अवसाद भारत के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है, यह समस्या हर वर्ग, हर क्षेत्र में बढ़ रही है और हमारे देश के लोग दिन-प्रतिदिन अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं। मनोविज्ञान के क्षेत्र में मनोभावों संबंधी दु:ख को अवसाद माना गया है। मेडिकल भाषा में मानसिक असंतुलन और डिप्रेशन का मुख्य कारण हमारे मस्तिष्क में स्रावित न्यूरोट्रांसमीटर्स हार्मोन की कमी से माना गया है।

मस्तिष्क में कुछ रासायनिक तत्वों के संतुलन बिगड़ने या अनुवांशिक कारणों से भी अवसाद हो जाता है। सामान्यता प्रेम संबंधों में असफलता, किसी प्रिय व्यक्ति की मौत, धोखा, कैरियर में अपेक्षित सफलता ना मिल पाना अथवा कार्य क्षेत्र में तिरस्कृत महसूस करना अवसाद के प्रमुख कारणों के रूप में उभर कर सामने आ रहे हैं।

जीवन में घटी अनेक दुखद घटनाएं भी अवसाद का कारण होती हैं। व्यापार में आर्थिक स्थिति कमजोर होने का भय इसके साथ ही अनेक अन्य चिंताएं भी मानव मन में अवसाद का कारण बन रही है।

हर आयु में अवसाद के अलग-अलग कारण होते हैं। कई बच्चों को लगता है कि माता-पिता अन्य भाई-बहनों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं तो वह अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं।

शिक्षकों द्वारा प्रताड़ित होने अथवा साथियों के द्वारा मजाक उड़ाना भी अवसाद ग्रस्त होने का एक प्रमुख कारण है।

रजोनिवृत्ति के समय हारमोंस की कमी व शारीरिक बदलाव भी स्त्रियों में अवसाद का एक कारण है। मध्य आयु में घर की बढ़ती जिम्मेदारी को पूरा करने में असमर्थ पुरुष भी अवसाद का शिकार होने लगते हैं। बुढ़ापे में अकेलापन और स्वयं की शक्ति हीन होती दिखती है तब भी बुजुर्ग अवसाद का शिकार हो जाते हैं।

अवसाद में इंसान मौन रहकर घुटता रहता है, कहता कुछ नहीं और धीरे-धीरे स्वयं को अकेले अपनी निराशावादी दुनिया में कैद कर लेता है। इस बीमारी को लोग सामान्य तौर पर लेते हैं पर ये इतना सामान्य विषय है नहीं क्योंकि अगर यह सामान्य विषय होता तो व्यक्ति का अंत आत्महत्या के रूप में ना होता।

गहरे अवसाद में जाने का प्रमुख कारण है कि व्यक्ति अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में बहुत अकेला होता जा रहा है। जब दूसरे लोग उसका साथ नहीं देते अथवा उसके साथ बुरा बर्ताव करते हैं या उसे नहीं अपनाते तो इस भावना के साथ व्यक्ति अपने अवसाद को और भी अधिक गहरा बनाकर स्वीकार करता जाता है और अंतत: एक दिन कष्टों का निवारण मृत्यु में ढूंढ लेता है।

अन्य स्वास्थ्यगत समस्याओं की तरह अवसाद भी एक घातक बीमारी है, जिसमें पीड़ित की पीड़ा को उसके अतिरिक्त कोई दूसरा ज़रा भी महसूस नहीं कर पाता, लोग तो इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पागल तक कह देते हैं।

अवसाद ग्रस्त व्यक्ति के हार्मोन बैलेंस में नहीं रहते। कभी भूख ना लगना और कभी अधिक भोजन करना, कभी खुलकर हंसना और कभी आहत होकर फूट-फूट कर रोना जैसी अवस्थाएं मानसिक क्षति पहुंचाती हैं। अत: अवसाद ग्रस्त व्यक्ति को कभी अकेला ना छोड़ें।

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कई बार अवसाद में डूबे व्यक्ति को नशे की आदत पड़ सकती है। वह आत्महत्या करने की कोशिश कर सकता है। कई बार तो अवसाद ग्रस्त व्यक्ति धार्मिक गतिविधियों में डूबकर यथार्थ से पलायन तक कर सकता है। इसकी गंभीरता देखते हुए इस समय आवश्यकता है समाज में इस बीमारी के प्रति जागरूकता लाने की।

मैं सबसे यही कहना चाहूंगी कि कभी कोई चुपचाप, खोया-खोया, बात-बात पर रो देने वाला इंसान मिले तो उसे सहानुभूति दिखाइए, हिम्मत दीजिए। उसे नजरिया बदलने में मदद कीजिए। उसे कोस कर, ताने देकर और मत तोड़िए। सौ बार भी उसकी एक ही बात सुननी पड़े तो सुनिए। हर बार आपको भी एक नया पहलू मिलेगा उसे समझने का, समझाने का क्योंकि अवसाद से बाहर निकलने के लिए व्यक्तिश: जागरूकता आवश्यक है।

‘आई एम अवेलेबल’ कहने भर से कोई अपने दु:ख, अपनी पीड़ा आपसे शेयर नहीं करेगा उसके जख्म भरने के लिए अंदर से हीलिंग जरूरी है, बाहर से नहीं। अत: हमें उन्हें समझाना होगा, अवसाद से जीतने के लिए रोज खुद से लड़ना सीखना ही होगा।

जीवन है तो समस्याएं भी होंगी। उन परिस्थितियों से आप कब तक भागेंगे, कभी ना कभी तो उनसे लड़ना सीखना ही होगा।

अगर जिंदगी में कुछ बुरा हुआ है तो   

  याद रखना है कि यह हालात आपकी वजह से नहीं आए, आप खुद को दोष ना दें, ना हार, ना अपमानित महसूस करें।

रास्ता नजर नहीं आएगा लेकिन हिम्मत ना हारें, धीरे-धीरे खुद को पहाड़ काटकर नया रास्ता बनाने के लिए तैयार करें।

इस समस्या से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी तरीका है, जो व्यक्ति परिवेश अथवा कार्य क्षेत्र के लोग आपके अवसाद का कारण बनते हैं उनसे खुलकर बात करें अथवा उनसे एक निश्चित दूरी बना लें क्योंकि जो हमारी पीड़ा ही ना समझे उस संबंध से जुड़कर केवल दु:ख मिलना निश्चित है।

भले ही दोस्तों, रिश्तेदारों का दायरा कम हो लेकिन जितना भी हो अच्छा हो, सकारात्मक हो।

अवसाद को अपने ऊपर हावी ना होने दें, अपनी समस्याएं साझा करें, अपने खास मित्रों को जरूर अपनी समस्या से अवगत करवाएं।

अवसाद से निकलने के लिए वह कार्य करें, जिन्हें करने से आपको खुशी मिलती है। प्रतिदिन टहलने का नियम बनाएं। सदैव सकारात्मक रहें। अपने अंदर के गुस्से का, घुटन का गुबार निकालें। बस आपको कोई एक सही रास्ता ढूंढना है कि ये गुबार बाहर कैसे निकले क्योंकि आपके अंदर एक घटना के बाद में जमा हुई घुटन बढ़ गई तो आपके मानसिक स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचेगा।

मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा तो हम हर समस्या से जूझ कर समाधान तक ले आएंगे पर जब हम ही ना रहे तो परिवार कैसे जिएगा आपको अपना और अपने परिवार के बारे में सोचना होगा। कुछ भी हो जाए जीना है कल के लिए, धीरज रखें, कम में जीना है पर जीना है। यह वक्त आपका इम्तिहान लेने के लिए आया है, थोड़े दिन झटके लगेंगे, उदासी रहेगी, लेकिन हंसते मुस्कुराते रहिए।

हम दोबारा शुरुआत करके मंजिल तक पहुंचने का हौसला रखते हैं, जैसे- लूडो में सांप सीढ़ी के खेल में 99 पर सांप काट ले तो आप बिल्कुल नीचे आते हैं, खेल से बाहर नहीं होते। दोबारा ऊपर की ओर बढ़ने की कोशिश करते हैं, हार कर भी हम जीतने के लिए 100 तक जाने के लिए मेहनत करते हैं और यही हमें अपनी जिंदगी में करना है।

जब व्यक्ति खुद ही जान जाता है अब उसकी समस्या, उसकी घुटन, उसकी खीज का हल उसके पास ही है तो वह बहुत सकारात्मक हो जाता है। अत: यह सोच उसमें जागृत करनी आवश्यक है कि गहन रात्रि है तो सूर्य भी उदित होगा तो शायद उसके जीवन में मधुरता लौट आएगी।

यह भी उसे समझाना होगा कि किसी और के लिए आप इतने जरूरी ना हों, खुद के लिए तो खास हैं। इसलिए मर कर नहीं लड़ कर अपने अवसाद का सामना करें। 

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