Hindi Love Story: “रुको-रुको।” बचपने वाली ख़ुशी उसके चेहरे पर हिलोरे लेती दिखी।
“क्या हुआ?”
“बुढ़िया बाल खाने हैं मुझे।” मैंने गाड़ी सड़क किनारे रोकी; पीछे देखा तो बुढ़िया बाल (कॉटन कैंडी) का बड़ा बन्च लिए एक पन्द्रह-सोलह साल का लड़का चला आ रहा था। हमने वहीं रुककर उसके कार तक पहुँचने का इंतज़ार किया और मोहतरमा ने कार में बैठे-बैठे ही दो पैकेट ख़रीद लिए।
“लो।” एक मेरी ओर बढ़ाया।
“मुझे जवान के बाल पसंद हैं, बुड्ढे-बुढ़ियों के बाल तुम्हीं को मुबारक हों।” कहते हुए मैंने उसकी गरदन में हाथ डाल, उसके लम्बे बालों को अपने हाथों में लिया। नथुनों के सामने से गुज़ारते और ख़ुशबू में जन्नत तलाशते हुए फिर कहा- “मुझे ये हसीन, काले, जवान बाल चाहिए।”
यूँ तो मैं शरीफ़ ही रहता, अगर उसकी मोहब्बत से सनी नज़रों और मुस्कान का आशिक़ ना होता। रंगरेज ना हो, ऐसी अधूरी सोहबत किस काम की-“ठीक। कल पका के लाऊँगी, नमकीन पसंद करोगे या मीठा?”
“एक ही डिश बना सको, तो नमकीन मुझे पसंद है। देखता हूँ; मीठा किसी और से कहता हूँ।” यक-ब-यक दया कौंधती है, उन दरिद्रों पर; जिन पर सर्वशक्तिमान की नज़रें मेहरबां ना हुईं और महरूम रहे वे मोहब्बत और गुस्से से कहर बरपाते, लबलबाते, बहते कॉकटेल को चेहरे पर पढ़ने से। जन्नत में फ़िज़ूल बहते शराब के चश्में, इससे बेहतर क्या ही हो सकते हैं?
“लगता है जीने से मन भर गया है तुम्हारा। तुम्हें ज़हर भी खाना होगा, तो मैं ही खिलाऊँगी; भेजे में घुसा लो यह बात ठीक से।” उसने दाँत भींचते और फिर खिलखिलाते हुए हैंड बैग मेरे सर पर दे मारा जो अभी खुला हुआ ही था। कुछ पैसे नीचे बिखर गए।
वह सिक्के और नोट उठाती जा रही थी और माथे पर रखकर पुचकारते हुए बैग में डालती जा रही थी। परमात्मा ने यह सब मौक़े मेरी क़िस्मत में ठूंस-ठूंस कर भरे हैं। फिर भी मसीहाई ताकतों को कटघरे में ला-लाकर सताना; मेरा दिलकश बदला हुआ करता है। बदला उस गुनाह के लिए, जो उसने हमें अपना मातहत बनाकर कर डाला है।
“ये पुच-पुच क्या कर रही हो? इतने ध्यान से तो कभी मुझे प्यार नहीं किया। इन पैसों से ज़्यादा प्यार है तुम्हें?”
“तुम ना, अब चुप ही रहना। अरे! लक्ष्मी है।” शायद उसे बोलते-बोलते ही आभास हो गया था कि, चुप रहने को कहना ही बहुत था।
“ओके, पर ये तुमने किसकी नकल करके सीखा है?” यक़ीनों को बेदर्दी से मसलना, है तो बेरहमी ही।
“ख़ुद सपने में आई थी लक्ष्मी जी, उन्होनें कहा था मुझे। ओके?” उसने पीछा छुड़ाना चाहा और बुढ़िया बाल हाथ से तोड़कर और दबाकर खाने की कोशिश करने लगी, जिससे उसके चेहरे पर बिखरी क़ुदरती सुर्ख़ी और लिपस्टिक पर कोई और बदरंग ना चढ़े।
“हाँ! तो सपने में ही आ सकते हैं तुम्हारे देवी-देवता। सामने आने की हिम्मत करें तो बताऊँ। ख़ुद तो सेवन स्टार का लुत्फ़ उठाते हैं और हमें धन की निंदा से भरे शास्त्र पढ़ाते हैं।”
“काहे को? इतनी जगह महिमा भी तो है।” वह जानती है तकरार का मेरा यह दुलारा अवसर है, फिर भी उलझ ही जाती है।
“हाँ, इतनी कुरूप महिमामयी आरती। इनसे तो सब कष्ट उतर जाते हैं, मन नहीं घबराता है और समरथ को नहिं दोष गुसाईं।” ईश्वर के लिए पनपी नफ़रत, जब-तब कैसा भी आकार लेने को मचलने लगती है।
“तुम्हें छोटी सी बात को खींच-खाँचकर आसमान में पहुँचा देने के लिए किसी यूनिवर्सिटी ने डॉक्टरेट ऑफर नहीं की अब तक?” जवाब देकर उलझने की बजाय बुढ़िया के बालों का स्वाद लेने में उसे ज़्यादा दिलचस्पी थी।
“देखो डियर, किन्ही बातों पर हमारे रिएक्शन; सदियों की साज़िश हो सकते हैं। हमारे सब रीति-रिवाज और कर्मकाण्ड, किन्ही साजिशों के रिश्तेदार तो नहीं; यह परखा जाना ज़रूरी है। जिनके कारण ही हमें पता ना हो, उन चीजों पर क्या अमल करना?”
“यह कोई रिवाज थोड़ी ना है, अपनी-अपनी श्रद्धा है।” उसने जवाब दे ही दिया।
“श्रद्धा तुम्हारी होती तो कोई बात नहीं थी, वह समझ से पैदा हुई होती। हमारी नादान श्रद्धा रिवाज बन जानी है। हमारे घरों में अब भी कोई बहू-बेटी जाती है, तो कार के चक्कों में पानी डालते हैं; क्यों? यह किसी को नहीं पता।”
“हाँ करते तो हमारे यहाँ भी हैं, पर क्यों करते हैं?”
“जब बैलगाड़ियों में सिर्फ़ लोहे के पहिए हुआ करते थे तो गर्म होकर फैलें-टूटें ना, इसलिए।”
“वाह क्या बात है। कार धीमें करो, हाथ चिपचिपे हो गए हैं।” उसने विंडो थोड़ी नीचे कर, धीमीं चलती गाड़ी में ही हाथ धो लिए। वापस बैठी तो सीट पीछे कर एक पैर, दूसरे पर चढ़ा लिया; पर उसकी पायल उसके ब्रेसलेट में फंस गई।
“और ये पायल क्यों पहनते हैं? इसके लिए भी कोई देवी सपनों में आई थी?” मुझे मौक़े मिलते जा रहे थे, तो कैसे ना लपकता।
उसने हाथों से पायल हिलाकर आवाज़ निकाली-“नहीं ना; यह तो मुझे पसंद है। और इसकी हल्की प्यारी सी आवाज़ अच्छी लगती है।”
“मैडम, बच्चों को पहनाओ। ताकि उनके चलने पर आवाज़ आए और वे ख़ुश होकर ज़्यादा चलने की प्रैक्टिस करें। औरतों को तो बेड़ियाँ पहनाई गई थीं; इसलिए कि वे किधर जा रही हैं, आवाज़ से पूरे घर को पता चले।” सदियों के रिवाज़ तुम ओढ़ो तो कुछ लोगों ने सदियों का गुस्सा भी पिया हुआ है।
“जी गुरुजी, अब कुछ और बात करें?” उसने हाथ जोड़ते हुए माथे पर लगाया और हम दोनों ने सवाल भुलाकर ज़िंदगी के रास्ते में आगे बढ़ जाना, ज़्यादा अच्छा समझा।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
