अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

भोली-भाली ग्रामीण युवती घटा उस लापरवाह युवक को न भूल सकी, जिससे तालाब पर उसकी भेंट हुई थी। यद्यपि वह युवक अधिक कुछ न बोला था, फिर भी उसकी ओर घटा का हृदय आकर्षित हो रहा था। आखिर क्यों…? यह उसके लिए प्रश्न-चिन्ह था।

‘बिटिया!’ घटा न जाने किन विचारों में तल्लीन थी कि भीखम चौधरी ने उसे पुकारा।

‘आई काका!’ कहती हुई वह बाहर की ओर लपकी।

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‘मचिया लाकर बाहर रख दे बिटिया, आज बड़े ठाकुर, फिर आ रहे हैं।’ भीखम ने कहा।

घटा की दृष्टि उधर जा पड़ीं, जिधर से एक विशाल हाथी झूमता हुआ चला आ रहा था और उसके आगे-पीछे थे पांच लठैत।

‘अभी तो परसों ही आए थे, वे काका? दूसरी बार इतनी जल्दी पहले कभी नहीं आए?’ घटा ने कहा।

‘कोई पेंचदार मामला आ पड़ा होगा। बिटिया—।’ भीखम बोला।

घटा ने मचिया लाकर दरवाजे पर रख दी और झोंपड़ी के अंदर जाकर चावल बीनने लगी।

‘अरे, यह तो छोटे ठाकुर हैं…।’ भीखम स्वतः ही बोला, फिर कई कदम आगे जाकर उसने छोटे ठाकुर का स्वागत किया।

‘जुहार छोटे ठाकुर!’

‘जुहार चौधरी काका!’ छोटे ठाकुर ने उत्तर दिया।

बड़े ठाकुर भी भीखम की जुहार का उत्तर देते थे, परंतु उसमें अहंकार का सम्मिश्रण होता था। छोटे ठाकुर की वाणी में भीखम को सहृदयता और अव्यक्त स्नेह का आभास मिला। कितना अपनत्व पूर्ण शब्द है यह—‘चौधरी काका!’

हाथी से उतरकर छोटे ठाकुर मचिया पर आसीन हुए। पांचों लठैत तथा कारिन्दा खड़े रहे।

‘किधर से भूल पड़े, छोटे सरकार?’ भीखम अदब के साथ सामने बैठकर बोला।

‘अभी तो चार रोज हुए आया हूं, चौधरी काका! तुम्हारा क्या हाल है…?’

‘सब ठीक है, छोटे ठाकुर! आप लोगों की कृपा पर जी रहा हूं।’

‘देखो…।’ छोटे ठाकुर कारिन्दा से बोला—‘इस गांव के सब आसामियों को तुम यहीं बुलवा लो।’

‘बहुत अच्छा…।’ कारिन्दा ने कहा और उसने पांचों लठैतों को यत्र-तत्र भेज दिया।

भीखम बड़े ध्यानपूर्वक छोटे ठाकुर की वेशभूषा देख रहा था। खद्दर का परिधान उस गोरे छरहरे युवक के बदन पर खूब फब रहा था। वह सोचने लगा—कितनी सादगी एवं सरलता है छोटे ठाकुर की बातचीत में।

बड़े ठाकुर तो सदैव कीमती सिल्क की मिर्जई पहने रहते हैं। आंखें उनकी लाल रहती हैं। पता नहीं क्रोध से, अभिमान से या नशे से।

घटा चावल बीन चुकी थी। वह कुछ पूछने के लिए अल्हड़ता-पूर्वक बाहर दौड़ी आई और पुकार उठी थी—‘काका!’

मगर छोटे ठाकुर पर दृष्टि पड़ते ही सहम गईं, चौंक पड़ीं और भागती हुई अंदर चली गईं।

छोटे ठाकुर ने भी घटा को देख लिया था। वह विचारों में डूब गया—कितना प्राकृतिक सौन्दर्य है उसके मुख पर। कितना आकर्षक यौवन लहरा रहा है उसके बदन पर। छोटे ठाकुर के नेत्र उसके सौंदर्य में अटक गए।

अन्दर जाकर घटा सोच रही थी—यह कौन है? यह तो वहीं युवक है, जो कल तालाब पर उसे मिला था, जिसे सतत प्रयत्न करने पर भी वह भूल न सकी थी, परंतु कल तो वह कुछ सनकी-सा लगता था, परंतु आज कितना खुशमिज़ाज, कितना सुंदर लग रहा है? मगर है वह कल वाला युवक ही। खद्दर के उसके कपड़े, इस बात के साक्षी हैं।

‘बड़ी शर्मीली है तू, बिटिया।’ भीखम ने घर में जाकर कहा। भीखम के लिए अपना कहने को इस दुनिया में केवल घटा ही थी।

‘कौन है काका, वे?’ घटा ने अत्यंत उत्सुक होकर अधीरता से पूछा।

‘छोटे ठाकुर है, बिटिया। एक लोटा गुड़ का रस बनाकर उन्हें पिला आ, तब तक मैं चिलम भर कर कारिन्दा साहब को पिला दूं।’

वह झट रस तैयार करने लगी। गुड़ का रस बनाकर उसमें थोड़ा-सा दही मिलाया, फिर लोटा लेकर सहमी-सहमी धीरे-धीरे बाहर आई।

छोटे ठाकुर अकेले मचिया पर बैठे थे। कारिन्दा किसी काम से चला गया था। महावत हाथी लिए दूर खड़ा था और भीखम घर में चिलम भर रहा था।

‘रस पी लीजिए…।’ छोटे ठाकुर के कानों में जैसे वीणा झंकृत हो उठी। घूमकर देखा—घटा हाथों में लोटा लिए खड़ी थी।

झटपट उसके हाथ से लोटा ले लिया। बोले—‘बड़ी तकलीफ की तुमने?’

बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में स्नेह भरकर, उसने उनकी ओर देखा। देखकर वह मुस्करा पड़ीं और लज्जायुक्त स्वर में बोली—‘इसमें तकलीफ क्या है?’

वाक-वीणा की झंकार से अद्भुत मिठास का सहारा पाकर छोटे ठाकुर के हृदय-तन्त्री के तार झंकृत हो उठे। उन्होंने अपनी आंखें उन शर्मीली आंखों में चुभो दीं।

एकाएक घटा चौंक पड़ीं छोटे ठाकुर की सुंदर लम्बी नाक देखकर। कल वाले युवक की नाक तो इतनी सुंदर तथा लम्बी नहीं थी। तो क्या वह कोई दूसरा था? नहीं-नहीं यही थे। शाम होने के कारण शायद ठीक से युवक की सूरत-शक्ल देख नहीं सकी थी।

‘कल मैंने आपको पहचाना नहीं।’ घटा ने अत्यंत ही नम्र स्वर में कहा।

घटा की यह बात छोटे ठाकुर की समझ में न आई। उन्होंने सोचा-सम्भव है इसने कल मुझे कहीं मेरी हवेली के आस-पास देखा होगा, उसी का जिक्र कर रही है। वह बोले—‘तुमने मुझे कभी देखा भी नहीं था, तो कैसे पहचान सकतीं। मैंने भी पहले तुम्हें कभी नहीं देखा था।’

‘यही बात है…।’ शरमा कर घटा बोली। अब उसे निश्चय हो गया कि यही थे कल उस तालाब के किनारे।

‘बहुत मीठा है यह गुड़ का शर्बत—।’ छोटे ठाकुर ने कहा। पता नहीं उनके कहने का लक्ष्य किस ओर था।

यह सुनकर घटा ने धीरे से कहा—‘शायद गुड़ ज्यादा हो गया है—।’

छोटे ठाकुर को उस अनपढ़ युवती में वाक्चातुर्य का आभास मिला। बोले—‘तुम्हारे पास गुड़ अधिक हो तो थोड़ा मुझे दे दो।’

‘परंतु आपको गुड नहीं, चीनी चाहिए—।’ व्यंग्य किया घटा ने।

‘गुड की मिठास को चीनी नहीं पा सकती, घटा।’ छोटे ठाकुर ने व्यंग का उत्तर व्यंग से दिया।

घटा का सारा बदन सिहर उठा और आंखों से मदिरा छलक पड़ीं।

‘तुम्हारा नाम?’ पूछा ठाकुर ने।

‘घटा।’

छोटे ठाकुर ने देखा, जैसे घटा के अवयव पर यौवन की मदमाती घटा छा गईं है और उसके अंग-अंग में मदिरा की मदहोशी भर उठी।

चिलम भरकर भीखम आ गया। घटा छोटे भकुर पर मधुर कटाक्ष करती हुई झोंपड़ी में चली गईं। कारिन्दा भी घूमता-फिरता आ पहुंचा।

‘लो कारिन्दा भैया। तमाकू पी लो—।’ भीखम ने कहा।

‘लाओ चौधरी। तुम्हारे यहां की तमाकू पीये भी बहुत दिन हो गए—।’ कारिन्दा बोला।

इतने में पांचों लठैत भी पांच आदमियों को पकड़े हुए आ पहुंचे। सब आसामी छोटे ठाकुर के सामने घुटने टेककर बैठ गए।

लठैत अदब के साथ खड़े हो गए और इस बात की प्रतीक्षा करने लगे कि यदि ठाकुर हुक्म दें, तो आसामियों पर दो-चार लट्ठ बरसा दें।

छोटे ठाकुर ने आसामियों की ओर देखा। गरीब कृषक थे वे लोग। धूप में काम करते-करते चमड़ी काली हो गईं थी, बदन सूख गया था, आंखों से करुणा टपक रही थी।

युवक-जमींदार का हृदय मोम-सा तरल था। उन निर्धनता की जीती-जागती तस्वीर को देख, उसका कलेजा थर्रा उठा। मुख से एक दीर्घ-श्वास सहसा निकल गईं।

‘तुम्हारा नाम?’ एक से पूछा ठाकुर ने।

‘जैकरन छोटे साकार।’ उसने कांपते हुए कहा।

‘देखो, इसके यहां कितना बकाया है?’ छोटे ठाकुर का यह हुक्म कारिन्दा के लिए था।

कारिन्दा बहीं देखकर बोला—‘नौ रुपए तेरह आने, छोटे ठाकुर!’

‘तुमने यह लगान क्यों नहीं दी?’ छोटे ठाकुर ने पूछा।

कृषक को छोटे ठाकुर की आवाज में सहानुभूति की झलक दीख पड़ीं। बड़े ठाकुर लगान अदा न करने का कारण नहीं पूछते थे। वे या तो अपना रुपया चाहते थे या लठैतों को मनमाने अत्याचार करने का हुक्म दे देते थे।

‘दुहाई छोटे सरकार—।’ बेचारा कृषक छोटे ठाकुर के पांवों पर गिर पड़ा—‘घर पर खाने भर को नहीं जुड़ता राजा! लगान देने की कौन कहे, पेट भरना भी भार हो रहा है, सरकार!’

‘कारिन्दा, इसे भरपाई की रसीद लिख दो…।’ छोटे ठाकुर ने कहा।

‘म…ग…र…रु…प…ये…।’ हकलाते हुआ बोला कारिन्दा!

‘रुपये मैंने माफ कर दिए।’ छोटे ठाकुर का स्वर गम्भीर था, कारिन्दा चौंक पड़ा।

लठैतों ने आश्चर्य के साथ एक दूसरे की ओर देखा।

भीखम चौधरी छोटे ठाकुर की सहृदयता पर अवाक् था।

कृषकों के नेत्रों ने आनन्दाश्रु निकल आए थे।

लाचार कारिन्दा ने रसीद काट दी। छोटे ठाकुर ने दस्तखत कर दिए।

‘धन्य हो छोटे राजा।’ गरीब कृषक आशीर्वाद देता हुआ रसीद लेकर चला गया।

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