एक बार गुरुनानक सुल्तानपुर के नवाब के घर गए। नवाब ने नानक का आत्मीय स्वागत किया। फिर दोनों के मध्य धर्म पर चर्चा होने लगी। नवाब ने कहा- ‘आप तो हिंदू-मुस्लिमों में कोई अंतर नहीं करते, इसलिए आज मेरे साथ आप भी नमाज ‘अदा करने चलें।’ नानक बोले- ‘देने वाला एक है और लेने वाला एक, तो अंतर कैसे करूं? चलिए, मस्जिद चलें।’ दोनों मस्जिद पहुँचे।
नवाब साहब नमाज अदा करने लगे, नानक भी ध्यानमग्न होकर एक ही मुद्रा में जहां खड़े थे, वहीं खड़े रहे। नमाज समाप्त होने के बाद नवाब साहब बोले- ‘आपने तो नमाज अदा की ही नहीं।’ नानक ने कहा- ‘आप मेरी गुस्ताखी माफ करें। जब आप नमाज अदा कर रहे थे, तब मेरा मन अपने स्वामी में लगा हुआ था।
उस समय मुझे अपने स्वामी के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन आप तो अल्लाह में अपना मन रमाए हुए थे, फिर आपने मुझे कैसे देखा?’ नवाब साहब नानक की बात का अभिप्राय समझकर बोले- ‘आप ठीक कह रहे हैं। मेरा ध्यान अल्लाह में कम, आपको देखने में अधिक था।
यह हमारी कमजोरी है कि हम इबादत करने आते हैं, खुदा में चित्त लगाने नहीं।’ तब नानक ने कहा- ‘हुजूर! हम सब एक ही खुदा के बंदे हैं। हम चाहे उसे देख पाएं या नहीं, वह सब कुछ देख रहा है, क्योंकि वह मंदिर, मस्जिद हर जगह व्याप्त है। उसे पाने के लिए एकनिष्ठ भाव से उस पर चित्त-लगाने की आवश्यकता है।’ सार यह है कि ईश्वर की अनुभूति और प्राप्ति चित्त की लगन और समर्पण भाव से होती है।
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