Deepaj Jalta Raha
Deepaj Jalta Raha

Hindi Best Story: उस दिन से उनके बीच एक सन्नाटा पसर गया। रीता और राजेश ने अब कमरे में ही खाना शुरू कर दिया था। हर्षा को भी वह लोग अब उसके पास आने से रोकने लगे थे। मां और बेटे के बीच अब औपचारिकता का रिश्ता रह गया था।

गेट से बरामदे तक आते-आते कांता के पैर मन-मन भर के हो गये। उससे चला नहीं जा रहा था। वह
वहीं पड़ी आराम कुर्सी पर बैठ गई। पास में, हर्षा कि गुड़िया पड़ी हुई थी, जो जाते समय रीता वहीं फेंक गई थी। उसने वो गुड़िया उठा ली और उसको सहलाती रही। थकान के अजगर ने उसको जकड़ लिया था। गुड़िया सहलाते हुए उसे लगा जैसे उसकी पोती हर्षा कह रही है, ‘दादी कहानी सुनाओ ना! सुन कर वह हंस पड़ी, ‘इस समय कहानी! अरे मामा रास्ता भूल जायेंगे। यह सुन कर हर्षा खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘दादी तुम कितनी बुद्धू हो। मेरे मामा अमरीका में रहते हैं। उनके पास फोन है। रास्ता भूलेंगे
तो फोन कर लेंगे। दादी कहानी सुनाओ ना! कहती-कहती वह ठुनकने लगी।

‘अच्छा रो मत सुनाती हूं कहानी। तेरी बातों से कोई जीत सकता है जो मैं जीत जाऊंगी। सुन- एक राजा था, एक रानी थी। उनका एक बहुत प्यारा बेटा था। बड़ा होकर वह सात समुंदर पार चला गया और वह फिर कभी लौट कर नहीं आया। राजा रानी इंतजार करते रहे, करते रहे। अरे यह तो सो गई कांता ने रामू को आवाज दी, ‘रामू-रामू। रामू आवाज सुन कर दौड़ा आया।

‘ले जाकर इसे सुला दे कमरे में रामू हर्षा को उठा कर उसे कमरे में सुला आया। जाते हुए रामू से कांता ने पूछा, ‘भईया आ गए? रामू ने जबाब देते हुए कहा, ‘हां अभी-अभी आए हैं। अपने कमरे में गए हैं।

यह सुन कर कांता हतप्रभ रह गई। आज जीवन में पहली बार वह सीधा अपने कमरे में गया था। नहीं तो हमेशा वह पहले सीधा मां के पास आता था दिन भर कि बात बता करके उनके हाल पूछता था।
वहीं पर कपड़े बदल कर गपशप करते हुए खाना खाते थे। फिर उसके कमरे में आकर सब एक कप चाय पी कर रीता और राजेश अपने कमरे में जाते थे। आज ऐसे सीधे कमरे में जाने की बात सुन
कांता चिंतित हो गई। उसकी तबीयत ठीक है ना सोचते-सोचते वह उनके कमरे की तरफ बढ़ी। अभी वह दरवाजे पर ही पहुंची थी कि उसके कानों में रीता के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी जो राजेश से
कह रही थी, ‘तुम्हारी मां अनोखी मां है जिसे तुम छोड़ कर नहीं जा सकते। मेरी मां पांच साल से अकेली रह रही हैं ना। मेरे भाई-भाभी भी अभी तक सिर्फ एक बार इंडिया आए हैं। बच्चों के लिए मां
बड़े-बड़े त्याग करती है। तुम्हारी मां की तरह नहीं बच्चों की उन्नति में बाधा बन जाए। कितने दिनों से तुम कोशिश कर रहे थे, अब जाकर तुम्हारा प्रमोशन हुआ है। कितने लोग इसके लिए कोशिश कर रहे थे, सबको पीछे छोड़ तुमने अपनी मेहनत से ये पद पाया है।’

कांता के हाथ रुक गये। वह थके-थके कदमों से अपने कमरे में आ कर बेड पर पड़ गई। उसकी खाने की इच्छा खत्म हो गई थी। आधा घंटे बाद रीता और राजेश उसके कमरे में आए। दोनों आंखों-आंखो
में बात कर रहे थे। वह सब जानती तो थी पर अंजान बन कर पूछा, ‘क्या बात है?
दोनों कुछ कहना चाहते हो पर कह नहीं पा रहे हो। मां से इतना संकोच कैसा। यह सुनकर राजेश ने कहा, ‘उसका प्रमोशन हो गया है। पंद्रह दिन बाद उसे परिवार के साथ अमरीका जाना है।

आपकी चिंता है। अकेली कैसे रहेंगी। हम दोनों ने एक उपाय सोचा है कि आप वृद्धाश्रम चली जाइए। इस मकान को किराए पर उठा देंगे।
यह सुन कर कांता को बहुत गुस्सा भी आया और दुख भी हुआ। थोड़े तिक्त स्वर में उन्होंने कहा, ‘मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे पापा जब गुजरे थे तब तुम बीए. कर रहे थे। मैंने अकेले तुम्हें पढ़ाया-लिखाया। तुम्हें आत्मनिर्भर बनाया। तुम्हारी शादी की। पूरा घर संभाला और बाहर भी काम किया। मैं अकेली आराम से स्वयं को और घर को सम्हाल सकती हूं। कुछ क्षण चुप रहने के बाद उन्होंने पूछा, ‘तुम लोगों ने खाना खा लिया? दोनों ने एक-दूसरे का मुंह देखा फिर रीता बोली, ‘नहीं आज इनकी ऑफिस में पार्टी थी इन्होंने वहां खा लिया और ये मेरे लिए बाहर से लेकर आए थे
तो मैंने वह खा लिया।’ आज दोनों ने पहली बार उनसे खाने का नहीं पूछा था। बात करके दोनों अपने कमरे में चले गए।

उस दिन से उनके बीच एक सन्नाटा पसर गया। रीता और राजेश ने अब कमरे में ही खाना शुरू कर दिया था। हर्षा को भी वह लोग अब उसके पास आने से रोकने लगे थे। मां और बेटे के बीच अब औपचारिकता का रिश्ता रह गया था। कांता सोचती थी कि इसी दिन के लिए उसने इतने व्रत उपवास किए। कितने मन्दिर गई। कहां-कहां माथा नहीं टेका। जब राजेश हुआ था, कितना बड़ा जलसा किया था। जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे थे। राजेश के लिए उन्होंने अपना जॉब छोड़ दिया था। राजेश के पापा ने कहा भी था, आया है और रामू भी तो है लेकिन उन्हें किसी पर विश्वास नहीं था। आज वही राजेश अपने प्रमोशन के लिए उसे छोड़ कर जाने को तैयार था और तो और साथ में खाना-पीना सब छोड़ दिया था। यहां तक कि अब हर्षा को भी आने नहीं देते थे। हर्षा का रोक देना उन्हें बहुत कष्ट दे
रहा था।

‘आप यहीं पर बैठी हैं अभी तक? चलिए कमरे में चलिए। रामू की आवाज से कांता की तंद्रा भंग हुई। आज राजेश, रीता और हर्षा चले गए थे। जाते समय हर्षा गुड़िया के लिए रो रही थी, पर रीता उसे बरामदे में ही फेंक कर चली गई थी। रीता का व्यवहार कांता को अंदर तक तोड़ गया था। पहले कांता
ने सोचा कि यह गुड़िया अलमारी में रख दे पर फिर रामू को बुला कर वह गुड़िया उसे दे कर कहा कि ‘ये गुड़िया वो किसी को दे दे। उन्होंने रामू से खाना खाने को मना कर दिया। रामू ने पूछा, ‘चाय बना दूं। आप चाय और बिस्कुट खा लीजिए।’ रामू का चेहरा देख वह उसे मना नहीं कर पाई। चाय पी कर वह लेट गई। पूरी रात वह सो नहीं सकी। पूरी रात वह सोचती रही। सुबह चार बजे उनकी आंख लगी।

सुबह आठ बजे उनकी आंख खुली। रात भर सोचने के बाद कांता एक निर्णय पर पहुंच चुकी थी। उन्होंने रामू को बुला कर अपने विचार बताए। रामू ने कहा कि, ‘यह तो बहुत अच्छी बात है। घर में
चहल-पहल तो रहेगी ही साथ ही साथ आपका समय भी कट जाएगा और आमदनी भी होगी। कांता ने कहा कि ‘आमदनी भूल जाओ। हमारे पास पैसा कम नहीं है। मैंने ये सब जरूरतमंदों की सेवा के लिए सोचा है। तुम आस-पास गरीब जरूरतमंद को बता देना। मैं जल्दी से जल्दी ये काम शुरू कर देना चाहती हूं।

रामू और कांता के अथक प्रयास से उन्होंने घर पर गरीब बच्चों को पढाने के साथ-साथ अनाथ बच्चों के लिए अपने घर के दरवाजे खोल दिए। धीरे-धीरे दस बच्चे हो गये थे। आस-पास के कुछ ऐसे व्यक्ति भी उनमें शामिल हो गये जिनके पास पैसा तो था पर उनके अपने बच्चे उन्हें छोड़ विदेश चले गये थे और मुड़ कर भी नहीं देखा था। वह सब भी कांता के अभियान से जुड़ गए।

कांता का घर अब ओल्ड एज होम के साथ अनाथ बच्चों का आशियाना हो गया था। दो मंजिल का मकान अब पूरा भर गया था। कांता ने अपने घर को एक नया नाम ‘आशियाना’ दिया। पास के मकान के रागिनी और अशोक जो बिल्कुल अकेले अपने सात कमरों के घर में रहते थे
उन्होंने भी अपना घर आशियाना के साथ जोड़ दिया।

आज कांता अनेक राजेश और रीता की मां ही नहीं बनी थी बल्कि वह एक उदाहरण बन गई थी कि स्वाभिमान के साथ ना केवल अकेले रह सकते है बल्कि दूसरों को भी सहारा दे सकते हैं।
जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं होता है। जरूरत केवल दृढ़ इच्छा शक्ति की है। उम्र कभी बाधक नहीं बन सकती। एक दीपक जलाओ हजारों हाथ साथ में दीपक जलाने के लिए तैयार रहते हैं। राजेश ने
जब यह सुना तो वह अपने व्यवहार पर बहुत शर्मिंदा हुआ। रीता की मां भी अपना घर बेच उनके पास रहने ही नहीं आई बल्कि घर बेच कर जो पैसा मिला उसे भी समाज सेवा में लगा दिया। आज वह
लज्जित थी कि उन्होंने अपनी बेटी को गलत सीख दी थी।

Hindi Best Story
deepak jalta raha

कांता ने अपने कार्य से अनेक अनाथ बच्चों के जीवन में शिक्षा और उन्नति के दीपक जला दिए थे। वह अपने जैसी अनेक परिवारों की बहन, भाभी बन गई थी जिनके बच्चे अपनी उन्नति के लिए
उस समय उनको अकेले छोड़ जाते हैं जब उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। आज उसका जीवन रोशनी से जगमगा रहा था। कांता ने नारी शक्ति का परिचय देते हुए बता दिया था कि औरत बच्चे पैदा कर उन्हें बड़ा कर सकती है तो वह कभी लाचार नहीं हो सकती है। बच्चों पर आश्रित रह कर स्वयं को लाचार दिखाना कमजोरी है। काम करते रहने से बीमारी भी दूर भागती है। जहां चाह वहां राह की
उक्ति चरितार्थ करती कांता अब दूसरों के लिए आदर्श बन गई थी। उनके जीवन का अंधेरा छट गया था और प्रकाश फैल चुका था।

तुम्हारी मां अनोखी मां है जिसे तुम छोड़ कर नहीं जा सकते। मेरी मां पांच साल से अकेली रह
रही हैं ना। मेरे भाई-भाभी भी अभी तक सिर्फ एक बार इंडिया आए है। बच्चों के लिए मां बड़ेबड़े त्याग करती है। तुम्हारी मां की तरह नहीं बच्चों की उन्नति में बाधा बन जाए।