hisaab barabar
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

अस्पताल शानदार था।

काउंटर पर बैठी बला की खूबसूरत नर्स ने तीसरी मंजिल पर जाने के लिए कहा। मैं कैप्स्यूल लिफ्ट से तीसरी मंजिल पर पहुंचा। लिफ्ट से बाहर आते ही एक और काउंटर-नर्सिंग स्टेशन। शीशे के पार्टीशन के पीछे एकदम सफेद झक्क यूनिफॉर्म में एक और नर्स। चमचम करते हुए मार्बल फर्श पर कदम बढ़ाता मैं उसके पास पहुंचा।

चाहे आधुनिकतम सुविधाएं हों, साफ-सफाई, जगमगाहट या सेवा का पेशेवराना अंदाज- शानदार अस्पतालों और सितारा होटलों में कुछ समानताएं अनायास देखने को मिल जाती हैं।

नर्स के चेहरे पर प्रशिक्षण से उपजी मुस्कुराहट थी, लगभग स्वाभाविक जैसी।

“मिसेज विजया… विजया कान्त चौटाला।” कुछ ठिठककर मैंने कहा। कहा नहीं, बल्कि पूछा। पूछने जैसा कहा।

नर्स की उंगलियों ने कंप्यूटर के की-बोर्ड पर हरकत की।

“रूम नंबर थ्री जीरो फोर, सर।”-पूर्ववत मुस्कराते हुए नर्स ने कहा। नर्स ने बाईं ओर के गलियारे की तरफ इशारा भी किया। नर्सिंग स्टेशन बिलकुलबीच में था। दाईं और बाईं तरफ मरीजों के कमरे थे। दिन में भी गलियारों में दूधिया बत्तियां जल रही थीं। अगले कुछ ही क्षणों में मैं वार्ड नंबर तीन सौ चार के सामने था।

मैंने हल्के से दरवाजे पर दस्तक दी। कोई प्रतिक्रिया न पाकर मैंने दरवाजे को अंदर की तरफ धकेला और भीतर झांका।

पलंग के सिरहाने बाईं ओर रखी कुर्सी पर एक नर्स निस्पंद बैठी थी। मैंने रूमाल से चेहरे का पसीना पोंछा और कमरे में दाखिल हो गया।

मुझे देखते ही विजया की आंखों में एक चमक कौंध गई। उसने नर्स को बाहर जाने का इशारा किया।

“तेरे घर से कोई नहीं …?” – बिना किसी भूमिका के मैंने पूछा।

कमरे में बड़ी सुखद ठंडक थी। ए.सी. के द्वारा तापमान को बड़े तरीके से सेट किया गया था। गले तक सफेद चादर ओढ़ी हुई विजया का चेहरा कांतिमय था। अमूमन मरीजों के चेहरे मुरझाए हुए देखने की कल्पना करते हुए हम अस्पताल आते हैं।

“मेरा घर तो कोलकाता में है। दो हजार किलोमीटर दूर। अम्मा-बाबू की आयु भी कम नहीं। वैसे भी यहां आने में दो दिन लग जाएंगे।” शायद आश्चर्य हुआ था विजया को…। शायद ऐसे प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी उसे।

“तेरे ससुराल वालों की पूछ रहा हूं। आया कुछ समझ में।” मैं कुढ़ा।

एक क्षण को हिचकिचाई विजया- “क्यों नर्स तो है ही यहां, ट्वेन्टी फोर ऑवर्स। जरूरत क्या है दस लोगों की। व्यर्थ की भीड़।”

कमरा काफी बड़ा था। दाईं ओर सोफा कम, बेड जैसी कोई चीज थी। मेज, कुर्सी, तिपाइयां सभी कुछ साफ, सुंदर और सुव्यवस्थित।

आगे चलकर एक दरवाजा था, जो कि कमरे से जुड़ा बाथरूम था। विजया के पलंग के एकदम सामने थोडी ऊंचाई पर 42 इंच का एलईडी टी.वी. था। टी.वी. फिलवक्त बंद था, लेकिन उसका रिमोट विजया के तकिये बगल में रखा था, जो कि इस बात की चुगली कर रहा था कि अस्पताल में अपना अधिकतम समय विजया टी.वी. देखकर ही व्यतीत कर रही है।

बाई ओर लगे बटन को दबाकर विजया ने पलंग को सिरहाने से ऊचा किया। हौले से ऊंचा होकर उसने तकिये से पीठ टिका दी। चादर उसने नीचे सरका दी। अब वह पलंग पर अधलेटी और बैठे होने की बीच की अवस्था में थी। चादर सरक जाने से पेट कुछ अतिरिक्त फूला लग रहा था। अस्पताल के गाउन में भी वह बेहद खूबसूरत नजर आ रही थी। उसके घने लंबे बाल उसके गालों से उतरकर उसकी पीठ और तकिये के बीच अब भी अठखेलियां कर रहे थे।

“बिलौटी”-मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल गया। पर आवाज बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि मैं खुद भी न सुन सकू।

“क्या कहा?” विजया की बड़ी-बड़ी चमकीली आंखें कटोरियों से बाहर आने को उद्यत हो गईं। वो समझ गई थी। कई बार चेहरे के भाव ही पर्याप्त होते हैं, शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।

“बड़ी सुंदर हो गई है तू …” मैंने बात को सम्भालने की कोशिश की।

“सुंदर तो मैं पहले से ही हूं। तीन साल बाद मिल रहा है तू, तीन सौ साल बाद नहीं।” विजया भड़ककर बोली।

मैं सकपकाया- “ये गलतफहमी कब से हो गई तुझे”, मेरी आवाज अब भी धीमी थी। ताकि सुन लेने की स्थिति में, हमला होने पर मुकर सकू। “खैर छोड़, तेरा आई.पी.एस. कैसा है?”

“मेरे हसबैन्ड से तुझे इतनी जलन क्यों है? आई.पी.एस. होना कोई अपराध है? तीन साल में कभी जानना चाहा कि कि मैं कैसी हूं? मेरे पति के बारे में पूछ रहा है। पहले मेरे बारे में तो पूछ।”

“मुझे क्यों जलन होने लगी। पुलिस का रौब मुझे क्यों दिखा रही है। पुलिस वाला है तो क्या मुझे गिरफ्तार कर लेगा?” पता नहीं मैं व्यंग्य कर रहा था या भीतर कोई कुंठा सिर उठा रही थी।

मुझे लगा विजया मुझ पर झपट पड़ेगी और लंबे नाखूनों से चेहरा नोच लेगी। बिलौटी मैं यूं ही तो नहीं कहता था उसे।

पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।

“तुम लोगों ने कभी पलटकर बात भी नहीं की, “वो एक-एक शब्द चबाते हए बोली। “बडा ग्रप बनाया था- लॉयन्स क्लॉज! वाह! शेर के पंजे। सारी दनिया से बराई हटाएंगे। वो सनीता मठकरी. जो बस समाजवाद की बातें करती थी. खद कैपिटलिस्ट से शादी करके चैन-अमन से रह रही है। गोर्की और लेनिन की किताबें जरूर सजी हैं उसके ड्राइंग रूम की अलमारी में। खूब खुश है भई, वो पति और बच्चों में। और तुम्हारा विवेक अग्रवाल, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ दो दिन भूखा बैठ गया था कॉलेज में-साल भर की सिविल इंजीनियरी में होंडा सिटी में उड़ता फिरता है। और जो…”

“उल्टा चोर…” मैंने कहना चाहा पर उसके चेहरे के भाव देखकर मैं बोलते-बोलते रुक गया,-“दूसरों की कमियां गिनाने से तू सही नहीं हो जाएगी। तू सिर्फ सुनी-सुनाई कह रही है। हमारे लॉयन्स क्लॉज के पांचों सदस्य जिस जगह और जिस स्थिति में हैं, अपनी-अपनी भूमिका श्रेष्ठ तरीके से निभा रहे हैं। जीवन में हम खुद को ही सुधार लें, तो दुनिया खुद ही सुधर जाएगी। तू तो बडी ऐक्टिव मेम्बर थी लॉयन्स क्लॉज की, लेकिन सब एक झटके में छोड़कर चली गई। मुझे खूब धोखा दिया…”

“धोखा? धोखा कैसा? नहीं पहले क्लीयर कर दिया कि मैं शादी करके चली गई तो इसमें धोखा कहां से आ गया? और तुझे कैसे धोखा दिया…।। मैं क्या तुझसे शादी करने वाली थी…।” बिफर पड़ी विजया। वही आवेग, वही कॉलेज के समय का बिन्दास अंदाज।

“धीरे बोल,” मैं सकपकाकर बोला, “तेरा हसबैन्ड आ गया, तो सही में मेरी खटिया खड़ी कर देगा।”

नहीं आएगा,” आश्वस्त स्वर। “नहीं आएगा, सुरेश इलेक्शन ड्यूटी पर है। उसे फुरसत नहीं। तेरी तरह जर्नलिस्ट नहीं है। असिस्टैन्ट कमिश्नर है… जूस पिएगा?”

शायद उसे लगा कि कुछ ज्यादा कह दिया है, शायद उसे कवर करने के लिए जूस की बात की थी।

जरूरत थी जूस की। हालांकि पानी से भी काम चल जाता। छोटे फ्रिज से पैक्ड जूस मैंने निकाल लिया। एक सांस में जूस खत्म कर मैं फिर विजया को देखने लगा- “मेरा नंबर कहां से मिला?”

“तेरी रिपोर्ट्स पढ़ती हूं। तेरे आर्टिकल्स पढ़ती हूं। पिछले हफ्ते टी.वी. पर भी तेरा कवरेज देखा आत्महत्या करने वाले किसानों पर। रीयल ग्रुप की मैगजीन ‘प्रहार’ में तेरा जो लेख है ‘जिन्दा उम्मीद’ और उस लेख में जिस मार्क्स के बंदे विजय सारस्वत का जिक्र है, वो दरअसल तू ही है। समझती नहीं क्या मैं! अब तो बड़ा शेर बनता है! अब कहां से ताकत आ गई! कॉलेज में तो बड़ा दब्बू था, दब्बू नहीं बुजदिल… मतलब संकोची… मतलब शाई था।”

मुझे हंसी आ गई,- “मैं पूछ रहा हूं मेरा नंबर कहां से मिला और तू मेरा नख-शिख वर्णन करने पर तुली है।”

“तेरी रचनाओं के साथ तेरा नंबर, नाम, पता, फोटो सब होता है इडियट।” फिर तेज हो गई आवाज विजया की।

“और दब्बू! दब्बू वाली क्या बात? दब्बू, बुजदिल और संकोची होने में फर्क नहीं समझती? कमाल है!” मैंने कहा।

“तू कौन-सा नख-शिख वर्णन का मतलब समझता है…? याद रखना, जब कॉलेज में तू फंसा था, नेतागिरी के चक्कर में, तो मैंने ही तुझे बचाया था। पुलिस और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के सामने मैं तेरे पक्ष में बयान नहीं देती तो रेस्टीकेट कर दिया जाता कॉलेज से! कॉलेज से निकल जाता तो चप्पल फटकारते घूम रहा होता। ये मीडिया की धौंस धरी रह जाती!” – विजया धमकाने वाले अंदाज में बोली।

“कैसी धौंस? कुछ कहा भी है मैंने तुझे? एहसान जताने के लिए बुलाया है मुझे?”-मैं लगभग हथियार डालते हुए बोला।

तो तूने पूछा इतनी देर में कि मैं अस्पताल में क्या कर रही हूं?” स्वर शिकायती हो चला है विजया का।

“अच्छी-भली तो दिख रही है। लग रहा है ब्यूटी पार्लर से निकलकर आई है”- मुझे फिर लगा कि अबकी वो जरूर मुझ पर झपट पड़ेगी। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। हमारे लॉयन्स क्लॉज की सदस्या सुनीता कहती थी…और शायद ठीक कहती थी कि शादी के बाद लड़की सोबर हो जाती है, जिसका दूसरा मतलब यह होता है कि शादी के बाद लड़की का धैर्य बढ़ जाता है। सहने की क्षमता बढ़ जाती है।

विजया ने आधी ओढ़ी हुई चादर को थोड़ा और नीचे की ओर सरकाया। अपने फूले पेट पर हाथ सहलाकर वह मुस्कुराने लगी।

“ट्विन्स हैं! दोनों लड़कियां!” उसने आंखें झुका लीं। ममता का एक पूरा का पूरा सागर उस क्षणांश में उसकी आंखों से होकर गुजर गया।

फिर अचानक उसकी आवाज सर्द हो गई-“पिछली बार भी लड़की ही थी, पर गिरा दी गई… पिछली बार मेरे कुछ समझने से पहले ही टेस्ट-वेस्ट हो गया और मेरे समझने तक किस्सा खतम…”

मुझे समझने में समय लगा- क्या कह रही है विजया। संपन्न परिवार और खूब पढ़ा-लिखा पति। ऐसी बात सोची भी कैसे जा सकती है?

“संपन्न होने से और पढ़े-लिखे होने से इसका संबंध मत बैठा। और लेक्चर भी मत दे। तेरे ही आटिर्कल में पढ़ा था कि कितने ही संपन्न राज्यों में कन्याओं की दर घटती जा रही है। हजार लड़कों पर आठ सौ लड़कियां भी नहीं रही हैं। तू क्या जानता नहीं कि हमारे देश में लाखों लड़कियां हर साल जन्म लेने से पहले ही मार दी जाती हैं।”

मैं अवाक था।

विजया कहे जा रही थी- “सुरेश सीधा है, पर परिवार दकियानूस है। सुरेश को छोड़ देना चाहती थी। पर नहीं हो सका। अम्मा-बाबू आड़े आ गए। पर कोई बात नही…। अब मेरी बारी है… पहले सोचा था फिर इस बार टेस्ट करवा लूंगी और अगर इस बार कोख में लड़का होगा, तो खुद उसे खत्म कर दूंगी, पिछली बेटी का हिसाब चुकाने के लिए…”

“दिमाग तो नहीं खराब हो गया तेरा?” मैंने तीखे स्वर में उसकी बात काटी।

“पर कोई बात नहीं, सौभाग्य से इस बार दो लड़कियां हैं। वाह…।” वह पुलकित थी, “जुड़वां लड़कियां। अब हिसाब बराबर हो गया।”

“पूरी तैयारी से आई हूं,” उसने तकिये के नीचे से कुछ कागजात निकाले,- “सुरेश कान्त चौटाला के खिलाफ मेरा बयान तैयार है। तीन प्रतियों में है… अब ध्यान से सुन… कल सुबह ऑपरेशन है। सफाई कर दी जाएगी। इससे पहले मुझे कोलकाता मेरे घर पहुंचा दे, फिर जो तुझे अखबार में लिखना है-लिख। जो टी.वी. पर दिखाना है- दिखा। पुलिस इसमें क्या कर सकेगी, ये भी पता कर लेना। पूरी तैयारी से आई हूं।” -विजया ने दोहराया।

मैंने फ्रिज से पानी की बोतल निकालकर कुछ बूंट भरे।

“मेरे पास आज का ही समय है… कल मेरा हसबैन्ड सिर पर सवार हो जाएगा। उसे लड़की नहीं चाहिए। इसके लिए वो किसी भी हद तक गिर सकता है। कुछ भी कर सकता है… अपनी पॉवर का इस्तेमाल भी…”

तेरी बच्चियों को कुछ नहीं होगा। गारंटी लेता हूं,” मैं दृढ़ स्वर में बोला- “पर मुझे दिखाई दे रहा है कि तू अपने पति से अलग हो गई है…”

..और मैं देख रही हैं कि भ्रूण-हत्या की कोशिश के लिए सस्पेन्ड आई.पी.एस. ऑफिसर सुरेश कान्त चौटाला अपनी पत्नी से माफी मांग रहा है। हाथ-पांव जोड़ रहा है।”

“जो तूने मुझसे पूछा था विजया, वो अब मैं तुझसे पूछता हूं, कॉलेज की सीधी-सादी लडकी में इतनी ताकत कहां से आ गई? तझे डर नहीं लग रहा विजया?”

“डर की कैसी बात। ये पूरी की पूरी नस्ल का सवाल है। लड़की के इस पृथ्वी पर बचे रहने का सवाल है। लड़की के अस्तित्व का सवाल है। और अगर डर है भी, तो उन औरतों के लिए है जो मजबूरी में लड़ नहीं पातीं। जिनके लिए तेरे जैसे दोस्त नहीं है…।” हांफ रही थी विजया।

मैं चुप रहा। अगले पांच मिनट मैं फोन पर व्यस्त रहा। विजया बाथरूम से कपड़े बदलकर लौट आई। अस्पताल के गाउन की जगह सादा-सा सलवार-सूट।

मैं विजया से मुखातिब हुआ- “बस पांच मिनट में हम मुंबई के लिए निकल रहे हैं। टैक्सी आ रही है। फ्लाइट की टिकट बुक हो गई हैं। ज्यादा से ज्यादा तीन घंटे में मुंबई और फिर उसके बाद शाम तक तू कोलकाता में अपने घर में होगी। यहां से दो हजार किलोमीटर दूर। फिर अखबार, मीडिया, पुलिस सब देख लूंगा मैं।”

मैं फिर बोला- “सॉरी यार, तुझे हम गलत समझते रहे। पर तू इतना बड़ा काम कर रही है, हम सब से ऊंची उठ गई है तू। तेरी हिम्मत तो हमें भी कुछ करने के लिए मजबूर करेगी।” अबकी बार मैं कोई मजाक नहीं कर रहा था।

“बड़ी मदद कर के दिखा रहा है”- विजया के चेहरे का तनाव अब कम हो रहा है और स्वर में शरारत फिर लौट रही है- “अब अपने लॉयन्स क्लॉज के मेम्बर्स के बीच अपनी डींगें हांकेगा और मेरी बुराई करेगा।” चंचल लड़की है। गंभीर रहना इसके बस की बात ही नहीं।

मैंने धीरे से जवाब दिया- “वो तूने बचाया था न… रेस्टिकेट होने से कॉलेज में। तो आज हिसाब बराबर।”

“हिसाब बराबर!” विजया खिलखिलाकर हंसी।

शायद आंख में कुछ पड़ गया था, क्योंकि हंसते-हंसते दुपट्टे के छोर से आंख की कोर पोंछने लगी थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’