Social Story in Hindi: उस दिन मैं रसोई घर में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थी, बच्चों के स्कूल से आने का समय हो गया था। मेरी जेठानी और सासूमां के चेहरे पर एक अजीब सा डर मुझे भी डरा गया ।
वो दोनों कहीं जा रहीं थीं। पीछे से टोकना ठीक नहीं लगा पर मेरे मन की बात शायद जेठानी जी भांप गई और मेरे पास आकर धीरे से बोली…
” सुधा हम इंस्पेक्टर पांडे जी के घर जा रहे हैं। उनकी छोटी बेटी ने सुसाइड कर लिया है।”
इतना सुनना ही था कि मेरे हाथ से करछुल जमीन पर छन्न से जा गिरी और मेरे हाथ पैर कांपने लगे।
“संभालो अपने आपको सुधा। हमें पड़ोसी होने के नाते उनके घर जाना चाहिए। वहीं जाकर पता चलेगा कि सच्चाई क्या है ? आखिर ऐसा क्या हुआ जो लड़की ने आत्महत्या कर ली। मैं और मां जी अभी जा रहे हैं तुम बाद में चली जाना।”
“जी दीदी…”
“अरे! बड़की जल्दी चल। बात बाद में करती रहियो पहले जरा देख आते हैं क्या हुआ है पांडे के घर में। उसकी दुल्हनिया भी तो कल ही शहर गई है बड़ी बिटिया को लेकर। ना जाने ई छोटकी का कर बैठी। हमको तो अभी लाली की मां आकर बताई। काश ई बात झूठ ही हो। किसी की औलाद कभी ऐसा ना करें। कितना जतन से दोनों बिटिया को पढ़ा रहा था। बड़ी ही सुंदर और प्यारी है उसकी दोनों बेटी। छोटी वाली को तो भगवान फुर्सत में बनाया होगा। इतने सुन्दर नैन नक्श… मां दुर्गा सी ही दिखती थी।”
“हां मांजी चलिए…”
“तू ही बतिया के समय बिता रही है। मैं तो कब से कह रही हूं चलने को।”
“सुधा हम आ रहे हैं थोड़ी देर में.. तुम अपना ध्यान रखना। अंदर से ताला लगा लो गेट में।”
मां जी और मेरी जेठानी दोनों जा चुके थे और मैं धप्प से वहीं जमीन पर बैठ गई।
नैना ने आत्महत्या की… ये बात मेरे गले से उतर ही नहीं रही थी। ऐसा हो ही नहीं सकता उस जैसी हंसमुख खुशमिजाज लड़की ऐसा कदम उठा ही नहीं सकती।
मैंने उठकर पानी पिया और अपना चेहरा ठंडे पानी से धोया। एक नजर घड़ी पर डाली तो देखा बस आधा घंटा ही बाकी था बच्चों के आने में। मैंने फटाफट कूकर में दाल सेट की और एक तरफ चावल चढ़ा दिए। सब्जी काटने बैठी तो उसका वो हंसता चेहरा सामने आ गया। दो दिन पहले ही तो देखा था उसे जब मैं सब्जी लाने निकली थी।
“नमस्ते मैम आजकल आप सुबह बस स्टॉप पर दिखती नहीं हैं।”
उसने ही पूछा था मुझसे।
“हां अब स्कूल की नौकरी छोड़ दी है पर लेखन कार्य जारी है। जब भी समय मिलता है कविता कहानी लिख लेती हूं और कभी कभी कहीं छप भी जाता है किसी अखबार या पत्रिका में मेरा लिखा कोई आर्टिकल या कहानी।”
” वाह मैम यह तो बहुत अच्छी बात है पर आपको अपनी नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए थी। कितना अच्छा है वो स्कूल जहां आप पढ़ाती थी। आपकी तो सैलरी भी अच्छी थी फिर आपने वो जॉब क्यों छोड़ी। जॉब करते हुए भी तो आप अपना लेखन जारी रख सकतीं थीं। आपके कुछ आर्टिकल मैंने भी पढ़ें हैं। सच आप बहुत अच्छा लिखतीं हैं।”
“बस ऐसे ही। जॉब के साथ घर और बच्चों को संभालना मुश्किल हो रहा था। सराहना के लिए थैंक्स नैना।”
वो मुझसे बहुत घुल मिल गई थी। पड़ोसी कम एक टीचर और एक दोस्त की तरह ही मुझे देखती।
इस बार बारहवीं में थी। वो सत्रह साल की चंचल मृगनैनी ना जाने कब मेरे मन में अपने लिए जगह बनाती गई। उससे हर सुबह बस स्टॉप पर ही मिलना होता था। कभी उसकी बस पहले आती तो कभी मेरी। उसे देखकर लगता था काश! मेरी भी बिटिया होती तो ऐसी ही होती।
कई बार तो वो मेरे स्कूल की बस को तब तक रुकवा कर रखती जब तक मैं बस स्टॉप पर पहुंच ना जाती। मेरा नंबर भी उसने सुधा मैम के नाम से ही सेव कर रखा था।
“जल्दी कीजिए मैम बस आपका वेट कर रही है।”
मुझे उसका मेरी इस तरह फिक्र करना बहुत अच्छा लगता था।
,,पर कुछ महीनों से उसमें बदलाव साफ नजर आ रहा था। अब वो अपनी स्कूल बस में ना जाकर एक ऑटो से जाया करती थी। दो लंबी चोटी की जगह अब उसके लंबे बाल खुले ही रहते। उसकी स्कर्ट की लंबाई भी घुटनों से ऊंची हो गई थी। ऐसा लगता था उसने खुद ही अपनी स्कर्ट को छोटा किया था।
एक लड़का जो उम्र में उससे काफी बड़ा दिखता था ऑटो में पीछे की सीट पर बैठा रहता था। अब उसने मुझसे बात करना भी बहुत कम कर दिया था। उसकी चंचलता धीरे धीरे कम होती जा रही थी। मुझे यह बात थोड़ी अजीब लगती थी कि वो बस कंडक्टर को रोज क्या कहकर मना करती थी जो वो एक कुटिल मुस्कान बिखेर नैना को ऊपर से नीचे ऐसे घूरता जैसे वो कोई विशेष पकवान हो जो किसी दिन उसे भी परोसी जाएगी।
यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा फिर घर में कुछ ऐसी परिस्थितियां आई कि मुझे अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। अब उससे कभी कभार ही मिलना हो पाता था।
नैना के पिता इंस्पेक्टर हैं और उससे बड़ी एक बहन और एक छोटा भाई है। उसकी मां बहुत ही शांत स्वभाव की है। गली में किसी से बातें करते बहुत कम ही देखा है। हमारी गली में ही रहते हैं पर उनके घर आना जाना कम ही होता है। किसी पूजा या फंक्शन में न्योता आता है तो घर से कोई चला जाता है पर मेरा तो नैना से मिलना रोज सवेरे हो जाता था। बहुत ही प्यारी लगती थी। जैसा नाम वैसे ही उसके मृगनयनी आंखें किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेती थी।
कूकर की सीटी की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई और मैं नैना के ख्यालों से निकलने की नाकामयाब कोशिश में किचन के काम में जुट गई।
थोड़ी देर बाद जब जेठानी और सासू मां आईं तो मेरी जेठानी ने जो बताया मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
“लड़की को किसी ने जहर देकर मारा है उसकी बॉडी देखकर साफ लग रहा था। शरीर नीला पड़ चुका है और फूल गया है कि उसकी जींस पैंट को काटकर निकाला कुछ औरतों ने फिर जाकर उसके कपड़े बदलने में मैंने भी मदद की।”
मैंने कांपते स्वर में पूछा था…
” उसकी मम्मी आ गई?”
“नहीं अभी तक नहीं आई है। शायद कल शाम तक पहुंचे तब तक उसके पिता इंतजार नहीं करेंगे। वो तो गली के लोगों को भी नहीं बुलाना चाहते थे पर छोटे बेटे ने ही पड़ोस वाली लाली की मां को बताया कि हमारे घर आकर देखिए चाची मेरी दीदी को क्या हुआ।”
मेरी सासूमां ने फुसफुसाते हुए कहा…
“जानती है कनिया गली में सब यही बोल रहे हैं कि लड़की का चक्कर किसी लड़के से था जो उसके पिता को पता चला तो उसने बेटी को डांटा मारा फिर भी जब वो लड़के से मिलने गई तो उसे जान से मार दिया कोल्डड्रिंक में जहर डालकर।
उसका बाप सब इंस्पेक्टर है और उसका रुतबा बहुत ऊंचा है उसके खिलाफ कोई नहीं बोल सकता।”
मुझे वहां का आंखों देखा हाल बताने के बाद दोनों नहाने के लिए चली गईं।
यह तो मैं भी जानती थी कि वो अपने पिता की लाडली बिटिया थी। अपने तीनों बच्चों में सबसे ज्यादा उसे ही मानते थे।
मेरी जब कभी रास्ते में नैना के पिता से मुलाकात होती और मैं अपने सिर पर आंचल रख उन्हें प्रणाम करती तो बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखते और कहते थे…
“जानती हो सुधा बहू मैं अपनी बच्चियों को आपकी तरह ही संस्कारी बनाना चाहता हूं। आप इतना पढ़ी लिखी होकर भी जिस तरह अपने ससुराल वालों का मान सम्मान करती हो उसी तरह के संस्कार मैं भी अपनी बच्चियों में भरना चाहता हूं। अपनी छोटी को तो आइ पी एस की पोस्ट पर देखना चाहता हूं।”
नैना मचलते हुए अपने पिता के गले लग जाती।
“पापा मैं भी आपके जैसी ही बनूंगी।”
मुझे अपने पापा की याद आ जाती जब भी मैं नैना को उसके पिता के साथ देखती।
नैना से जब भी मिलती तो उसके आंखों की चमक में मैं खो जाया करती। ढेरों सपने बसे थे उसकी आंखों में।
अचानक ये क्या हो गया। एक पिता ने अपनी बेटी को मार दिया सोचकर ही देह सिहर उठता है जिसे वो अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था उसे कैसे जहर दे सकता है।
अगर नैना ने आत्महत्या की है तो उसके पीछे कोई बहुत बड़ी वजह रही होगी।
मेरा लेखक मन मुझे बार बार कह रहा था सुधा उठा कलम और लिख डाल एक ऐसी कहानी जो नैना को इंसाफ दिलाने में मदद करे या ना करे लेकिन समाज के ऐसे लोगों तक जरूर पहुंचे जो अपनी इज्जत और रुतबा बनाए रखने के खातिर अपने ही खून का खून कर डालते हैं। वरना उसकी आत्मा भटकती रहेगी। ओनर किलिंग के नाम पर कोई और कुर्बान ना हो।
मैं जानना चाहती थी कि आखिर सच्चाई क्या है अगर उसके पिता ने ही उसकी हत्या की है तो ऐसे इंसान को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए।
मेरी जेठानी मेरी मनःस्थिति भाप गई थी। वो मुझे समझा रही थी…
” सुधा जो हो गया उसका कुछ नहीं कर सकते। भलाई इसी में है कि हम चुप रहें। वो लोग बहुत ही पावरफुल हैं उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अगर हममें से किसी ने भी इस संदर्भ में कुछ बोला तो वो हमें ही इस केस में ना फंसा दें इसलिए कहती हूं तुम शांत रहो और उनके बारे में ज्यादा मत सोचो।”
अगले दिन नैना की मां और बड़ी बहन भी आ गई थीं अपने घर पर तब तक उसके पिता ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया था।
अपनी बेटी की शादी के सपने देखने वाली उसकी मां उसकी इस दुनिया से अंतिम विदाई पर भी शामिल ना हो पाई। उसकी आंखों के आंसू सूख चुके थे।
जब मैंने उसे देखा तो एक पल के लिए लगा वो भी इस साज़िश में शामिल थी और उसे पता था कि उसके पति उसकी बेटी नैना को मारने वाले हैं।
दोनों मां बेटी को एक दिन पहले ही शहर से बाहर भेज दिया था इंस्पेक्टर पांडे ने और छोटा बेटा भी उस समय कोचिंग सेंटर गया हुआ था जब नैना की मौत हुई।
बड़ी बेटी डरी सहमी सी दिखी। ऐसा लग रहा था अगर वो कुछ बोलेगी तो नैना की तरह वो भी मौत के मुंह समा जाएगी। वो भी सच जानती थी पर उसने किसी से कुछ बताना सही नहीं समझा या उसे डराया धमकाया गया था यह तो ऊपर वाला ही जाने।
गली वालों ने भी जैसे अपना मुंह सिल लिया था। सच सबको पता था पर कोई कुछ नहीं बोल सकता था।
वो नैना जो हमारी गली की शान हुआ करती थी , जिसकी खिलखिलाती हंसी सुनने के लिए मैं अपनी बॉलकनी में आकर बैठ जाया करती थी। वो चेहरा वो हंसी मेरे जेहन में बुरी तरह समा गई थी। मैं भूलकर भी उसे नहीं भूल पा रही थी।
उस दीवाली पर दिया नही जला उनके घर पर जहां हर साल दीवाली पर उनकी महलनुमा कोठी पूरी चमक उठती थी। हमने और गली में सभी ने अपने घरों के बाहर रोशनी नहीं की। बच्चों को बम पटाखे छोड़ने से भी मना किया।
उस घटना के दो महीने बाद ही हमारे घर उनकी बड़ी बेटी की शादी का कार्ड आया।
मैं हतप्रभ थी कि ऐसा कैसे हो सकता है कि छोटी बेटी कि चिता को जिस पिता ने दो महीने पहले ही मुखाग्नि दी है वही उन्हीं हाथों से अपनी बड़ी बेटी का कन्यादान करने को तैयार हैं।
कुछ तो बहुत बड़ा राज छिपा रहा है ये परिवार। पर इस परिवार के उस राज से पर्दा उठाने की हिम्मत कौन कर सकता है।
इस घटना के चौदह वर्ष बीत गए और लगभग सभी भूल भी गए हैं नैना को पर मैं उसे भूल ही नहीं पा रही।
कुछ दिन पहले मुझे रास्ते में उसकी बड़ी बहन दिशा मिली तो उसने मुझे नमस्ते करने के बाद मेरे हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज इधर-उधर देखने के बाद दिया।
मैंने उससे पूछा भी…
” दिशा सब ठीक तो है। तुम ठीक हो, कोई परेशानी तो नहीं।अगर अभी तुम्हारे पास समय है तो चलो मेरे साथ तुमसे कुछ बात करनी थी।”
“आंटी आप प्लीज इसे पढ़ लीजिएगा। अभी जल्दी में हूं, किसी ने देख लिया मुझे आपसे बात करते हुए तो मुसीबत आ जाएगी।”
“तुम इतना डरी सहमी क्यों रहती हो। ससुराल में सब ठीक तो है।”
“सब ठीक है आंटी। आपके सवालों का जवाब इस खत में मिल जाएगा। मैं अभी मम्मी से मिलने जा रही हूं।”
वो चली गई और मैं घर आकर घर के काम निपटाने के बाद उस कागज को खोलकर बैठ गई।
नमस्ते आंटी,
मैं आपको यह बात कई साल पहले ही बताना चाहती थी कि नैना ने आत्महत्या नहीं की है उसने तो मुझे बचाने के लिए खुद को मौत के हवाले कर दिया। आरव से मुझे प्यार हो गया था और मैं बहक गई थी। बाद में उसने नैना को भी परेशान करना शुरू कर दिया था। मैं उसके बच्चे की मां बनने वाली थी इस बात का सिर्फ नैना को पता था। उसने ही मुझे पापा के हाथ से बचाया लेकिन वो नहीं बच पाई।
पापा ने एक दिन आरव को मेरे कमरे में मेरे साथ देख लिया था। जब पापा को पता चला कि एक लड़का हमारे कमरे में है तो उसने मुझे वहां से बाहर भेज दिया और सारा इल्ज़ाम खुद पर ले लिया कि आरव के साथ वो थी ना कि मैं। फिर मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए उसने ही जाने को कहा था। मम्मी को भी मेरे साथ उसी ने भेजा था।
मेरे पापा बहुत ही गुस्से वाले हैं। उन्होंने नैना को पहले खूब मारा फिर उसे जहर देकर जान से ही मार डाला।
उसकी मौत के दो महीने बाद ही मेरी शादी करवा दी अपने ही एक दोस्त के बेटे से। आरव सही लड़का नहीं था इस बात का मुझे भी देर से पता चला। मेरी बहन की असली कातिल मैं ही हूं। मैं कभी खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी।
अपनी बहन नैना की हत्यारिन दिशा
मेरे हाथ से वो कागज जमीन पर जाकर गिरा।
आज सालों से चल रहे सवाल का जवाब मुझे मिला गया था। इस खत में नैना की मौत का छिपा हुआ राज अब मैं जान गई थी ।
मैं जरूर नैना की ये कहानी लिखूंगी मन में ठान लिया था। एक बहन ने अपनी बहन की खातिर मौत को गले लगा लिया। मेरी कलम पन्ने दर पन्ने चलती गई।
“सुधा ये देख इस मैगजीन में तेरी लिखी यह कहानी प्रकाशित हुई है। आखिर तूने उस लड़की की कहानी लिख ही डाली। बस उन लोगों तक ना पहुंचे।”
“दीदी एक लेखक का कर्तव्य निभाया है मैंने। बहुत इंतजार किया है नैना की भटकती आत्मा ने।”
मैंने आसमान की तरफ देखा तो लगा जैसे नैना की दो आंखें मुझे ही देख रहीं हैं और उसमें कृतघ्नता दिखाई दे रही थी। वो आंखें बोलती सी प्रतीत हो रही थीं…
“थैंक्यू मैम।”
मैंने अपनी आंखें बंद की और मन ही मन उससे माफी मांगी। तुम्हारी इस कहानी को लोगों तक पहुंचाने में बहुत देर कर दी मैंने। चौदह साल लग गए इसे लिखने में माफ करना नैना।
