Surya Dev and Karna Mythological Story
Surya Dev and Karna Mythological Story

Overview: सूर्य देव के वरदान से जन्मे कर्ण ने शुरू की सूर्य उपासना की परंपरा

कर्ण सूर्य देव के आशीर्वाद से जन्मे और जीवनभर उनकी उपासना की। सूर्य से तेज, शक्ति और दानशीलता पाकर वे सूर्यपुत्र और दानवीर कहलाए।

Mahabharata Karna Story: महाभारत में कर्ण को महत्वपूर्ण पात्र माना जाता है। कर्ण का चरित्र वीरता, दानशीलता और निष्ठा का प्रतीक है। कर्ण का नाम ऐसे योद्धा के तौर पर लिया जाता है, जोकि जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी निष्ठा, वीरता और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध रहे। इसके साथ ही कर्ण का जीवन केवल एक योद्धा और दानशीलता की कहानी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, श्रद्धा और आस्था से भी जुड़ा है। कर्ण सूर्य देव के सबसे बड़े उपासक माने जाते हैं। इतना ही कहा तो यह भी जाता है कि, सूर्य देव की उपासना की शुरुआत सबसे पहले कर्ण ने ही की थी।

कर्ण की जन्मकथा

Mahabharata Karna Story in Hindi
Mahabharata Karna Story in Hindi

योद्धा कर्ण के जन्म की पूरी कहानी महाभारत के आदिपर्व में विस्तारपूर्वक बताई गई है। लेकिन आज भी कई लोग यह नहीं जानते कि, कर्ण को सूर्यपुत्र क्यों कहा जाता है, जबकि शनि देव को हम सभी सूर्य पुत्र के रूप में जानते हैं। तो फिर महाभारत के कर्ण को सूर्य पुत्र क्यों कहा जाता है। इसके पीछे क्या कारण है, आइए जानते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार कर्ण का जन्म स्वयं सूर्य देव के आशीर्वाद से हुआ था। इसलिए उन्हें सूर्यपुत्र कर्ण भी कहा गया। कथा के मुताबिक, कर्ण की माता कुंती को ऋषि दुर्वासा से ऐसा वरदान मिला था जिससे वे किसी भी देवता को आह्वान कर संतान प्राप्त कर सकती थीं। तब कुंती ने सूर्य देव क स्मरण किया और उसी क्षण तेजस्वी बालक कर्ण का जन्म हुआ। इस प्रकार सूर्य कर्ण के मानस पिता हैं। सूर्य देव ने कर्ण को जन्म के समय ही कवच और कुंडल प्रदान किए, जो उसे अजेय बनाते थे।

सूर्य उपासना को कर्ण ने जन-जन तक पहुंचाया

karna surya upasana
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सूर्य देव की उपासना हम सभी करते हैं। प्रात:काल सूर्य देव को अर्घ्य देने के धार्मिक और ज्योतिष में कई लाभ बताए गए हैं। मान्यता है कि, सूर्य उपासना से मनुष्य के जीवन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और सफलता का प्रकाश बढ़ता है। कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत हो तो समाज में मान-सम्मान बढ़ता है, पिता के साथ संबंध अच्छे रहते हैं और नौकरी-व्यवसाय में सफलता मिलती है।

लेकिन सूर्य उपासना की शुरुआत कर्ण द्वारा मानी जाती है। सूर्य देव के प्रति कर्ण की उपासना इतनी प्रबल थी कि, उन्होंने न केवल स्वयं सूर्य उपासना की बल्कि इस परंपरा को जन-जन तक पहुंचाया। महाभारत के युद्ध में भी वे सूर्य की दिशा में खड़े होकर ही धनुष उठाते थे।


कर्ण ने बचपन से ही सूर्य देव को अपना आराध्य माना और जीवनभर उनकी उपासना की। कर्ण प्रतिदिन सुबह सूर्य की उपासना करते हैं। इसके लिए वे सूर्य के प्रकाश में कमर तक पानी में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को जल अर्पित कर अर्घ्य देते थे और मंत्रों का जाप करते थे। इतना ही नहीं, कर्ण ने यह संकल्प लिया था, जब वे सूर्य की उपासना कर रहे होंगे, तब उस समय उससे कोई भी कुछ भी मांगेगा तो वे कभी मना नहीं करते हैं। कर्ण द्वारा दान का ऐसा संकल्प लेने के कारण उन्हें दानवीर कर्ण के नाम से भी जाना जाता है।

मेरा नाम पलक सिंह है। मैं एक महिला पत्रकार हूं। मैं पिछले पांच सालों से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हूं। मैं लाइव इंडिया और सिर्फ न्यूज जैसे संस्थानों में लेखन का काम कर चुकी हूं और वर्तमान में गृहलक्ष्मी से जुड़ी हुई हूं। मुझे...