Nushrratt Bharuccha
Nushrratt Bharuccha

Nushrratt Bharuccha on Trolling: आज के डिजिटल दौर में लोग दूसरों की निजी पसंदों, खासकर धर्म और अभिव्यक्ति को लेकर बहुत जल्दी जज कर लेते हैं। ऐसे समय में अभिनेत्री नुसरत भरूचा की बातें समझने लायक हैं कि अपने विश्वासों में जड़ें बनाए रखते हुए, आध्यात्मिक खुलेपन को अपनाना जरूरी है। एक इंटरव्यू में नुसरत ने भरोसे, पहचान और ऑनलाइन ट्रोलिंग को लेकर बड़ी स्पष्टता के साथ बात की।

नुसरत ने कहा है, “जहां भी आपको शांति मिले, चाहे वो मंदिर हो, गुरुद्वारा हो या चर्च… वहां जाना चाहिए। मैं तो खुलकर कहती हूं… मैं नमाज़ पढ़ती हूं। अगर समय मिले तो दिन में पांच बार पढ़ती हूं। मैं यात्रा में भी अपनी जानमाज़ (प्रेयर मैट) साथ लेकर चलती हूं। जहां भी जाती हूं, मुझे वहीं वही सुकून और ठहराव महसूस होता है। मैंने हमेशा यह माना है कि ईश्वर एक ही है, बस उससे जुड़ने के रास्ते अलग-अलग हैं और मैं उन सभी रास्तों को जानना चाहती हूं”।

उन्होंने सोशल मीडिया पर मिलने वाली आलोचना पर भी बात की। वे कहती हैं, “चाहे मेरे कपड़े हों या मैं कहां जाती हूं, हर बात पर मुझे ट्रोल किया गया है। जब मैं कोई तस्वीर पोस्ट करती हूं, लोग पूछते हैं, ‘वो कैसी मुस्लिम है? उसके कपड़े देखो।’ मैं इससे कैसे निपटती हूं? जैसे किसी और आलोचना से। ये बातें मुझे बदलती नहीं हैं। न ही ये मुझे मंदिर जाने से रोकती हैं, न ही नमाज़ पढ़ने से। मैं दोनों करती रहूंगी। क्योंकि यही मेरा विश्वास है”।

नुसरत ने खुद को “लिबरल मुस्लिम” बताया, जो अपने अंदाज़ में आध्यात्मिकता को अपनाती हैं। वे कहती हैं “जब आपके विचार, आत्मा और मन स्पष्ट होते हैं, तो दुनिया की कोई ताकत आपको डिगा नहीं सकती”।

आंतरिक स्पष्टता एक संतुलित आत्म-परिचय का परिणाम होती है। ये जानना कि आप कौन हैं, किन मूल्यों को मानते हैं और क्यों मानते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से ये उच्च आत्म-जागरूकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और एक स्थिर आंतरिक मूल्य प्रणाली से जुड़ी होती है। ऐसे लोग आलोचना का जवाब प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन से देते हैं। इसे पाने की शुरुआत आत्मनिरीक्षण से होती है जैसे कि थैरेपी (मनोचिकित्सा), ध्यान और मूल्यों पर आधारित अभ्यास। यह भी जरूरी है कि आप अपने आस-पास सच्चे रिश्तों का माहौल बनाएं, खुद को सकारात्मक माहौल में रखें और रोज़मर्रा की दिनचर्या में खुद को स्वीकार करने वाले कामों के लिए समय निकालें। यह आलोचना से अछूते रहने की बात नहीं है, बल्कि अपनी पहचान को इतनी गहराई से समझने की बात है कि बाहर की आवाज़ें आपके अंदर की सच्चाई को प्रभावित न कर सकें।

यह सच है कि आध्यात्मिक आज़ादी, मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-पहचान को गहराई से प्रभावित करती है। चाहे वो प्रार्थना हो, ध्यान हो या सिर्फ चिंतन … जब कोई व्यक्ति अपने विश्वासों से जुड़ने में आज़ाद होता है, तो उसे आंतरिक संतुलन और सुकून का अनुभव होता है। अगर समाज किसी व्यक्ति की आध्यात्मिकता को सीमित या जज करता है, तो ये आंतरिक टकराव पैदा कर सकता है खासकर तब, जब कोई खुद के सच्चे रूप और सामाजिक स्वीकृति के बीच झूलता है। बहुत से लोगों के लिए आध्यात्मिक अभ्यास सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि एक उपचारात्मक अनुभव है। यह उन्हें सोचने, ऊर्जा पुनः प्राप्त करने और बाहरी दबावों के बीच जीवन का अर्थ खोजने की जगह देता है। यह आलोचना से अछूता होने की बात नहीं है, बल्कि उस जगह तक पहुंचने की बात है जहां आपकी पहचान अडिग हो, ताकि बाहर का शोर आपके अंदर की सच्चाई को दबा न सके।

ढाई दशक से पत्रकारिता में हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया और जागरण में कई वर्षों तक काम किया। हर हफ्ते 'पहले दिन पहले शो' का अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद इनके नाम होता। 2001 से अभी तक यह क्रम जारी है और विभिन्न प्लेटफॉर्म के लिए फिल्म समीक्षा...