Story in Hindi: “अब आप अपना हाथ पुत्री के हाथ पर रखें और वर के हाथ में उसका हाथ सौंप दें। एक पिता के लिए अपनी पुत्री का कन्यादान संसार का सबसे बड़ा दान है।” पंडित जी ने सन्तोष से विधि समझाते हुए कहा। विधि सुनते ही संतोष की आंखों से पानी गिरता चला गया। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वह अपनी पुत्री का कन्यादान कर रहा था बल्कि उसको रमा के पिता, अपने ससुर की बातें याद आने लगीं, “कन्या का दान करा था बेटा बेचा नहीं था।” संतोष ने अपने दामाद से वही कहा, “कन्या का दान कर रहा हूं। इस दान को सर आंखों पर रखना।”
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बेटी को विदा कर वह अपने कमरे में आया तो थके हुए शरीर को नींद ने नहीं उसके बीते हुए कल ने आ घेरा….
इस कल की शुरुआत वहां से होती है जब संतोष के लिए उसके माता-पिता शादी के रिश्ते देख रहे थे। संतोष हर लड़की में कोई ना कोई कमी बता कर रिश्ते के लिए मना कर देता। खुद वह देखने में ठीक-ठाक था, नौकरी भी ठीक अच्छी थी लेकिन लड़की देखते हुए वह दुनिया भर की शर्तें रखता था। आखिरकार जब वह रमा से मिला तो उसके पास मना करने की कोई वजह नहीं थी। रमा सुंदर और पढ़ी लिखी तो थी साथ में घर के काम में भी निपुण थी।
सही तारीख़ देखकर रमा और संतोष का विवाह तय हुआ। विवाह वाले दिन रमा के पिता ने सारी रस्में बहुत धूमधाम से पूरी करवाई थीं। फिर फेरों के वक्त कन्यादान करते हुए रमा के पिता ने संतोष से कहा था, “मैं अपनी बेटी तुम्हें सौंपता हूं। सारे गुण, संस्कार और शिक्षा जो उसे इस घर से मिली वह तुम्हारे घर लेकर जा रही है। उम्मीद करता हूं जैसा प्यार उसे हमसे मिला तुम उसका वैसा ही ध्यान रखोगे।” संतोष ने उनकी बात पर कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया और चुपचाप रस्में करता रहा। कुछ पल के लिए रमा के मां पिता को यह बात थोड़ी चुभ गई थी पर रस्मों के चलते वह इस बात को नज़र अंदाज़ कर गए। ढेरों आशीर्वाद देकर उन्होंने अपनी बेटी को विदा करा।
शादी के शुरू के दिन रस्मों में निकल गए। रमा को लेकिन संतोष का व्यवहार हर जगह बहुत ही रूखा सा महसूस हुआ। एक तरफ़ तो उसे अपने बराबर पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए थी लेकिन दूसरी तरफ़ उसका व्यवहार एक ऐसे दकियानूसी सोच वाले आदमी का था जिसके लिए बीवी सिर्फ़ सुनने वाली हो और अपनी कोई सोच समझ ना रखे।
जब रमा ने ऑफिस जाना शुरू किया तो संतोष ने उसे झिड़क कर कहा, “ऑफिस से क्या मतलब? शादी हो गई अब तुम्हारी, घर संभालो।” रमा ने उसे समझाने की कोशिश भी करी, “लेकिन संतोष हमारी बात पहले हो चुकी थी ना कि मैं शादी के बाद जॉब करती रहूंगी। कुछ साल बाद जब परिवार शुरू करेंगे तो ज़रूरत पड़ने पर मैं नौकरी छोड़ भी दूंगी। मैं नौकरी के साथ घर का सारा काम भी तो मैनेज कर रही हूं ना तो क्या परेशानी है।” “तुम वही करोगी जो मैं चाहता हूं” संतोष ने उसे करीब करीब धमकाते हुए कहा।
संतोष घर के किसी काम में उसकी मदद तो करता नहीं बल्कि कुछ ना कुछ अड़चन डालता रहता था। रमा ने धीरे-धीरे ऑफिस का काम घर से करना शुरू कर दिया ताकि झगड़ा टाल सके। संतोष लेकिन तब भी किसी न किसी तरह उसको नीचे दिखाने की कोशिश करता रहता।
जब भी वह मायके जाने की बात कहती, संतोष कोई ना कोई वजह बना देता था ताकि वह जा ना पाए।
अपने मां बाप के घर तो वह चाहता था कि रमा हर दूसरे तीसरे हफ्ते चली जाए। खुद वो कभी रमा के घर ना गया, ना उसे जाने देता और न ही रमा के मां-बाप का आना उसको पसंद था।
रमा के माता पिता की शादी की सालगिरह पर भी उसको महंगे तोहफ़े लाने पर पैसों का ताना दिया और उसको धक्का मार दिया जिससे रमा के सर पर चोट लग गई। वह अपने मां-बाप की सालगिरह पर जा नहीं पाई और उसने बुखार का बहाना बना दिया।
रमा कमाती, घर संभालती और बर्दाश्त भी कर रही थी ताकि उसका घर ना बिगड़े।
एक दिन संतोष अपने ऑफिस की लड़की से बराबरी करके उसे ताना मार रहा था, “मिनी को देखो कितनी स्टाइलिश लगती है और तुम ढंग से रहती नहीं हो। रमा ने कहा, “ऑफिस और घर दोनों कितने अच्छे से अकेले संभालती हूं। खुद तो तुम कभी घर से मतलब नहीं रखते फिर भी उस मिनी से बराबरी कर रहे हो। उसी के साथ क्यों नहीं रह लेते फ़िर!!”
“उसी को लाने की सोच रहा हूं”… कहते कहते संतोष रमा को ज़ोर से दो तमाचे मार देता है। तभी रमा के पिता वहां त्योहार का सामान देने आए। उन्होंने देखा तो संतोष से कहा, “बहुत हुआ। रमा ने और हमने बहुत कुछ सहा कि घर बना रहे लेकिन तुम उसे हमारी कमज़ोरी समझ बैठे। अब रमा यहां नहीं आएगी।” संतोष ने भी घमंड से कहा, “ मैं भी इसके साथ नहीं रहूंगा। मिनी से शादी करूंगा, तब देखना।”
कुछ दिनों बाद ही रमा की सारी अच्छाईयां संतोष को याद आने लग जाती हैं। मिनी से शादी करके उसको धीरे-धीरे अपनी ग़लती का अहसास होने लगता है। मिनी ने नौकरी तो छोड़ी दी थी साथ में घर का कोई ध्यान भी नहीं रखती थी। घर की सफ़ाई, खाना और छोटे-बड़े सब काम नौकरों के ऊपर छोड़कर मायके में या इधर-उधर घूमती रहती थी।
एक दिन ज़्यादा पैसे वाला आदमी मिलने पर मिनी उसको छोड़ कर चली गई। तब संतोष रमा के पास माफ़ी मांगने और वापस लाने के लिए गया। जब वह वहां पहुंचा तो पता चला की रमा उनकी बेटी को जन्म देते वक्त इस दुनिया से चल बसी थी।
संतोष पश्चात्ताप के आंसू पीकर अपनी बेटी को घर लाने की बात कहता है तो रमा के पिता उससे कहते हैं, “ तुमने सही गलत समझने में बहुत देर कर दी बेटा। तुम यह भूल गए थे कि एक बाप अपनी बेटी का जब कन्यादान करता है तो वह उसको सिर्फ़ दूसरे के हाथ में सौंपता है बेचता नहीं है। तुमने उसे पत्नी नहीं जागीर समझा। तुम्हारे मां-बाप को भी समझना चाहिए था कि जैसे हमने बेटी थी वैसे उनका बेटा भी तो हमारे परिवार का हिस्सा हुआ ना। यह इतनी सी बात अगर वह तुम्हें समझाते या तुम खुद ही समझ जाते, तो मेरी बेटी आज ज़िंदा होती और तुम्हारा हंसता खेलता परिवार होता।
अब अपनी बेटी का जब कन्यादान करना तो अपने दामाद को यही बात समझाना।”
संतोष आंखें खोल जब कल से आज में आता है तो उसके चेहरे पर चमक थी कि आज उसने अपने ससुर की हर बात दोहराई और एक पिता के कन्यादान का मान रखा।
