Hindi Vyangya: वे अब किसी की नहीं सुनते। प्रभु बहरे होते हैं। उनके दर्शन भी दुर्लभ हो गये हैं। प्रभु अंतर्यामी होते हैं। कभी मिल गये तो ऐसे देखते हैं मानो हम किसी दूसरे ग्रह से उतरे हुए प्राणी हैं। उन्होंने मुझे घूरा और जैसे मेरी गरेबान पकड़ ली, ‘तो क्या करूं?
होली आपसी बुराई भुलाकर गले मिलने का त्यौहार है। यही सोच मैं उनके घर पहुंचा। वे दरवाजे
पर प्रकट हुए, एकदम झकाझक सफेद वेशभूषा में थे। मैंने दांत निपोरे और कहा, ‘आदरणीय होली है… वे इधर-उधर ताकने लगे। मानो मैंने किसी स्त्री का नाम ले दिया हो, जो उनकी हो ली हो और उनके घर के अंदर वाले कमरे में छिपा रखी हो! एकबारगी मुझे लगा वे होली के सुरूर में हैं, अत: विनय की, ‘आज होली का त्यौहार है प्रभुजी। हमने ही उन्हें वोट देकर जिताया था। अब वे मानव की काया में अवतरित हमारे प्रभुजी हैं एवं पांच साल के लिए प्रभु के पद पर पदासीन हैं। वे अब किसी की नहीं सुनते। प्रभु बहरे होते हैं। उनके दर्शन भी दुर्लभ हो गये हैं। प्रभु अंतर्यामी होते हैं। कभी मिल गये तो ऐसे देखते हैं मानो हम किसी दूसरे ग्रह से
उतरे हुए प्राणी हैं। उन्होंने मुझे घूरा और जैसे मेरी गरेबान पकड़ ली, ‘तो क्या करूं? मारे डर के मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मैंने रंग में पुते अपने दोनों हाथ कमर के पीछे कर लिए। मेरी हालत रंगे हाथों रिश्वत लेते अधिकारी की जैसी हो गई थी, किंतु त्यौहार की बधाई तो देनी ही थी। अत: दोबारा साहस जुटाकर वर्षों
पुराना जुमला दोहराया, ‘बुरा न मानो होली है। लेकिन वे बुरा मान चुके थे। बुरा मानने का अधिकार केवल उनके पास सुरक्षित है। वे चाहें तो बुरा मान सकते हैं। हम ऐसा नहीं कर सकते। आम और खास में यही फर्क है। मैंने पुन: उनको खुश करने का प्रयास किया, ‘ऊपरवाला आपको खूब तरक्की और समृद्धि दे। आप विजयी हों। यह सुनकर उनके होंठों पर मुस्कान का आगमन हुआ। मैंने सोचा बात बन गई। मौका अच्छा है, अब अपनी तरक्की की बात कर लेनी चाहिए। मैंने कहा, ‘हमारे मोहल्ले का विकास आपसे उम्मीद लगाये बैठा है।
मोहल्ले का विकास होगा तभी तो शहर, प्रदेश और फिर देश का विकास होगा। अपनी बात को कुछ लंबा करने की कोशिश की, लेकिन बात बन नहीं पाई।
उनके होंठों पर आई हुई हंसी मुझे दुलत्ती मारकर चली गई। उन्होंने धपाक से दरवाजा बंद कर लिया। हमारी प्रगति में उनको रोड़ा बनते देख मन दुखी हो गया। लौटते हुए उनके गेटकीपर ने बताया, उनके पिताजी नहीं रहे। मैंने सोचा, पिता तो मेरे भी नहीं रहे। कोरोना की वजह से चल बसे। उनसे मदद मांगने बड़ी उम्मीद लेकर गया था। तब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, ‘जाने वाले को कौन रोक सका है। जो इस धरा पर आया
है, उसे एक न एक दिन जाना पड़ता है। ये जीवन नश्वर है। बस सेवा करो और जीव को खुशी-खुशी जाने दो। अब भला बोलो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं। दुखी न हो।
मैं दुखी न हो सका था। उलटे उनकी हां में हां मिलाते हुए लौट आया था। आज न जाने क्यों उनके सफेद झक कपड़ों पर बिना रंग डाले ही असहायों की मजबूरी के रक्ताभ धब्बे उभर आये थे। इनमें बेईमानी, महंगाई और भ्रष्टाचार के काले दाग स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। तभी किसी घर से विज्ञापन की आवाज सुनाई दीले
िकन दाग अच्छे हैं।
