहे हैं (वह अलग बात है कि कोविड के मामले फिर बढ़ने लगे हैं) और फिर भी इसके पीड़ित सामान्य जीवन में नहीं लौट पा रहे हैं। इसे बीमारी का दर्जा देने की भी मांग उठने लगी है।

नेशनल सेंटरफॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन नामक वेबसाइट के अनुसार यह डिसऑर्डर, इंटरनेशनल क्लासीफिकेशन बीमारी के 11वें संस्करण में भी शामिल कर लिया जाएगा। यह चिकित्सीय वर्गीकरण की सूचियों का एक समूह है, जिसमें सभी बीमारियों की कोडिंग, लक्षण, समस्या और उससे जुड़े सामाजिक पहलू इत्यादि की कोडिंग की जाती है। यह विश्व स्वास्थ्य
संगठन द्वारा निर्मित है। बहरहाल, इसे एक बीमारी का रूप दे दिया तो इसका निदान आसानी से हो सकता है।

क्यों यह खतरनाक है

डॉ. स्वाति इस सवाल का जवाब देते हुए कहती हैं कि डिप्रेशन एक आम परेशानी है। जो कि किसी भी वजह से हो सकता है और इसकी पहचान सामान्य तौर पर की जा सकती है। कई बार बाल झड़ने और कम अंक आने जैसी छोटी वजहों से भी अवसाद हो जाता है। इसकी पहचान आसानी से कर इससे समय पर निजात पाई जा सकती  है, लेकिन प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर के साथ ऐसा नहीं है।

इसमें अधिकतर दु:ख किसी के खोने या बहुत बड़ी घटना का ही होता है। अकसर अपने आसपास आपने देखा होगा की जब किसी व्यक्ति के किसी अपने की मृत्यु हो जाती है तो समझाने पर वह उस घटना को भूलने का प्रयास करता है। जबकि इस डिसऑर्डर में व्यक्ति इस सदमे से उबर नहीं पाता है। उसका व्यवहार देखने में सामान्य लगता है लेकिन भीतर से वह दु:खी रहता है। इसलिए यह डिप्रेशन से पूरी तरह अलग है।

शब्द नया, बीमारी पुरानी

बेशक प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर सुनने में नया लगा रहा है लेकिन यह भी एक तरह का अवसाद ही है। यह दिमागी समस्या काफी पुरानी है और काफी बड़े स्तर पर लोग इसके शिकार हैं। जैसे कि-

  1. बचपन में यौन शोषण का शिकार हुआ बच्चा बड़े होने तक इस अनुभव से निकल नहीं पाता। कई बार वह इसके डर के साये में इस तरह से जकड़े रहता है कि वह नये लोगों से मिलने में भी डरता है। जिस कारण वह अंतर्मुखी बन जाता है। ऐसे लोग अकेले ही खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं।
  2. महिलाओं में इस तरह की दिमागी समस्या ज्यादा पाई जा सकती है, क्योंकि वे पुरुषों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होती हैं। चूंकि, जीवनसाथी का जाना एक सबसे बड़ा दु:ख माना जाता है। उम्र के एक खास पड़ाव में साथी की बहुत आवश्यकता रहती है। ऐसे में अचानक महामारी या किसी दुर्घटना के कारण जीवनसाथी का चला जाना एक बड़ा सदमा दे जाता है। अधिकतर परिवारों में पुरुष ही अकेला कमाने वाला होता है, ऐसे में किसी का पति या बेटा चला जाए तो उस घर की महिला को इस तरह का डिप्रेशन हो सकता है।

कैसे पहचाने

बकौल डॉ. स्वाति, प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर के लक्षण बहुत ही सामान्य होते हैं, जिसके तरफ ज्यादा ध्यान नहीं जाता है। उदाहरण के लिए किसी के मौत के एक साल बाद भी उस दु:ख से पीड़ित व्यक्ति बात-बात में उसका नाम लेता रहे या रोता रहे तो हो सकता है कि वो इस तरह के डिसऑर्डर से ग्रस्त हो गया हो! आसपास के लोगों को लगता है कि ये उसकी आदत है जो धीरे-धीरे छूट जाएगी। हालांकि, ऐसा नहीं है। मनोचिकित्सक मानते हैं कि 21 दिन में कोई व्यवहार रोजाना की जिंदगी में शामिल हो जाता है और 60 से 64 दिन में वह आदत बन जाती है।

इस तरह की स्थिति एक चिंताजनक स्थिति है और इसका मतलब है कि वह इंसान मृत व्यक्ति को अब भी अपने रोजाना के जीवन में शामिल किया हुआ है। ऐसे में यह दु:ख धीरे-धीरे प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर बनने लगता है। ऐसी स्थिति में आसपास के लोग भी इसलिए नहीं टोकते कि ये तो उसकी आदत थी जो धीरे-धीरे कर के छूट जाएगी जबकि धीरे-धीरे आसपास के लोग ही उस फलाने व्यक्ति के वैसी आदत को सामान्य मान लेते हैं और फिर इस पर ध्यान नहीं देते। जबकि ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत किसी मनोवैज्ञानिक से संपर्क करना चाहिए।  कई बार इस आत्महत्या के मामले मिलते हैं जिसमें लोगों को समझ नहीं आता कि उस फलाने व्यक्ति ने आत्महत्या क्यों की होगी। जबकि ये किसी लंबे दु:ख का परिणाम होता है।

उपचार

डॉ. स्वाति कहती हैं कि इसके उपचार में सबसे पहले मनोवैज्ञानिक से मिलना ही शामिल है। अब यह कोई शारीरिक बीमारी तो है नहीं कि आप डॉक्टर से मिल लें और दवाई ले लें। इसमें मनोवैज्ञानिक सबसे पहले मरीज की हालत का जायजा लेता है और फिर उसके बाद उपचार शुरू होता है। रिश्तेदार इस दु:ख से उबरने में कई तरह से सहायक हो सकते हैं। जैसे-
01. मरीज को कभी अकेला नहीं छोड़ना।

02. सुबह मरीज के उठने से पहले उसके पास चले जाना जिससे कि वह उठते ही उस मृत या दूर गए व्यक्ति को याद ना करें।
03. अगर मरीज किसी घटना से पीड़ित है तो रात को सोते समय उसे अकेले सोने ना जाने दे और जिससे कि वह रात को सोते हुए ना डरे।
04. योग करने से मानसिक शांति मिलती है तो इसकी मदद भी ली जा सकती है।
05. मरीज को कोई नई आदत लगाएं या नई जगह में सेटल कराएं। उसी जगह में रहकर उस याद से निकलना मुश्किल होता है।
कोई भी बीमारी ऐसी नहीं होती है जिसका इलाज नहीं किया जा सकता। लेकिन अवसाद बीमारी से ज्यादा एक तरह का डर या अहसास होता है जो भावनात्मक और मानसिक तौर पर आघात पहुंचने से पैदा होता है। ऐसे में यह दिखता नहीं है। लेकिन लक्षणों पर ध्यान दिया जाए तो इसका पता लगाया जा सकता है और लक्षणों पर ध्यान देने के लिए उस इंसान के साथ समय बिताने की जरूरत होती है जबकि आज के दौर में ऐसा मुश्किल है। इसलिए लोग केवल मिलते हैं, सांत्वना जताते हैं और यह कहकर पीछा छुड़ा लेते हैं कि कर ही क्या सकते हैं।

जबकि अगर आप रोज आधा या एक घंटा किसी अवसादग्रस्त व्यक्ति को समय देंगे तो वह इस अवसाद से बाहर आ सकता है। यदि खुद व्यक्ति भी अपने अवसाद या प्रोलॉन्ग ग्रीफ डिसऑर्डर के बारे में अहसास कर लेता है और उससे बाहर निकलना चाहता है तो वह तुरंत किसी मनोवैज्ञानिक से संपर्क करें और उसे अपनी समस्या बताएं। क्योंकि वर्तमान समय में लोग बीमारी से कम बल्कि बीमारी के दु:ख से ज्यादा मरते हैं। इसलिए इस दु:ख और अकेलेपन की जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी पहचान करें और इससे निजात पाएं।

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