Mantra
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एक शिष्य किसी संत पुरुष की सेवा में निरत था और ऐसा मंत्र चाहता था जिसके सहारे वह ऋद्धियां-सिद्धियां दिखा सके। पर संत थे जो सबको राम नाम ही बताते थे। शिष्य को चमत्कारी मंत्र चाहिये था। राम नाम तो मामूली बात है। उसे निराशा होने लगी। गुरु ने उसकी मनःस्थिति को ताड़ लिया।

एक दिन गुरु ने उस शिष्य को एक चिकना पत्थर दिया और कहा-इसे सब्जी वालों से पूछकर आओ कि वे कितने में खरीदेंगे। शिष्य दिन भर घूमाँ बटखरे के काम में आ सकता है यह मानकर उन्होंने दो चार पैसे भर की कीमत लगायी।

दूसरे दिन वही पत्थर लेकर सुनारों के मुहल्ले में भेजा। वहाँ उसका दाम एक हजार तक लगाया गया। तीसरे दिन उसे जौहरी बाजार में उसकी कीमत मालूम करने को कहा गया। कइयों को दिखाने पर उसकी कीमत बढ़ते-बढ़ते एक लाख तक पहुँच गयी।

गुरु ने शिष्य को समझाया- ‘पत्थर तो वही था, पर पारिखयों ने अपनी-अपनी जानकारी के आधार पर उसका मोल बताया। राम नाम है तो एक ही पर मान्यता के अनरूप उसका मूल्य और महत्व घटता बढ़ता रहता है।

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)