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Kanyadan
Importance of Kanyadan
Kanyadan: ये एक पिता और पुत्री के बीच के भावनात्मक रिश्ते को दर्शाता है। इस रस्म को निभाना न सिर्फ पिता बल्कि एक पुत्री के लिए भी काफी कष्टकारी होता है, क्योंकि एक पिता अपने कलेजे के टुकड़े यानी अपनी बेटी को ताउम्र के लिए किसी और को सौंपता है। अपने शरीर के हिस्से को किसी और को सौंपना आसान नहीं होता है। आइए जानते हैं कन्यादान का महत्व और कैसे निभाई जाती है यह रस्म। 
हिंदू धर्म की शादियों में तमाम रस्म और रिवाज निभाने के बाद ही विवाह को पूर्ण माना जाता है। तब जाकर कन् या और वर, पति-पत्नी बन पाते हैं। लेकिन विवाह की इन रस्मों में सबसे महत् वपूर्ण होता है कन्यादान। इसका अर्थ होता है कन्या का दान। अर्थात पिता अपनी पुत्री का हाथ वर के हाथ में सौंपता है। इसके बाद से कन् या की सारी जिम्मेदारियां वर को निभानी होती है। आपको बता दें कि शास्त्रों में इस दान को सबसे बड़ा दान कहा जाता है। इससे बड़ा दान अब तक कोई और नहीं है। यह एक भावुक संस्कार है, जिसमें एक बेटी अपने रूप में अपने पिता के त्याग को महसूस करती है।

कन्यादान का महत्व 

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, कन्यादान महादान की श्रेणी में आता है अर्थात इससे बड़ा दान कोई हो ही नहीं सकता। शास्त्रों में बताया गया है कि जब कन्या के पिता शास्त्रों में बताए गए विधि-विधान के अनुसार, कन्यादान की रस् म निभाते हैं तो कन्या के माता-पिता और परिवार को भी सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसके बाद वधू यानी (लड़की) के लिए मायका पराया घर हो जाता है और पति का घर यानी कि ससुराल उसका अपना घर हो जाता है। कन्यादान के बाद लड़की पर पिता का नहीं बल्कि पति का अधिकार हो जाता है।

भगवान विष्णु और लक्ष्मी का स्वरूप

वेदों और पुराणों के अनुसार विवाह में वर को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। वहीं वधू को घर की लक्ष्मी का दर्जा दिया जाता है। साथ ही उसे अन्नपूर्णा भी माना जाता है। ऐसे इसलिए होता है क्योंकि घर के किचन से लेकर पूरे घर का दारोमदार उसी के कंधे पर होता है। वहीं अगर हम वर की बात करें तो पुराणों के अनुसार विष्णु रूपी वर, कन्या के पिता की हर बात मानकर उन्हें यह आश्वासन देता है कि वह उनकी पुत्री को खुश रखेगा और उस पर कभी आंच नहीं आने देगा। वहीं वधू को भी शादी के साथ सात वचनों को बाखूबी निभाना होता है। सुख हो या दुख हर हाल में अपने पति की परछाई बनकर खड़ा रहना पड़ता है। फिर चाहे वो वर हो या फिर वधू दोनों को ही शादी की रस्मों के दौरान इस बात को साफ बताया जाता है कि दोनों अपने रिश्ते और परिवार को चलाने में बराबर का सहयोग देंगे। ये किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है। इसके साथ ही जिस प्रकार कन्या अपने ससुराल वालों को अपना परिवार मानती है और उनके प्रति अपनी सारी जिम्मेदारी निभाती है, ठीक उसी प्रकार वर को भी अपनी पत्नी के घर वालों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं भूलना चाहिए। 

इस प्रकार की जाती है कन्यादान रस्म

हिंदू धर्म में कन्यादान के समय कुछ अंशदान देने की प्रथा है। इसमें आटे की लोई में छिपाकर कुछ धन कन्यादान के समय दिया जाता है। हकीकत में बस यही और इतना ही दहेज का स्वरूप है। इसके साथ ही दुल्हन को उनके माता-पिता जो सामान और धन उपहार के रूप में देते हैं वह सिर्फ इसलिए कि वह समय पर उनकी पुत्री के काम आ सके लेकिन ये भी गुप्त ही होता है। क्या आप जानते हैं कि इन उपहरों या धन के बारे में किसी दूसरे को जानने या पूछने की आवश्यकता नहीं होती। वहीं दहेज के रूप में दुल्हन को क्या दिया जाना चाहिए क्या नहीं, इस संबंध में ससुराल वालों को कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं। साथ ही न उसके प्रदर्शन की आवश्यकता है, क्योंकि गरीब-अमीर अपनी स्थिति के अनुसार जो दे, वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए, उसके साथ निंदा-प्रशंसा नहीं जुडऩी चाहिए। एक-दूसरे का अनुकरण करने लगें, प्रतिस्पद्र्धा पर उतर आएं, तो इससे अनर्थ ही होगा। इसलिए कन्यादान के साथ कुछ धनदान का विधान तो है, पर दूरर्दशी ऋषियों ने लोगों की स्वार्थपरता एवं दुष्टता की संभावना को ध्यान में रखते हुए यह नियम बना दिया है कि जो कुछ भी दहेज दिया जाए, वह सर्वथा गुप्त हो, उस पर किसी को चर्चा करने का अधिकार न हो।