Swayambhu Manu
Swayambhu Manu

Bhagwan Vishnu Katha: सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी ने स्वयंभू मनु और शतरूपा को प्रकट किया । तत्पश्चात् उनका विवाह कर दिया । ब्रह्माजी के मानस पुत्र होने के कारण स्वयंभू मनु परम तपस्वी, ज्ञानी और धर्मात्मा पुरुष थे । ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान् विष्णु को प्रसन्न कर वर प्राप्त करने का परामर्श दिया । तब श्रीहरि की कृपा-दृष्टि प्राप्त करने के लिए स्वयंभू मनु क्षीरसागर के तट पर गए और वहाँ श्रीहरि की एक सुंदर मूर्ति बनाकर उनके मंत्र का निरंतर जप करने लगे । उन्होंने एक पैर पर खड़े रहकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया । अंत में उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु साक्षात् प्रकट हुए और उसे अभिलषित वर माँगने के लिए कहा ।

भगवान् की मधुर वाणी सुनकर मनु ने नेत्र खोले और उनकी विधिवत स्तुति की फिर वर माँगते हुए बोले – “कष्टों का निवारण करने वाले श्रीहरि! आप परम मान्य पूज्य जगत् को धारण करने वाले तथा मंगलकर्ता हैं । आपकी आज्ञा से ब्रह्मा जगत् की सृष्टि और शिव संहार का कार्य सम्पन्न करते हैं । आपकी दया-दृष्टि से ही देवराज इन्द्र तीनों लोकों पर शासन कर पाते हैं । प्रभु ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरी यही प्रार्थना है कि सृष्टि के कार्य में किसी भी प्रकार का विघ्न उत्पन्न न हो । जो प्राणी आपके मंत्रों की नियमित उपासना करे, उसके कार्य सिद्ध होने में किंचितमात्र भी विलम्ब न हो । दयानिधान ! आपके उपासक को पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहे और उसे ज्ञान, सिद्धि और दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो । पुत्र और समृद्धि से आपका उपासक सदा सम्पन्न रहे । प्रभु ! मेरी यही प्रार्थना है ।”

भगवान् विष्णु बोले – “हे पुत्र! तुम श्रेष्ठ और महान हो । तुमने स्वयं की अपेक्षा सृष्टि के प्राणियों के लिए इतने सारे वर माँग लिए । मैं प्रसन्न होकर तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूर्ण करता हूँ । सृष्टि-रचना के कार्य में जब-जब विघ्न उत्पन्न होगा, मैं साक्षात् प्रकट होकर उस विघ्न को समाप्त करूँगा । मेरा उपासक कभी दु:खी नहीं होगा । रोग, शोक, दुःख, दरिद्रता – कभी उसके निकट नहीं आ सकेंगे । तुम्हारा राज्य निष्कंटक होगा । तुम्हें अनेक पुत्र-पौत्रों की प्राप्ति होगी । मुझमें आस्था के कारण अंत में तुम मेरे परम पद को प्राप्त करोगे ।” स्वयंभू मनु को वरदान देकर भगवान् विष्णु अंतर्धान हो गए ।

इस प्रकार स्वयंभू प्रथम मनु के रूप में प्रथम मन्वंतर के स्वामी हुए । इस मन्वंतर में मरीचि, पुलह, अत्रि, अंगिरा, पुलत्त्व, क्रतु और वसिष्ठ – ये सातों सप्तर्षि हुए । भगवान् श्रीविष्णु धर्म का उपदेश देने के लिए उनकी पुत्री आहुति के गर्भ से यज्ञ-पुरुष के रूप में और ज्ञान का उपदेश देने के लिए उनकी दूसरी पुत्री देवहुति के गर्भ से भगवान् कपिल के रूप में अवतरित हुए थे ।

वेदों और धर्म-शास्त्रों में एक मन्वंतर की अवधि 30,67,20,000 (तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार) वर्ष की बताई गई है । प्रत्येक मन्वंतर में उस काल के मनु की संतानें सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज्य करती थीं ।

इस प्रकार हमारे शास्त्रों में चौदह मनु बताए गए हैं ।

ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)