Umeed ka Dipak
Umeed ka Dipak

Hindi Kahani: ” अरे अभिनव जी मैं बाहर जा रही हूं , आप घर का ध्यान रखना मुझे वापिस आने में थोड़ा समय लग सकता है आप चिंता नहीं करना और कोई आता है तो उससे बोल देना कल आना मुझसे मिलने मैं आज थोड़ा व्यस्त हूं इसलिए बाहर गई हूं आप सुन रहे हैं ” घर के बगीचे में खड़े होकर घर की मालकिन कुसुम जी अपने ऊपर वाले कमरे में रहने वाले किराएदार अभिनव से यह सब बोल रही थीं। अभिनव अपने कमरे में कुर्सी पर बैठकर अपने ख्यालों को लिखने की कोशिश कर रहा था उसने यह सब सुनकर कुर्सी पर बैठे हुए कहा – ” जी ठीक है “। कुसुम जी कहती हैं – ” ईश्वर का और आपका बहुत – बहुत आभार है कि आपकी आवाज आज दो हफ्ते बाद मुझे सुनने को मिली है “। इतना कहकर कुसुम जी चली जाती हैं और अब पूरे घर में सिर्फ अभिनव और उसके ख्याल ही थे। अभिनव थोड़ी देर बाद अपनी कुर्सी से उठकर रसोईघर में चाय बनाने लगता है और फिर चाय का कप लेकर बालकनी का दरवाजा खोलकर बालकनी में आ जाता है बालकनी में ठंडी हवाओं का स्पर्श और चाय की चुस्कियां अभिनव को ताजगी से भर रही थीं अभिनव कुछ पलों के लिए अपने ख्यालों को भूल गया था वह देख रहा था कि कुछ घंटों पहले तेज धूप वातावरण को जला रही थी गर्मी से सब परेशान थे और अब सबकुछ सुहावना हो गया है ” आशा की किरण ” शायद इसे ही कहते हैं जो ” उम्मीद का दीपक ” जलाती है।

काश मेरा भी जीवन जो अभी गर्मी रूपी परेशानियों से भरा हुआ है कोई उसे ठंडी हवाओं और चाय की चुस्कियों के साथ में ताजगी से भर दे। मेरे जीवन में ” उम्मीद का दीपक ” जलाने के लिए कोई ” आशा की किरण ” होती। तभी हल्की बारिश के साथ में एक लड़की घर के बगीचे के दरवाजे को खोलते हुए अंदर आती है उसे देखकर अभिनव कहता है – ” जी आप कौन हैं और क्या काम है ” ? लड़की कहती है – ” जी मेरा नाम पार्वती है और मैं नीचे वाले कमरे में नए किराएदार के रूप में आई हूं। आप कौन हैं ” ? अभिनव कहता है – ” आपको पहले कभी नहीं देखा और मेरा नाम अभिनव है यहां ऊपर वाले कमरे में रहता हूं। नए किराएदार के रूप में। पार्वती कहती है – जी , आप हैं अभिनव जो अपनी ही दुनिया में रहते हैं कुसुम जी ने बताया था मुझे वो अभी रास्ते में मुझे मिली थीं। आपको अच्छा लगे तो एक कप चाय मुझे पिला सकते हैं “। अभिनव कहता है – ” जी आइए ऊपर मैं आपको एक कप चाय पिलाता हूं। 

कुछ ही पलों के बाद अभिनव के कमरे पर दस्तक होती है अभिनव दरवाजा खोलता है सामने पार्वती खड़ी होती है। अभिनव उसका स्वागत करते हुए कुर्सी पर बैठने को कहता है और फिर चाय के दो कप लेकर टेबल पर रख देता है दोनों चाय पीने लगते हैं पार्वती कमरे को देखकर अभिनव से कहती है – ” ऐसा लगता है कि आपके जीवन में ” आशा की किरण ” की आवश्यकता है जो आपके जीवन में ” उम्मीद का दीपक ” जलाकर आपको ज़िंदगी का आनंद लेना बताए “। अभिनव कुछ पलों के बाद पार्वती से पूछता है – ” जी आपको यह सब कैसे पता चला ? पार्वती कहती है – ” कमरे की हालत देखकर कोई भी बता सकता है किताबें जमीन पर रखी हुई हैं और कपड़े देखें सूरज की किरण भी नहीं आ सकती खिड़की और दरवाजे सभी बंद रहते हैं। अभिनव थोड़ा शर्मिंदा होता है। पार्वती यह देखकर कहती है – कोई बात नहीं अगले हफ्ते फिर चाय पर बुलाना और कृपया कमरे को व्यवस्थित रखना मैं चलती हूं “। पार्वती चली जाती है अभिनव कमरे को देखता है और फिर उसे व्यवस्थित करना शुरु कर देता है। 

अभिनव सिर्फ कमरे को व्यवस्थित नहीं कर रहा था वह अपने मन और जीवन को भी व्यवस्थित कर रहा था। कमरे को व्यवस्थित करने के बाद अभिनव बाजार जाता है और कुछ किताबें खरीदने लगता है तभी उसे एक विज्ञापन नज़र आता है जिसमें एक सरकारी नौकरी के बारे में बताया गया था। अभिनव जो पिछले कुछ सालों से सरकारी नौकरी की तलाश में था उसे ” उम्मीद का दीपक ” मिल गया था जो उसके जीवन को बेहतर बनाने के लिए मार्गदर्शन कर रहा था। अभिनव का जीवन उसके कमरे की तरह था उदास , परेशानियों और अवसाद की काली छाया , सफलता की चाहत में उसने जीना ही छोड़ दिया था सभी रिश्तों और दोस्तों से संबंध तोड़कर इस नए शहर में अपनी असफलता के साथ अकेले रह रहा था। मगर जिस प्रकार पार्वती ने ” आशा की किरण ” बनकर उसके कमरे को जीवन दिया ठीक उसी प्रकार उसके जीवन को इस विज्ञापन ने नया जीवन दिया था। अभिनव विज्ञापन और किताबों को लेकर खुशी से झूमता हुआ घर पहुंचता है। कुसुम जी उसे देखकर कहती हैं – क्या हुआ शायद चाय ज्यादा अच्छी बनी है “। 

कमरे में जाकर अभिनव पढ़ाई करना शुरू कर देता है बाहर बारिश होने लगती है अभिनव खिड़कियों और दरवाजों को खोलकर मौसम को देखकर और मुस्कुराकर अपनी पढ़ाई में लग जाता है अभिनव पूरे जोश और उत्साह के साथ में पढ़ाई करता है वह अपने ख्यालों को नई दिशा देने लगता है जो निरंतर उसकी पढ़ाई और मन को ताकतवर बना रहे थे। उसका व्यवहार बहुत अच्छा होने लगा था कुसुम जी उसे देखकर मुस्कराने लगती हैं और उससे पूछती हैं – ” क्या हुआ अभिनव जी आजकल आप बहुत अलग नजर आ रहे हैं कोई बात है क्या ” ? अभिनव कुछ बहाने बनाकर कहता – ” जी मौसम अच्छा है बस इसलिए “। समय निकलता गया और अभिनव ने सरकारी नौकरी की परीक्षा देकर उसमें उत्तीर्ण भी कर लिया। एक अनजान व्यक्ति ने उसके जीवन में ” उम्मीद का दीपक ” जलाकर ” आशा की किरण ” दिखाई। मगर वह पार्वती से मिल नहीं पाया क्योंकि पार्वती शहर छोड़ चुकी थी।